आने वाले 100 सालों में क्या होगी धरती की हालत

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। बीते दिनों नेटफ्लिक्स पर एक भारतीय सीरिज़ आई थी, जिसमें 2050 तक देश की हालत का एक चित्र दिखाया गया था। इस सीरिज़ में दिखाया गया कि कैसे पेड़ काटे जाने, तालाबों को बंद कर उनमें फ्लैट बनाए जाने और प्लास्टिक के दुर्पोयोग से पर्यावरण को क्षति पहुंच रही है। और अगर हमने समय रहते पर्यावरण का संरक्षण नहीं किया तो आने वाले समय में हमें पानी के साथ ही स्वच्छ हवा भी खरीदनी पड़ सकती है। इस सीरिज़ में दिखाए गए दृश्य काफी डरावने हैं, जिनमें पानी के लिए लोगों को लड़ते-झगड़ते दिखाया गया है। विशेषज्ञ कहते हैं, पर्यावरण का संकट हमारे लिए एक चुनौती के रुप में उभर रहा है। संरक्षण के लिए अब तक बने सारे कानून और नियम सिर्फ किताबी साबित हो रहे हैं। पारस्थितिकी असंतुलन को हम आज भी नहीं समझ पा रहे हैं। पूरा देश जल संकट से जूझ रहा है। जंगल आग की भेंट चढ़ रहे हैं। प्राकृतिक असंतुलन की वजह से पहाड़ में तबाही आ रही है। पहाड़ों की रानी कही जाने वाले शिमला में बूंद-बूंद पानी के लिए लोग तरस रहे हैं। आर्थिक उदारीकरण और उपभोक्तावाद की संस्कृति गांव से लेकर शहरों तक को निगल रही है। प्लास्टिक कचरे का बढ़ता अंबार मानवीय सभ्यता के लिए सबसे बड़े संकट के रुप में उभर रहा है।

ज़रा सोचिए ! अगर हमने आज अपने पर्यावरण की रक्षा नहीं की तो क्या होगा। क्या होगा जब हमारी भावी पीढ़ी को स्वच्छ पानी और स्वच्छ हवा के लिए तरसना पड़ेगा। दुनिया बगैर पानी के कैसा चलेगी। प्लास्टिक से फैल रहे प्रदुषण से कैसे निपटेंगे। ये सारे सवाल एक दूसरे से जुड़े हैं। ये सारे सवाल हमसे और आपसे जुड़े हैं। आज के इस लेख में हम पर्यावरण की गंभीर हालत और उसके सुधार की बात कर रहे हैं। 

विभिन्न कारकों से बढ़ रहा प्रदूषण 

आबोहवा और समुद्री जल कार्बन से भर चुका है। वातावरण में घुली सीओटू पराबैंगनी विकिरण को सोखती और छोड़ती है। इससे हवा गर्म, जमीन और पानी गर्म होते हैं। इस प्रक्रिया के बिना धरती बर्फीली हो जाएगी। लेकिन हवा में कार्बन की अति से सेहत को नुकसान पहुंच रहा है और गर्म होती धरती जलवायु परिवर्तन का सामना भी कर रही है। वहीं दूसरी ओर कई प्रकार के पौधों और जन्तुओं को आसरा देने वाले जंगल काटे जा रहे हैं। खासकर वर्षा वनों वाले इलाके में। जंगल कार्बन सोखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। लेकिन जंगलों को काटकर सोयाबीन, ताड़ और दूसरे किस्म की खेती की जा रही है। आज धरती का 30 फीसदी हिस्सा जंगलों से ढंका है। लेकिन हर साल 73 लाख हेक्टेयर जंगल काटे जा रहे हैं। 

