बेलगाम कर्नाटक पुलिस

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घटना - पिछले दिनों 33 वर्षीया नंदिनी (बदला हुआ नाम) के पति पर व्यवसायिक मतभेद को लेकर किसी ने केस कर दिया। माराथहल्ली पुलिस थाने में नंदिनी के पति को बुलाया गया और उनसे सवाल जवाब किया गया। इससे भी जब उनका मन न भरा तो उन्होंने नंदिनी को थाने में बुलाया और दंपत्ति के आपसी बैंक में एक लाख के मामूली ट्रांसेक्शन्स को लेकर पूछताछ शुरू कर दी, जिसका इस केस से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था। नंदिनी बताती है कि बात यहीं पर रुकी नहीं और मेरे जवाबों पर असंतुष्टि व्यक्त करते हुए थाना प्रभारी ने बिना किसी जांच और प्रमाण के मुझे थाने पर रोक लिया, जिसके बाद पूरी रात विभिन्न तरीकों से मुझे प्रताड़ित किया गया। नंदिनी (सिसकते हुए) बताती है कि वो रात सबसे डरावनी रातों में से एक था और उस रात के बाद काफी कुछ बदल गया। मैंने अब शहर की पुलिस व्यवस्था पर भरोसा करना छोड़ दिया है।

बेंगलूरु, माराथहल्ली, (परिवर्तन)। यह घटना दूर से जैसा दिखता है, पास से उतना ही डरावना है। लेकिन आज सिलिकॉन वैली और आईटी सिटी बेंगलूरु में ऐसी घटनाएं आम हो गई है। शहर की महिलाएं अब अपनी शिकायतों को पुलिस थाने तक ले जाने में डरने लगी है। ऐसा इसीलिए क्योंकि ज्यादातर पुलिस थानों में इन दिनों महिलाओं से अभद्र व्यवहार करने और उन्हें प्रताड़ित करने के मामले सामने आ रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर हमारे साप्ताहिक अखबार परिवर्तन में लगातार विरोध जताया जा रहा है। इस मामले में ब्योरोक्रेसी की छवि पर कई तरह के सवाल खड़े किए गए हैं। परंतु फिर भी केंद्र और राज्य सरकार ने अब तक इस पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई है। समाचार परिवर्तन अखबार की ओर से किए गए एक सर्वे में काफी चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इस सर्वे के दौरान देश के अलग अलग हिस्सों में करीब एक हजार लोगों से स्थानीय पुलिस प्रशासन के कार्यों को लेकर बात की गई जिसमें लगभग 96 प्रतिशत लोगों ने ब्योरोक्रेसी पर भ्रष्ट होने और अपनी मनमानी चलाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि राजनीति से भी ज्यादा भ्रष्टाचार ब्योरोक्रेसी में है। लोगों ने यह तक कहा कि आज के समय में पुलिस स्टेशनों को काम जनता की सेवा या उनकी मदद करने के लिए नहीं बल्कि सरकार के एक कलेक्शन सेंटर के रूप में किया जा रहा है। जहां हर रोज लोगों को सामान्य सी शिकायत लिखवाने के लिए भी अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। शायद यही वजह है कि राज्य और केंद्र सरकार ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है।

