प्रार्थना करना बेकार है - ओशो

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यहां तक कि इच्छाहीन होने की इच्छा भी एक इच्छा है। ओशो बताते हैं कि हमें हमारी सुसुप्तावस्था से जागने की आवश्यकता क्यों है। जब आप इच्छाओं से भरे होते हैं तो आपके दुखों में वृद्धि हो जाती है बिल्कुल वैसे ही जैसे बारिश के बाद घास बढ़ जाते हैं, लेकिन अगर आप अपनी इच्छा को अपने वश में कर लेते हैं तो आपके दुख कम हो जायेंगे बिल्कुल वैसे ही जैसे एक कमल के फूल पर पानी की बूंदें होती हैं। यह एक अच्छी सलाह है जो सभी लोगों के लिए है। जैसे नई जड़ों के लिए घास का सफाया कर दिया जाता है वैसे ही अपनी इच्छाओं को खत्म करें, नहीं तो मौत आपको वैसे ही तबाह करेगी जैसे एक नदी असहाय गन्नों को तबाह करती है। अगर खेत में जड़ की पकड़ मजबूत हो तो एक गिराया हुआ पेड़ फिर से खड़ा हो जाता है, उसी तरह अगर इच्छाओं को जड़ से नहीं उखाड़ा गया तो आपके अंदर फिर से दुख की जड़ें मजबूत हो जायेंगी - गौतम बुद्ध, धम्मपद।

मानवता के लिए गौतम बुद्ध का मौलिक संदेश यह है कि आदमी सुसुप्तावस्था में है। आदमी पैदा ही सुसुप्तावस्था में हुआ है। गौतम बुद्ध साधारण नींद के बारे में बात नहीं कर रहे हैं बल्कि वो आध्यात्मिक नींद के बारे में बात कर रहे हैं। ये नींद गहरी और अचेत अवस्था में आपके अंदर निवास करती है। आप उस अचेतावस्था के साथ काम करते हैं। इसलिये आप जो भी करते हैं वो गलत हो जाता है। आपके अंदर अगर चेतना का अभाव है तो ऐसे में सही काम करना असंभव हो जाता है। यह अचेतावस्था आपके सभी प्रयासों में बाधा डालती रहती है। यह आपको गलत दिशा दिखाती है। इच्छाओं का त्याग तब तक नहीं किया जा सकता है जबतक आप जागृत अवस्था में नहीं आ जाते। लाखों लोगों ने खुद को जागृत किए बिना इच्छाओं को त्यागने की कोशिश की है।

वास्तव में इच्छाओं को त्यागने का विचार भी एक दूसरी इच्छा ही है, इसके अलावा और कुछ नहीं। उन्होंने एक जागृत मनुष्य गौतम बुद्ध से सुना कि अगर आप इच्छाओं को त्यागते हैं तो आपको शांति मिलेगी, अगर आप इच्छाओं को दूर कर देते हैं तो आपको आनंद मिलेगा जो अनंतकाल तक रहेगा। इच्छाओं को त्यागने के बाद आप ना जन्म के बारे में सोचेंगे और ना ही मृत्यु के बारे में। आप एक सार्वभौमिक उत्सव का हिस्सा बन जायेंगे जो हमेशा चलता ही रहेगा, अगर आप इच्छाओं का त्याग करते हैं। लाखों लोग लालची बन गये और इच्छाओं को त्यागने के बारे में सोचने लगे ताकि उन्हें अनंत काल तक आनंद की प्राप्ति होती रहे। अब क्या यह एक नई इच्छा नहीं है जो आपके अंदर जन्म ले रही है? भक्ति की इच्छा, सच की इच्छा, मुक्ति की इच्छा, इच्छाहीन होने की इच्छा, ये सब भी इच्छा का ही एक रूप है। आपने सारी बातों को एक बार फिर से गलत तरीके से समझा है। आपके अंदर एक नई इच्छा यानि कि धार्मिक इच्छा ने जगह ले ली है।

