आप क्या कहेंगे - आंदोलनकारी या आंदोलनजीवी !!

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

आंदोलन के बल पर ही आज भारत को स्वतंत्रता मिली। आंदोलन के दम पर ही देश में लोग अपनी बात सरकार तक पहुंचा सकते हैं। लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली है, जिसमें जनता सर्वोच्च हैं। यहाँ जनता के बीच से ही, जनता के द्वारा चुने गए लोगों के हाथों में शासन व्यवस्था के सुचारू रूप से क्रियान्वयन की जिम्मेदारी होती हैं, लेकिन जब इन चुने हुए लोगो के द्वारा अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से नही होता, तो एक जनाक्रोश जन्म लेता हैं। बदलाव की इच्छा धीरे-धीरे जन आंदोलन का स्वरूप ले लेती हैं और एक बार जब यह जन आंदोलन का स्वरूप ले लेती है तो इसे काबू करना मुश्किल हो जाता है। इतिहास इसका साक्षी है, इस बात का गवाह है कि जन आंदोलन के समक्ष बड़ी से बड़ी ताकत को झुकना पड़ा है। इसके विपरीत इसके अभाव में बड़ी से बड़ी क्रांति को भी विफल होना पड़ा हैं। हालांकि जन आंदोलन मीडिया द्वारा फैलाया गया कोई क्षणिक उत्तेजना नहीं हैं। यह कोई प्रायोजित घटना मात्र नहीं हैं। जन आंदोलन का लक्ष्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं हैं। इसका लक्ष्य व्यवस्था परिवर्तन भी है। मांगों को लेकर अपनी आवाज को सशक्त करना है। यह केवल भूख हड़ताल या तोड़- फोड़ नहीं हैं बल्कि यह एक सतत् प्रक्रिया हैं जो इच्छा से शुरू होती हैं और धीरे- धीरे अपना व्यापक स्वरूप लेती हैं। इसमें बुद्धिजीवियों का समावेश होता हैं। समाज का हर तबका इसमें अपनी भागीदारी देता है, जिससे लोगों में चेतना का विकास होता हैं। लोगों में अपने अधिकार के प्रति जागरूकता आती हैं। लोग सजग होते हैं और एक वास्तविक जन आंदोलन लोकतंत्र को मजबूत करता है। लेकिन अफसोस कि आज न तो जन आंदोलन को इज्ज़त भरी नज़रों से देखा जाता है और न ही आंदोलनकारियों को। इसीलिए शायद प्रधानमंत्री ने संसद में अपनी भाषण के दौरान एक नए शब्द आंदोलनजीवी और परजीवी का जिक्र किया। 

राज्यसभा में मोदी ने कहा, हम लोग कुछ शब्दों से बड़े परिचित हैं, श्रमजीवी, बुद्धिजीवी। ये सारे शब्दों से परिचित हैं। लेकिन, मैं देख रहा हूँ कि पिछले कुछ समय से इस देश में एक नई जमात पैदा हुई है, एक नई बिरादरी सामने आई है और वो है आंदोलनजीवी। माना जा रहा है कि पीएम मोदी का इशारा किसान आंदोलन से जुड़े लोगों पर था। उन्होंने आगे कहा, ये जमात आप देखेंगे, वकीलों का आंदोलन है, वहाँ नज़र आएँगे, स्टूडेंट्स का आंदोलन है, वो वहाँ नज़र आएँगे, मज़दूरों का आंदोलन है, वो वहाँ नज़र आएँगे। कभी पर्दे के पीछे, कभी पर्दे के आगे। ये पूरी टोली है जो आंदोलनजीवी है, ये आंदोलन के बिना जी नहीं सकते हैं। और आंदोलन से जीने के लिए रास्ते ढूँढते रहते हैं। प्रधानमंत्री ने ऐसे लोगों पर दूसरों के चलाए जा रहे आंदोलनों को हाइजैक करने का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि ये लोग अपने बूते आंदोलन खड़े नहीं कर सकते, बल्कि दूसरों के आंदोलनों में शामिल हो जाते हैं और उसे हथिया लेते हैं। उन्होंने कहा, हमें ऐसे लोगों को पहचानना होगा, जो सब जगह पहुँचते हैं और आइडियोलॉजिकल स्टैंड दे देते हैं, गुमराह कर देते हैं नए-नए तरीक़े बता देते हैं। देश आंदोलनजीवी लोगों से बचे। इसके लिए हम सबको...ये उनकी ताक़त है, उनका क्या है, ख़ुद खड़ी नहीं कर सकते चीज़ें, किसी की चल रही है उसमें जाकर बैठ जाते हैं। ऐसे लोगों को पहचानने की आवश्यकता है। ये सब आंदोलनजीवी हैं।