ब्योरोक्रेसी नहीं है सरकार के अधीन

वर्तमान समय में देश की हालत किस दिशा में जा रही है, यह कह पाना या इसका अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल हो गया है। हालिया कुछ घटनाओं के मद्देनजर अगर देखें तो समझ आएगा कि आज के समय में ब्योरोक्रेसी सरकार के अधीन रही नहीं। उनके काम करने का तरीका एवं कार्यों का निर्णय अब वे खुद लेते हैं। स्थानीय पुलिस स्टेशनों की हालत को देख कर लगता है कि पुलिस ने जनता पर तो कई पावंदियां लगा रखी हैं लेकिन ब्योरोक्रेसी खुद बेलगाम हो गई है। वसवनगुड़ी के रहने वाले रोहित बताते हैं कि कई बार छोटे छोटे कार्यों के लिए हमें थाने के कई चक्कर काटने पड़ते हैं। अगर पुलिस अधिकारी चाहे तो लोगों को बिना परेशान किए भी समस्या का समाधान किया जा सकता है लेकिन पता नहीं क्यों पुलिस स्टेशन में वर्दी पहन कर बैठे अधिकारी अकड़ दिखाने को ही अपनी ताकत समझते हैं। वे बताते हैं कि दुख की बात तो यह है कि कुछ कागजों की चोरी की शिकायत दर्ज करने के लिए भी मुझे लगभग सात बार थाने के चक्कर लगाने पड़े। अब इतने छोटे से कार्य के लिए आम जनता को इस तरह परेशान करना कहां तक सही है। वे कहते हैं कि ब्योरोक्रेसी पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है।

भ्रष्ट ब्योरोक्रेसी से जनता परेशान

आए दिन आपने सुना होगा कि अक्सर किसी विवाद को लेकर जब पुलिस द्वारा मामले में हस्तक्षेप किया जाता है तो मामले को सुलझाने के लिए विवाद पैदा करने वाली दोनों पार्टियों से पैसे ऐंठे जाते हैं। चाहे मामला ट्राफिक नियमों के उल्लंघन का हो, या चाहे किसी आपसी विवाद का, पुलिस का काम होता है मामले को सुलझाना। लेकिन यहां उसके ऐवज में पुलिस अधिकारियों द्वारा पैसे वसूले जाते हैं। केवल इतना ही नहीं मल्लेश्वरम के रहने वाले विकास (काल्पनिक नाम) बताते हैं कि जमीन विवाद को लेकर जब मैं स्थानीय पुलिस थाने में कंप्लेंट कराने पहुंचा तो उन्होंने शिकायत दर्ज करने के बदले मुझसे पैसे मांगे। मैंने जब इसका विरोध किया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारी शिकायत बेबुनियाद है और इससे कुछ नहीं होने वाला। यह कह कर उन्होंने शिकायत दर्ज करने से इंकार कर दिया। बाद में मुझे उन्हें कुछ पैसे देने पड़े, जिसके बाद उन्होंने मेरी शिकायत दर्ज की। अतः यह बात तो साफ हो गई कि ब्योरोक्रेसी में आज भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। अब अंडर टेबल नहीं तो अन्य माध्यमों से आम जनता से पैसे वसूले जा रहे हैं। जिस देश में ब्योरोक्रेसी ही भ्रष्ट होगी उस देश की जनता मदद के लिए गुहार लगाए भी तो किससे?

भ्रष्टाचार को रोकने में सरकार नाकाम

बात चाहे केंद्र सरकार की हो या चाहे राज्य सरकार की, दोनों ही ब्योरोक्रेसी में भ्रष्टाचार को रोकने में नाकाम साबित हुए हैं। बात अगर केंद्र सरकार की करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा करते हुए यह कहा था कि अब पैसे लेन देन के सभी माध्यमों को डिजिटल बनाया जाएगा जिससे भ्रष्टाचार पर लगाम लग सकेगी, जो कई हद तक सही भी साबित हुई। लेकिन देश के पुलिस स्टेशनों का हाल आज भी जस का तस है। यहां आज भी अंडर टेबल का फंडा जिंदा है और यह तेजी से फल फूल रहा है। पहले की तुलना में अब बेलगाम पुलिस अधिकारी जनता से मनचाहे तरीकों से पैसे वसूलते हैं। वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार यानि कर्नाटक सरकार भी ब्योरोक्रेसी पर लगाम लगाने में बुरी तरह से असफल रही है। आम जनता का मानना है कि अब तो लगता है मानों ब्योरोक्रेसी सरकार के अधीन ही नहीं है, जिसकी वजह से ब्योरोक्रेसी में किसी प्रकार का डर भी नहीं रहा। यानी ब्योंरिक्रेसी के कार्यों की निगरानी न होने की वजह से उनके द्वारा लिए गए गलत फैसलों और कार्यों के लिए उन पर कार्यवाही नहीं होती। इससे जनता को एक बुरा संदेश जाता है कि अब चाहे नैतिक हो या अनैतिक ब्योरोक्रेसी कुछ भी कर सकती है, लेकिन अगर आम जनता से किसी प्रकार की कोई गलती हो तो इसके लिए कानूनी कार्यवाही और सज़ा का प्रावधान है। तो क्या हम यह मान लें कि इस देश में ब्योरोक्रेसी पुलिस वालों को कुछ भी करने की खुली छूट है और इन पर कोई कार्यवाही नहीं होगी व इन्हें सरकार का समर्थन है। लेकिन जो जनता सरकार बनाती है, उस जनता से अगर कोई गलत काम न भी हो तो भी पुलिस प्रशासन उन्हें किसी मामले में फंसा कर सजा दिलवा सकते हैं। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि पुलिस प्रशासन के अंदर हो रहे भ्रष्टाचार की भनक सबको हैं लेकिन इस पर न किसी ने आवाज उठाया है और न ही इस दिशा में कोई कार्य किया है।

