हाय रे देश की पुलिस

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश में राजनीतिक हल चल जारी है। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर अब भी घमासान मचा हुआ है। हालांकि बीते एक महीने से इस कानून और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ कई विश्वविद्यालयों के छात्रों ने अभियान छेड़ रखा है। लेकिन अब तक इस मुद्दे पर को लेकर किसी प्रकार का बदलाव या टिप्पणी करने से केंद्र सरकार बच रही है। समाज के विभिन्न तबकों के लोग भी इसके खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। सीएए को लेकर इन्हीं धरणा प्रदर्शनों के बीच जो घटना दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हुई, वो काफी निंदनीय थी। प्रदर्शन के दौरान जिस प्रकार रात के अंधेरे में घुस कर पुलिस ने लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं को पीटा वो कतई उचित नहीं था, जिसकी निंदा और आलोचना भी जम कर हुई। उस समय विश्वविद्यालय की कुलपति ने कहा था कि इस मामले की जांच होगी और विश्वविद्यालय परिसर के अंदर हुए इस बर्बरता के दोषियों को सज़ा जरूर मिलेगी। लेकिन अब इस बात को तकरीबन एक महीना का समय बीत चुका है और बड़े अफसोस की बात है कि इस पर कार्रवाई तो दूर बल्कि अब तक इस घटना को लेकर एफआईआर तक दर्ज नहीं की गई है। यह तो साफ है कि इस बर्बरता के लिए केवल दिल्ली पुलिस ही दोषी है। लेकिन यहां समझने वाली वात ये है कि देश के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के अंदर छात्रों के साथ हुए इस दुर्व्यवहार के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं किया जा रहा है। इसकी क्या वजह हो सकती है। क्यों राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस विषय पर चुप्पी साधे बैठी है? क्यों छात्रों से उनके अधिकार छिनने की कोशिशें की जा रही है? क्यों बेगुनाह छात्रों को भी इस घटना में घसीटा गया और लाइब्रेरी बैठे स्टूडेंट्स पर निर्मम तरीके से लाटीयां बरसाई गई। बीते सोमवार को कुलपति नजमा अख्तर ने एक संवाददाता सम्मेलन के जरिए ये बताया कि दिल्ली पुलिस उनका एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है लिहाजा उन्हें कोर्ट का रूख करना पड़ेगा। वहीं कुलपति नजमा अख्तर ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की जांच शुरू कर दी है। आयोग की एक टीम विश्वविद्यालय का दौरा कर चुकी है और पीड़ित छात्रों के बयान दर्ज कर लिया गया है। कहीं ऐसा न हो, इस घटना के बाद पुलिस के इस व्यवहार और उनके इस रवय्ये से जनता की रक्षा का जिम्मेदारी लेने वाली पुलिस प्रशासन और देश के कानून व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठ जाए। कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में ये आंदोलन व प्रदर्शन करने वाले छात्र आक्रोश में इसे और बड़ा न बना दें। इसीलिए ये जरूरी है कि राज्य व केंद्र सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करें और स्थानीय पुलिस की बर्बरता के लिए दोषियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई की जाए। इससे न केवल छात्रों का आक्रोश कम होगा बल्कि आने वाले दिनों में आंदोलन के दौरान हिंसाए भी कम होंगी।

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