उन्होंने आगे कहा कि राज्यों में सरकार चलाने वाले दूसरी पार्टियाँ भी इसे महसूस करती होंगी। मोदी ने कहा, यहाँ पर सब लोगों को मेरी बात से आनंद इसलिए होगा क्योंकि आप जहाँ-जहाँ सरकार चलाते होंगे, वहाँ आपको भी ऐसे आंदोलनजीवी, परजीवियों का अनुभव होता होगा। उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए भी एक नए शब्द का ज़िक्र अपने भाषण में किया। मोदी ने कहा, देश प्रगति कर रहा है, हम एफ़डीआई की बात कर रहे हैं। लेकिन, इन दिनों एक नया एफ़डीआई नज़र आया है, इससे बचना होगा। ये नया एफ़डीआई है - फ़ॉरेन डिस्ट्रक्टिव आइडियोलॉजी, इससे बचने के लिए हमें और जागरूक रहने की ज़रूरत है। हालाँकि, पीएम मोदी के आंदोलनजीवी वाले बयान पर विरोधी दलों के नेताओं और कई आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं की कड़ी प्रतिक्रिया आई है। सोशल मीडिया पर इस बयान को लेकर सरगर्मी पैदा हो गई है और तमाम लोग इस पर अपनी टिप्पणियाँ दे रहे हैं। 


कब हुई देश में क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत

१८५७ की क्रांति में जब बरैकपुर में एक भारतीय सिपाही मंगल पांडे अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठा लेता है, और देखते ही देखते क्रांति की लपट बंगाल, बिहार, अवध, अम्बाला, मेरठ इत्यादि जगहों से होते हुए दिल्ली पहुंच जाती है। लेकिन मंगल पांडे, बाबू कुँवर सिंह, तात्या टोपे जैसे वीरों के शहादत के बावजूद भारत आने वाले एक सदी की गुलामी के लिए बाध्य हो गया। वास्तव में यह एक महान क्रांति थी, लेकिन, शायद यह आम लोगों में फिरंगियों से आजादी की भावना को पूरी तरह नहीं ला पाई। लोगों में आजादी की इच्छा नहीं तीव्र कर पाई। फिरंगियों को दूर भगाने की महत्वाकांक्षा लोगों में व्यापक रूप से नहीं पहुंचा पाई। अर्थात यह क्रांति जन आंदोलन के रूप में पूरी तरह से नहीं तब्दील हो पाई। अगर यह क्रांति जन आंदोलन का वास्तविक स्वरूप ले लती तो अंग्रेजो को उसी समय भारत छोड़ जाना ही परता और आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता।

शायद भगत सिंह जन आंदोलन के महत्व को अच्छी तरह समझते थे। वे आम जनता में आजादी की भावना लाना चाहते थे, शायद इसीलिए वो असेम्बली में बम फ़ैंकने के बाद भागे नहीं। अपनी गिरफ्तारी दी ताकि लोगों में यह सन्देश जा सके कि जब एक लड़का अँग्रेजों के खिलाफ खड़ा सकता हैं तो पूरा देश क्यों नहीं।

१९७७ में जब देश आपातकाल का दंश झेल रहा था, लोकतंत्र खतरे में था तब जय प्रकाश नारायण ने पटना से सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया। उन्होंने कहाँ सिहांसन छोड़ो कि जनता आती हैं और जनता उनके साथ खड़ी हो गई। देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनीं। क्षेत्रीय दलों का तेजी से उदय हुआ और देश कि राजनीति एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गई।


क्या होता है जन आंदोलन ?

जनाक्रोश का एकत्रित होकर अपना विरोध प्रदर्शन करना जन-आंदोलन कहलाता हैं। जन आंदोलन एक सामूहिक संघर्ष हैं, जो एक उद्देश्य की प्राप्ति से प्रेरित होता हैं। एक मजबूत लोकतंत्र के निर्माण में जन आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं। सामाजिक, नागरिक या व्यक्तिगत स्तर पर कोई विशेष प्रकार का सिद्धान्त एवं व्यवहार का पालन ही राजनीति कहलाती है। इस हिसाब से देखे तो जन आंदोलन की राजनीति एक स्वस्थ प्रथा है, समाज, शासन में परिवर्तन लाने का। जन आंदोलनों में निहित शक्ति बड़े से बड़े शासन व्यवस्था को हिलाने का समर्थ रखती हैं। यदि हम आजादी की लड़ाई की तरफ देखे तो प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक जन आंदोलन का ही रूप था। गांधी जी के जन आंदोलनों से सबसे बड़ा प्रभाव यह देखने को मिला कि देश के हर नागरिक के अंदर यह भावना जन्म ले चुकी थी कि वो भी देश की आजादी की लड़ाई का हिस्सा हैं, और खुद को एक महत्वपूर्ण घटक मानने लगा। इसका असर यह हुआ ही आजादी की लड़ाई में केंद्रीय भूमिका में जनता आ गई। इस आपार जन शक्ति के कारण ही असहयोग आंदोलन, नागरिक अवज्ञा आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, आदि सफल आंदोलन साबित हुए, और ब्रिटिश शासन को यह आभास कराने में कामयाब रहे कि अब देश की जनता और गुलामी नहीं सह सकती। आंदोलनों के भी कई स्वरूप होते हैं। जिसमें कुछ आंदोलनों में समाज सुधार की भावना निहित होती हैं। डॉ भीमराव अंबेडकर का शक्तिशाली आंदोलन आजाद भारत में समाज सुधार से जुड़ा एक बड़ा और सफल आंदोलन हैं, जिसका उद्देश्य समाज के हर एक वर्ग, जाति को समान अधिकार दिलाना था।