इच्छाओं को त्यागना तब तक कठिन है जब तक आप जागृत नहीं होते। जब आप सुप्त अवस्था में होते हैं तो इच्छाओं का जगना एक प्राकृतिक घटना है। इच्छा एक स्वप्न के अलावा कुछ और नहीं है। जब आप जागते हैं तो स्पप्न गायब हो जाते हैं। आपने इसलिये इसे गलत तरीके से समझा है क्योंकि मुख्य बिंदु यह है कि आपको इच्छाओं के खिलाफ लड़ना नहीं है बल्कि आपको अपनी नींद के खिलाफ लड़ना है। यह आपकी जड़ काट रही है वर्ना आप बिल्कुल वैसे ही हैं। अगर आप अचेत अवस्था में काम करेंगे तो भले आप कुछ भी करें परिणाम वही रहेगा। आप सपनों में जी रहे हैं। आप सपना क्यों देखते हैं? आप सपना देखते हैं क्योंकि आपकी ऐसी कई इच्छाएं हैं जो अधूरी हैं और उन अधूरी इच्छाओं के साथ जीना दुखदायी है। अपने सपने में आप उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। आप उसे पूर्ण करने के चक्कर में एक गलत भावना को जन्म देते हैं। इसलिये आपका स्वप्न कुछ हद तक आपके बारे में ही है जैसे कि, आपकी इच्छा क्या है और आप क्या बनना चाहते हैं। जो व्यक्ति जागृत अवस्था में है, वह जानता है कि जाने के लिए कोई स्थान नहीं है और ना ही कुछ बनने के लिए। वह पहले से ही वो है जो वो बन सकता है। उसके अस्तित्व की महिमा को देखकर उसके इरादों के अनुरूप इच्छाएं खुद ही दूर चली जाती हैं। यहां तक कि आपको उसे त्यागने की आवश्यकता नहीं है बल्कि वो खुद ही खत्म हो जाती हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे पेड़ से सूखे पत्ते गिरते हैं।

इसलिए बुद्ध ‘प्रार्थना’ करने के लिए कभी नहीं कहते बल्कि वो ‘ध्यान’ करने के लिए कहते हैं। आप क्या प्रार्थना करते हैं? आप कुछ न कुछ मांगने के लिए हमेशा प्रार्थना करते हैं, जो एक इच्छा है। आप चर्च और मंदिर जाकर लोगों की प्रार्थनाएं सुन सकते हैं और इसे सुनकर आपको आश्चर्य होगा। वो हमेशा कुछ न कुछ मांगते ही रहते हैं। उनकी प्रार्थनाएं गंभीर नहीं है। वो वहां भगवान का शुक्रिया अदा करने नहीं जाते और ना ही उनकी प्रार्थानाएं कृतज्ञताओं से भरी हुई हैं, बल्कि उनकी प्रार्थनाएं शिकायतों से भरी रहती हैं। बुद्ध कहते हैं: प्रार्थानाओं से खुद को परेशान ना करें क्योंकि आप सुसुप्तावस्था में हैं और आपकी प्रार्थना इच्छाओं से बंधी हुई है। आपका वैराग्य कुछ और नहीं बल्कि आपकी इच्छा की अभिव्यक्ति से बंधा हुआ है जो एक गहरा उल्लास है। इसलिए सभी धर्म स्वर्ग और परलोग की खुशी और सुख के बारे में बात करते हैं। ये सारे प्रलोभन ही लोगों को पूजा स्थल की ओर आकर्षित करते हैं। खामोशी में जाएं क्योंकि खुद को जागृत करने की सही जगह खामोशी ही है। खामोशी एक तीर की तरह आपके केंद्र में जा लगती है, जो आपको जगाती है। और जब आप जाग जाते हैं तो आपका पूरा जीवन ही एक प्रार्थना बन जाता है।

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