हम अक्सर देखते हैं, जमीन पर जंगली जानवर शिकार, दांत, खाल या दूसरी चीजों के लिए मारे जा रहे हैं। समुद्र में औद्योगिक स्तर पर मछली मारने से जलीय जीवन का संतुलन गड़बड़ा रहा है। धरती पर हर एक पौधा और प्राणी बाकी दूसरी चीजों से जुड़ा हुआ है। इस चेन की कड़ियां टूटती गई तो इंसान को भी मुश्किल होगी। मिट्टी के प्रदूषण की बात करें तो अत्यधिक खाद के इस्तेमाल, एक जैसी खेती और जरूरत से ज्यादा चारा काटने की चलते दुनिया भर में मिट्टी की क्वालिटी खराब हो रही है। यूएन के मुताबिक हर साल 1.2 करोड़ हेक्टयेर जमीन खराब होती जा रही है। 

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में की कारक ज़िम्मेदार हैं जिनमें बढ़ती आबादी भी मुख्य है। इंसान की आबादी तेजी से बढ़ती जा रही है। 20वीं शताब्दी के शुरू में दुनिया की आबादी 1.6 अरब थी, आज यह 7.5 अरब है और 2050 तक 10 अरब हो जाएगी। इतनी विशाल आबादी प्राकृतिक संसाधनों पर भारी बोझ डाल रही है। संसाधनों तक पहुंचने की होड़ के चलते अफ्रीका और एशियाई महाद्वीप में विवाद भी होने लगे हैं।

औद्योगीकरण से पर्यावरण बर्बाद 

प्रदूषण एवं उद्योग दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां उद्योग होगा, वहां प्रदूषण तो होगा ही। उद्योगों की स्थापना स्वयं में एक महत्वपूर्ण कार्य होता है। प्रत्येक देश में उद्योग अर्थव्यवस्था के मूल आधार होते हैं। यह जीवन की सुख-सुविधाओं, रहन-सहन, शिक्षा- चिकित्सा से सीधे जुड़ा हुआ है। इन सुविधाओं की खातिर मनुष्य नित नए वैज्ञानिक आविष्कारों एवं नए उद्योग-धंधों को बढ़ाने में जुटा हुआ है। औद्योगीकरण ऐसा ही एक चरण है, जिससे देश को आत्मनिर्भरता मिलती है और व्यक्तियों में समृद्धि की भावना को जागृत करती है। भारत इसका अपवाद नहीं है। सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने हमें कुछ नहीं दिया। कुशल कारीगरों की मेहनत ने भी अपने देश को उन्नति के चरण पर नहीं पहुंचाया। सन् 1947 में आजाद देश ने इस दिशा में सोचा और अपने देश की क्रमबद्ध प्रगति के लिए चरणबद्ध पंचवर्षीय योजनाएं बनाई। द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) में देश में औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ, जो निरंतर बढ़ता ही रहा (आर्थिक मंदी के कारण इसमें शिथिलता भी आई)। एक सर्वेक्षण के अनुसार सत्रह समूहों में विभाजित हजारों बड़े उद्योग (सही संख्या उपलब्ध नहीं) और 31 लाख लघु एवं मध्यम उद्योग वर्तमान में देश में कार्यरत हैं। संसार में उद्योगों की प्रगति के साथ ही प्रदूषण की भी प्रगति हुई, जो वास्तव में सामान्य प्रदूषण से भी भयावह एवं जानलेवा है। एक उद्योग से संबंधित कम-से-कम निम्न प्रक्रिया तो होती ही है -

