तेल के दामों से जेब पर डाका

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

आपकी जेब पर डाका डाला जा रहा है और आश्चर्य की बात ये है कि आपको इसकी भनक भी नहीं पड़ रही। क्योंकि पहले से ही भूमिकाएं तैयार किए जा रहे है। देश की बदहाली को दिखाया जा रहा है। अर्थव्यवस्था की सुस्त हालत और खिसकते जीडीपी दर को सामने लाया जा रहा है। हालांकि आश्चर्य की बात ये भी है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर लगाम के तरीके पर केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक सभी ने चुप्पी साध रखी है। इससे स्पष्ट है कि फिलहाल इन पर टैक्स कटौती की कोई बात या पहल तक नहीं की जाएगी। इसके साथ ही सरकार की ओर से यह संकेत मिल गए है कि तेल के दामों में राहत की चिंता भूला कर हमें वैकल्पिक ईधन के बारे में सोचने की जरूरत है। जी हां, ये बात केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कही। पेट्रोल व डीजल की बढ़ती कीमतों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने देश को वैकल्पिक ईधन अपनाने की सलाह दी। गडकरी ने कहा कि वह पहले से ही बिजली को ईधन के रूप में अपनाने की बात कर रहे हैं, क्योंकि देश में बिजली की आपूर्ति उसकी मांग से अधिक है। हालांकि उनके इस जवाब से आम आदमी को क्या संतोष मिलेगा ये तो राम ही जानें। 

स्पष्ट बात ये है कि डीजल की कीमत में बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ेगी, जिससे देश का विकास सीधे प्रभावित होगा। देश का विकास कई मापदंडो पर निर्भर करता है, जिनमें से तेल एक है। अगर हम बात सरकारी आंकड़ों की करें तो पिछले साल अप्रैल-नवंबर में पेट्रोल व डीजल के केंद्र सरकार को उत्पाद शुल्क से 1,96,342 करोड़ रुपये की आय प्राप्ति हुई जबकि उससे पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 1,32,899 करोड़ रुपये रहा था। केंद्र सरकार ऐसा कोई भी फैसला नहीं लेगी जिससे रोजकोषीय घाटा प्रभावित हो। हालांकि यह तभी होता जब सरकार उत्पाद शुल्क को कम करने जैसा कोई फैसला लेगी। आंकड़े बताते हैं आज के समय में करीब एक लीटर पेट्रोल की बिक्री होने पर केंद्र सरकार को उत्पाद शुल्क के रूप में 32.98 रुपये और एक लीटर डीजल पर सरकार को 31.83 रुपये मिलते हैं। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि कोरोना काल में विभिन्न राज्यों की वित्तीय हालत भी खराब हुई है। इसलिए राज्य भी वैट में कटौती करने की पहल नहीं कर रहे हैं। राज्य पेट्रोल-डीजल पर 16-38 फीसद तक वैट वसूलते हैं।

दरअसल रिफाइनरी से पेट्रोल पंप तक के तेल के सफर के दौरान टैक्स, कमीशन और तेल कंपनियों का मुनाफा सामान्य होता है। भारत के संदर्भ में इसे देखें तो रिफाइनरी पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट निकालती हैं। यहां तेल कंपनियां अपना मुनाफा वसूलने के बाद तेल को पेट्रोल पंप तक पहुंचाती हैं। अब पेट्रल पंप मालिक प्रति लीटर तयशुदा कमीशन भी लेता है। रिटेल प्राइस में एक्साइज ड्यूटी और वैट और सेस भी जुड़ता है जिससे उपभोक्ता को अपनी काफी जेब ढीली करनी पड़ती है। यानि कि रिफाइन करने के बाद तेल कंपनियां चार्ज लेकर तेल को आगे बढ़ाती हैं। अब इस पर एक्साइज ड्यूटी, रोड सेस और कृषि सेस लगया गया है। इसके बाद नंबर आता है पेट्रोल पंप मालिक के कमीशन का। वे पेट्रोल पर प्रति लीटरके हिसाब से कमीशन लेती हैं। इन सबके ऊपर फिर वैट लगता है। इस तरह क्रूड ऑइल से रिटेल में आते-आते तेल की कीमत करीब 3 से 4 गुना बढ़ जाती हैं। कआई राज्यों में शराब की बिक्री पर अतिरिक्त टैक्स लगाया है। मामला यहां तो समझ में आता है कि शराब देश के कुछ प्रतिशत लोग ही पीते हैं, लेकिन जहां बात पैट्रोल और डीज़ल जैसे मूलभूत चीजों जैसी हो तो सरकार को थोड़ी रियायत देनी चाहिए। पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी से केवल आम नागरिकों को सिर पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा। 

केंद्र सरकार से हमारा सवाल यह है कि देश की मौजूदा हालात को नज़रअंजाद कर भारत में तेल की कीमतों में कोई गिरावट क्यों नहीं की जा रही है। क्या ये केंद्र सरकार का दायित्व नहीं है कि वे देश की इकोनॉमी को बचाने के अन्य उपायों को अपनाने के साथ ही साथ तेल की कीमतों में कमी लाकर आम लोगों को राहत दें। 

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