देश में असुरक्षा की भावना

आज यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह देश जनता के लिए खासतौर पर महिलाओं के लिए काफी असुरक्षित होता जा रहा है। केवल देश की महिलाएं ही नहीं बल्कि हर साल विदेशों से आने वाली सैलानियों में कई महिलाओं पर होने वाली विभिन्न प्रकार के जघन्न अपराध की घटनाएं सामने आई हैं। इससे यह साबित होता है कि विदेशों से आने वाले यात्री भी इस देश में सुरक्षित नहीं है। हालांकि इन घटनाओं के बावजूद सरकार एवं पुलिस प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगती और देश में लगातार असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है। एक हालिया सर्वे में यह बात सामने आई है कि देश में पिछले दस सालों में सैलानियों की संख्या बूरी तरह से कम हो गई है, जिसका सीधा कारण भारत में असुरिक्ष माहौल को बताया गया है। अगर सरकार ने जल्द ही मामले को संज्ञान में नहीं लिया तो वो दिन दूर नहीं जब विदेशों से सैलानियों का भारत भ्रमण करने आना बंद ही हो जाए।

समस्या का हल क्या ?

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को उनकी गलती पर अक्सर स्थानांतरण कर दिया जाता है। जबकि स्थानांतरण इस समस्या का हल कतई नहीं है। थाने से पुलिस कर्मियों का तबादला समस्या को नजरअंदाज करने की कला को दर्शाता है। वे बताते हैं कि कई बार बेवजह महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है और अगर रक्षक ही भक्षक बन जाएंगे तो महिलाओं के सुरक्षा की गारंटी लेगा कौन? विशेषज्ञ कहते हैं कि इस प्रकार के जघन्न कामों में लिप्त पाए जाने वाले पुलिस कर्मियों का तबादला नहीं बल्कि हर एक को निलंबित कर दिया जाना चाहिए ताकि आने वाले नए युवा पुलिस कर्मियों के लिए एक मिसाल कायम की जा सके। अधिकारी बताते हैं कि यह समस्या केवल कर्नाटक राज्य की नहीं है बल्कि देश के विभिन्न राज्यों की भी है। ऐसे में अपराध में शामिल पाए जाने वाले पुलिस कर्मियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले इसके प्रावधान बनाए जाने चाहिए। सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसे मामलों में केंद्र सरकार के कान में जूं भी नहीं रेंगती। लेकिन मेरा मानना है कि छोटे अपराध को बड़ा बनने देने का इंतजार नहीं करना चाहिए और केंद्र सरकार को इन मामलों में हस्तक्षेप जरूर करना चाहिए। उनका कहना है कि कहीं ऐसा न हो कि कल देश की जनता का पुलिस प्रशासन पर से भरोसा उठ जाए और केवल आतंक का माहौल बना रहे।

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