  • विषैली गैसों का चिमनियों से उत्सर्जन

  • चिमनियों में एकत्रित हो जाने वाले सूक्ष्म कण

  • उद्योगों में कार्य आने के बाद शेष

  • चिमनियों में प्रयुक्त ईंधन के अवशेष एवं

  • उद्योगों में काम में आए हुए जल का बहिर्स्राव


प्राकृतिक संसाधनों को लुट रहे अमीर

पर्यावरण को बर्बाद करने वाला दूसरा समूह है अमीरों का मगर इसकी चर्चा बहुत कम होती है। इस पाखंड का एक अच्छा उदाहरण है विश्व पर्यावरण संवर्धन रणनीति, जिसे अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने तैयार किया है। हमारी सरकार भी इसी के आधार पर पर्यावरण संरक्षण नीति का पालन करती है। अमीरों की संख्या तो बहुत कम है मगर वे विश्व के बहुत अधिक संसाधनों का उपयोग करते हैं और उनका हिस्सा दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। यह समूह अब केवल पर्यावरण पर ही निर्भर नहीं रह गया है। यह दूर-दूर तक दुनिया भर के प्रकृतिक संसाधनों की खुली लूट करने लगा है। जिन्हें देश की प्रगति के नए मंदिर कहा गया था, उनका कलश अब फीका पड़ने लगा है। हर रोज़ वे दावे और वादे झूठे साबित होते जा रहे हैं, जो इन मंदिरों को बांधते समय किए गए थे।

दूसरी ओर देश के हर छोटे-बड़े शहरों में तालाबों को बलि चढ़ा कर फ्लैट और ऊंची इमारते बनाई जा रही है। देश के हर कोने में बिल्डर अपनी मनमानी कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सरकारी आधिकारियों की उदासीनता की वजह से बीबीएमपी द्वारा नियमों की अनदेखी की जा रही है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि अगर बीबीएमपी एक पेड़ काटने का आदेश देती है तो उन्हें कम से कम दो पौधे लगाने का आदेश देना चाहिए। उनका मानना है शहर की सौंदर्यता पेड़-पौधों और हरे मैदानों से होती है न कि बड़े उद्योगों से।

ग्रीन पटाखे लाना सरकार का अच्छा कदम

इस वर्ष से दिल्ली-एनसीआर में ग्रीन पटाखों की ब्रिकी शुरु हो गई है। इस बात की घोषणा केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री हर्षवर्धन ने की है। बताया जा रहा है कि इन पटाखों से 30 प्रतिशत प्रदूषण में कमी आएगी। ज्ञात हो कि पिछले वर्ष दीपावली से पहले सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था और ग्रीन पटाखों को लाने पर जोर दिया था। ग्रीन पटाखों का सुझाव केंद्र सरकार ने ही दिया था। 

यह बताना जरूरी है कि ग्रीन पटाखे क्या होते हैं। दरअसल, यह पटाखे राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान की खोज हैं। ये देखने में अन्य पटाखों जैसे ही होते हैं पर इनके जलने से प्रदूषण बहुत कम होता है। सरकार पूरे देश में ग्रीन पटाखे लाने पर काम कर रही है। फिलहाल, इस साल दिल्ली-एनसीआर से इसकी शुरुआत कर रही है। यदि अच्छा रिस्पांस मिला तो फिर इसे देशभर में लागू किया जाएगा। बढ़ते प्रदूषण को लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिक चिंतित हैं। अपने देश में भी यह समस्या विकराल होते जा रही है। खासकर, महानगरों में तो बुरा हाल है। शुद्ध हवा नहीं मिलने से सांस की बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। दिल्ली-एनसीआर के परिवेश में बात करें तो बीते कुछ वर्षों में यहां की आबोहवा विषाक्त हो गई है। बढ़ते ट्रांसपोर्ट, पराली जलाने और पटाखों के प्रदूषण से दिल्ली-एनसीआर के लोगों की जान आफत में रहती है। हाईकोर्ट ने तो दिल्ली को गैस चेम्बर तक कह दिया है। दरअसल, अक्टूबर-नवम्बर में प्रदूषण हवा में घुलकर रह जाता है क्योंकि सर्दी की प्रांरभिकता होती है और मौसम में बदलाव की वजह से हवा कम चलती है। इससे प्रदूषण 50 से 70 फुट तक ही घुमता रहता है। इस वजह से सांसों के जरिये हमारे शरीर में घुसकर यह स्वास्थय पर सीधा प्रहार करता है। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, इस मामले में हर कोई गंभीरता दिखाते हुए काम कर रहा है। 

