तीखे चुनावी बोल

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निर्वाचन आयोग की सख्ती के बाद भी बड़बोले नेताओं की बेतुकी बयानबाजी थमती न दिखना चिंताजनक है। हैरानी यह है कि नेता वैसे ही आपत्तिजनक बयान देनेे में लगे हुए है, जैसे बयानों के लिए उन्हें चुनाव प्रचार करने से रोका जा चुका है। इस मामले में ताजा उदाहरण पंजाब सरकार के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू का है।

उन्होंने बिहार में एक जनसभा में मुसलमानों को चेताते हुए करीब-करीब वैसा ही बयान दे डाला, जैसा बसपा प्रमुख मायावती ने दिया था और जिसके चलते उन्हें दो दिन के लिए चुनाव प्रचार से रोका गया। क्या यह संभव है कि सिद्धू इससे अनजान हों कि निर्वाचन आयोग ने कैसे बयानों के लिए किन-किन नेताओं को चुनाव प्रचार से रोका है? साफ है कि उन्होंने निर्वाचन आयोग की परवाह नहीं की। मुश्किल यह है कि ऐसे नेताओं की कमी नहीं जो आदर्श आचार संहिता की अनदेखी करने में लगे हुए हैं। इस मामले में किसी एक राजनीतिक दल को दोष नहीं दिया जा सकता। तथ्य यह भी है कि यह जरूरी नहीं कि निर्वाचन आयोग हर तरह के आपत्तिजनक बयानों और अनुचित तौर-तरीकों का संज्ञान ले पा रहा हो। यह ठीक है कि तमिलनाडु के वेल्लोर लोकसभा क्षेत्र में मतदाताओं को पैसे बांटने के सिलसिले का उसने समय रहते संज्ञान लेकर वहां चुनाव रद्द कर दिया, लेकिन यह कहना कठिन है कि वह हर उस क्षेत्र में निगाह रख पा रहा होगा, जहां मतदाताओं को पैसे बांटकर प्रभावित किया जा रहा होगा। इसी क्रम में इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश के कलाकार चुनाव प्रचार करने में लगे हुए थे, लेकिन निर्वाचन आयोग को खबर तब हुई, जब इसकी शिकायत की गई। विचित्र और हास्यास्पद यह है कि बांग्लादेशी कलाकार तृणमूल कांग्रेस के जिन नेताओं के लिए वोट मांग रहे थे, उनकी दलील यह है कि उन्हें तो इस बारे में कुछ पता ही नहीं। यह दलील और कुछ नहीं निर्वाचन आयोग को धोखा देने की कोशिश ही है।

आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के बढ़ते मामले, मतदाताओं को बांटे जाने वाले पैसे की बरामदगी का कोई ओर-छोर न दिखना और विरोधियों अथवा खास जाति, समुदाय, वर्ग को लेकर दिए जाने वाले बेजा बयानों का बेरोक-टोक सिलसिला यही बताता है कि हमारी चुनाव प्रक्रिया ही नहीं, राजनीति भी बुरी तरह दूषित हो चुकी है। नि:संदेह इतने बड़े देश में जहां राजनीतिक दलों की भारी भीड़ है, वहां चुनाव प्रचार के दौरान आरोप-प्रत्यारोप का जोर पकड़ लेना स्वाभाविक है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि नेतागण गाली-गलौज करने अथवा मतदाताओं को धमकाने को अपना अधिकार समझने लगें। विडंबना यह है कि वे केवल यही नहीं कर रहे, बल्कि झूठ और फरेब का भी सहारा ले रहे हैं। यह स्थिति यही बताती है कि भारत दुनिया का बड़ा लोकतंत्र भले हो, लेकिन उसे बेहतर लोकतंत्र का लक्ष्य हासिल करने के लिए अभी एक लंबा सफर तय करना है। समय के साथ स्थितियां सुधरने की अपेक्षा तभी पूरी हो सकती है जब राजनीतिक दल येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने की अपनी प्रवृत्ति का परित्याग करते हुए दिखेंगे। फिलहाल वे ऐसा करते नहीं दिख रहे हैं।

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