विकासशील देशों की चिंता

यह भी कहा जाता है कि पर्यावरण की चिंता से विकासशील देशों में विकास की कोशिशें कम हो जाएंगी। इन तर्कों का जवाब यह दिया जाता है कि पर्यावरण और विकास एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसी वजह से शुष्क प्रदेशों और उष्णकटिबंध के विकासशील देशों को अक्सर पर्यावरण की समस्याओं, जैसे सूखा या पानी के ज़रिए फैलने वाली बीमारियों से जूझना पड़ता है। विकास पर भी इन चीज़ों का असर पड़ता है। यह भी कहा जाता है कि विकासशील देश जिन समस्याओं से आज जूझ रहे हैं, वैसी समस्याएं विकसित देश भोग चुके हैं और उनका हल भी ढूंढ चुके हैं। तो क्या उनसे हमें सबक नहीं लेना चाहिए? हर बार ज़रूरी है क्या कि जब पूरे के पूरे राज्य तबाह हो जाएं हम तभी सबक लें?

2 डिग्री ज्यादा गर्म हो जाएगी धरती

फ्रांस के दो प्रमुख अनुसंधान केंद्रों के अलग-अलग नए जलवायु मॉडल यह दिखाते हैं कि यदि कार्बन उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा तो 2100 तक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 7.0 डिग्री सेल्सियस अधिक हो सकता है। यह इंटरगवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के 2014 बेंचमार्क 5 वीं रिपोर्ट से दो डिग्री अधिक है।

वैज्ञानिकों ने कहा कि पहले जैसा अनुमान लगाया गया था, उससे अधिक तेजी से पृथ्वी की सतह गर्म हो रही है। ऐसा वायुमंडल में जीवाश्म ईंधनों ने निकलने वाले ग्रीनहाउस गैसों की वजह से हो रहा है। संयुक्त राष्ट वर्तमान में अनुमान लगाने के लिए जिन मॉडलों का इस्तेमाल कर रहा है, उनकी जगह नए मॉडल का इस्तेमाल किया जाएगा।

वैज्ञानिक कहते हैं कि नई गणना यह भी बताते हैं कि पेरिस समझौते के तहत ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री या संभव हो तो 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का जो लक्ष्य है, वह काफी चुनौतीपूर्ण होगा। उधर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है कि दुनिया जलवायु आपदा से बचने की 'रेस हार रही है' लेकिन ग्रीनहाउस गैस कटौती लक्ष्य अभी तक पहुंच से बाहर नहीं है। उन्होंने पेरिस समझौते पर दुनिया के नेताओं की एक बैठक से पहले यह बात कही। एंटोनियो गुटेरेस ने कहा, "समाज के सभी लोगों को सरकार पर दबाव बनाना चाहिए कि सरकार तेजी से काम करे क्योंकि हम रेस हार रहे हैं। विज्ञान हमें यह बताता है कि जो लक्ष्य रखा गया है, उसे हम अभी भी प्राप्त कर सकते हैं।" गुटेरेस ने यूरोप का उदहरण भी दिया जहां अब मात्र तीन देश ही 2050 तक कार्बन न्यूट्रलिटी का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत और चीन में नवीकरणीय उर्जा को बढ़ावा देने का काम हो रहा है।

कटते वृक्ष और पहाड़ से घटता जीवन

वृक्ष धरती की आत्मा की तरह है। इन्हें ईश्‍वर का प्रतिनिधि कहा गया है। ब्राजिल, अफ्रिका, भारत, चीन, रशिया और अमेरिका के वनों को तेजी से काटा जा रहा है। खासकर वर्षावन के कट जाने से धरती का वातावरण बदल रहा है। वायुमंडल से कार्बनडाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, सीएफसी जैसी जहरीली गैसों को सोखकर धरती पर रह रहे असंख्य जीवधारियों को प्राणवायु ‘आक्सीजन’ देने वाले जंगल आज खुद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वर्तमान समय में किसी वयस्क व्यक्ति को जिंदा रहने के लिए जितनी ऑक्सीजन की जरूरत है, वह उसे 16 बड़े-बड़े पेड़ों से मिल सकती है। लेकिन पेड़ों की अंधाधुँध कटाई से उनकी संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है।

भारत में पेड़ों की उपलब्धता की स्थिति काफी चिंताजनक है। उनके अनुसार ‘भारत में प्रति 36 लोगों के लिए एक पेड़ है। कोलकाता जैसे महानगर में 15 हजार लोगों के लिए एक पेड़ है। वर्ष 1988 में पटना शहर में जहाँ प्रति ढाई हजार लोगों के लिए एक पेड़ था, वहीं अब चार हजार व्यक्तियों पर एक पेड़ है। हालात दिन पर दिन गंभीर हो रहे हैं। इसी स्थिति से आप दुनिया का अनुमान लगा सकते हैं।

जंगल का सिर्फ यही रोल नहीं है। जंगल है तो पशु-पक्षी हैं, जीव जंतु और अन्य प्रजातियां हैं। अब भारत और अफ्रिका के जंगलों में शेर, हिरण, नीलगाय, हाथी, गेंडा आदि सैंकड़ों जानवरों की संख्या कम हो गई है। कई प्रजातियां तो लुप्त हो चली है और अभी कई लुप्त होने की कतार में हैं। वृक्षों के कटने से पक्षियों के बसेरे उजड़ गए तो फिर पक्षियों की सुकूनदायक चहचहाहट भी अब शहर से गायब हो गई है। नदियों की घाटी के जंगलों की लगातार कटाई से कई दुर्लभ वनस्पतियां अब दुर्लभ भी नहीं रहीं।

इसके अलावा नदी‍ किनारे के और पहाड़ों के वृक्ष कट गए हैं। भारत के बहुत से पहाड़ खतरे में हैं। विंध्याचल की पर्वत श्रेणियों का अस्तित्व अब खतरे में हैं। बहुत से शहर जहां पर पर्वत, पहाड़ी या टेकरी हुआ करते थे अब वहां खनन कंपनियों ने सपाट मैदान कर दिए है। पर्वतों के हटने से मौसम बदलने लगा है। गर्म, आवारा और दक्षिणावर्ती हवाएं अब ज्यादा परेशान करती है। हवाओं का रुख भी अब समझ में नहीं आता कि कब किधर चलकर कहर ढहाएगा। यही कारण है कि बादल नहीं रहे संगठित तो बारिश भी अब बिखर गई है।

यही चलता रहा तो भविष्य में रहेगा सिर्फ रेगिस्तान और समुद्र। भविष्य में धरती पर दो ही तत्वों का साम्राज्य रहेगा- रेगिस्तान और समुद्र। समुद्र में जीव-जंतु होंगे और रेगिस्तान में सिर्फ रेत। जहां तक सवाल बर्फ का है तो यह पीघलकर समुद्र में समा जाएगी। सहारा और थार रेगिस्तान की लाखों वर्ग मील की भूमि पर पर्यावरणवादियों ने बहुत वर्ष शोध करने के बाद पाया कि आखिर क्यों धरती के इतने बड़े भू-भाग पर रेगिस्तान निर्मित हो गए। उनके अध्ययन से पता चला कि यह क्षेत्र कभी हराभरा था, लेकिन लोगों ने इसे उजाड़ दिया। प्रकृति ने इसका बदला लिया, उसने तेज हवा, धूल, सूर्य की सीधी धूप और अत्यधिक उमस के माध्यम से उपजाऊ भूमि को रेत में बदल दिया और धरती के गर्भ से पानी को सूखा दिया।

जानें कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां 

  • दुनियाभर में 3 ट्रिलियन यानी 3,040,000,000,000 (एक लाख करोड़) पेड़ हैं।

  • हर साल 15.3 अरब पेड़ काटे जा रहे हैं। इस तरह से 2 पेड़ प्रति व्यक्ति से भी ज्यादा का नुकसान हो रहा है।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार मानव सभ्यता की शुरुआत (करीब 12 हजार साल पहले) के समय धरती पर जितने पेड़ थे, उसमें आज की तारीख में 46 फीसदी की कमी आई है।

  • भारत के लिहाज से बात करें तो देश में प्रति व्यक्ति सिर्फ 28 पेड़ ही आते हैं। भारत में पेड़ों की संख्या करीब 35 अरब है। जबकि चीन में 139 अरब पेड़ हैं और प्रति व्यक्ति के लिहाज से 102 पेड़ आते हैं।

  • वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो सबसे ज्यादा पेड़ रूस में है जहां 641 अरब पेड़ हैं तो इसके बाद कनाड़ा, ब्राजील और अमेरिका का नंबर आता है जहां क्रमशः 318, 301 और 228 अरब पेड़ हैं।

  • प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सबसे घने पेड़ उत्तरी अमेरिका, स्कैंडेनविया और रूस में हैं। इन इलाकों में करीब 750 बिलियन पेड़ (750,000,000,000) हैं जो वैश्विक स्तर का करीब 24 फीसदी है।

  • दुनिया के जमीनी क्षेत्र में करीब 31 फीसदी क्षेत्र जंगलों के घिरे हुए हैं, लेकिन इनमें तेजी से गिरावट आती जा रही है। 1990 से 2016 के बीच दुनिया से 502,000 स्क्ववायर मील (13 लाख स्क्वायर किलोमीटर) जंगल क्षेत्र खत्म हो गए हैं।

  • इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (आईएसएफआर) के अनुसार, 2017 में भारत में 708,273 स्क्वायर किलोमीटर यानी देश की कुल जमीन का 21.54% हिस्से पर ही जंगल हैं। जबकि सीआईए की वर्ल्ड फैक्ट बुक 2011 के अनुसार, दुनिया में 39,000,000 स्क्वायर किलोमीटर जमीन पर जंगल हैं।

  • रोजाना 27 फुटबॉल मैदान जितने नष्ट हो रहे जंगल।

  • विश्व बैंक के अनुसार, अब तक दक्षिण अफ्रीका से ज्यादा बड़े इलाके के जंगल दुनिया से खत्म हो गए हैं।

  • पिछले 50 सालों में अमेजन जंगल के क्षेत्र में 17 फीसदी की कमी आई है।

  • दुनिया में भले ही लोग अपने फायदे के लिए पेड़ काट रहे हों और जंगलों को खत्म करते जा रहे हों, लेकिन इसी जंगल के कारण दुनिया में 1 करोड़ 32 लाख लोगों (13.2 मिलियन) को रोजगार मिला हुआ है जबकि करीब 4 करोड़ 10 लाख लोगों को इस सेक्टर से जुड़े अन्य मामलों में रोजगार मिला हुआ है।

  • पेड़ों के लगातार कटाव से वन क्षेत्र लगातार खत्म होते जा रहे हैं। हम सलाना 1 करोड़ 87 लाख (1.87 मिलियन) एकड़ जंगल खोते जा रहे हैं यानी कि हर मिनट 27 फुटबॉल मैदान के बराबर जंगल नष्ट होते जा रहे हैं।

  • एक दशक पहले तंजानिया का कोकोटा द्वीप लगातार पेड़ों के काटे जाने के कारण जंगलों की जबर्दस्त कमी आ गई थी और वहां के लोगों को लगा कि क्षेत्र में अब फिर से कभी भी जंगल नहीं दिखेगा, लेकिन पास के पेंबा द्वीप ने एक नई मिसाल पेश की। 2008 में फिर से क्षेत्र को हरा-भरा बनाने का काम शुरू हुआ और तब से लेकर 2018 तक पेंबा और कोकोटा द्वीप पर 20 लाख से ज्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं।

  • उक्त आंकड़े दिखाते हैं कि पेड़ों का कटना और जंगलों के खत्म होने का सिलसिला थम नहीं रहा है। अगर यही चलता रहा तो बहुत जल्द धरती का बड़ा हिस्सा बंजर हो जाएगा। जंगल खत्म हो गए तो करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छीन जाएगी। ऐसे में जरुरी है कि जंगल भी बचाए जाएं और धरती को हरी-भरी रखी जाए जिससे आने वाली पीढ़ियां भी खूबसूरत धरती को निहार सके।

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