विदेशों से आ रही टिप्पणी से मचा कोहराम

बीते दिनों जानी मानी अंतरराष्ट्रीय गायिका रिहाना ने भारत में चल रहे किसान आंदोलन पर एक ट्वीट क्या किया, पूरे भारत में कोहराम मच गया गया। भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर रिहाना का नाम लिए बिना कहा, ऐसे मामलों पर टिप्पणी करने से पहले, हम आग्रह करेंगे कि तथ्यों का पता लगाया जाए और मुद्दों की उचित समझ पैदा की जाए। मशहूर हस्तियों द्वारा सनसनीखेज सोशल मीडिया हैशटैग और टिप्पणियों के प्रलोभन का शिकार होना, न तो सटीक है और न ही ज़िम्मेदारीपूर्ण है। इसके साथ विदेश मंत्रालय ने दो हैशटैग भी शेयर किए, जो दिन भर टॉप ट्रेंड बने रहे। भारत सरकार के मंत्रियों समेत कई खिलाड़ियों, फ़िल्मी हस्तियों, गायिकाओं ने भी सरकार के समर्थन में ट्वीट किए। विदेश मंत्री एस जयशंकर उन हस्तियों के ट्वीट को री-ट्वीट करते पाए गए, जो आम तौर पर ऐसा नहीं करते हैं। इसलिए विपक्ष, कुछ पत्रकार, कुछ मशहूर हस्तियाँ ये आरोप लगा रहे हैं कि सरकार ने सिविल सोसाइटी में दखल रखने वालों लोगों से अपने समर्थन में ट्वीट कराए हैं। 

यूपीए सरकार में विदेश राज्य मंत्री रहे शशि थरूर ने ट्वीट कर कहा है, सरकार की हठधर्मिता और अलोकतांत्रिक रवैए की वजह से भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुक़सान पहुँचा है। इसकी भरपाई भारतीय सेलिब्रिटी द्वारा सरकार के समर्थन में ट्वीट कराने से नहीं की जा सकती है। कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी विदेश मंत्रालय के बयान को बचकाना हरकरत करार दिया है। फैक्ट चेक बेवसाइट ऑल्ट न्यूज़ के प्रतीक सिन्हा ने #इंडियाअगेंस्टप्रोपोगेंडा ट्वीट कर दो नामचीन हस्तियों सायना नेहवाल और अक्षय कुमार के ट्वीट के स्क्रीनशॉट शेयर किया। दोनों ट्वीट शब्दश: मिलते हैं। पूर्व कांग्रेस नेता संजय झा ने ट्विटर पर लिखा कि भारत के विदेश मंत्रालय को डिप्लोमेसी की एबीसी का सबक दोबारा पढ़ने की ज़रूरत है। पूर्व बीजेपी नेता सुधींद्र कुलकर्णी ने भी ट्वीट कर लिखा है कि क्या कुछ नामी ग़ैर सरकारी हस्तियों की आलोचना मात्र से भारत की संप्रुभता ख़तरे में पड़ जाती। क्या भारतीय दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में कभी नहीं बोलते? इस मुद्दे पर पूर्व क्रिकेटर इरफ़ान पठान ने भी जॉर्ज फ़्लायड की हत्या का ज़िक्र करते हुए ट्वीट किया है। 

इसलिए सवाल उठ रहे हैं कि कुछ विदेशी हस्तियों के ट्वीट का जवाब विदेश मंत्रालय को बयान जारी कर देना चाहिए था या नहीं? क्या विदेश मंत्रालय ने पूरे मामले पर ओवर रिएक्ट तो नहीं किया? या ये सारे आरोप विपक्ष की राजनीति का हिस्सा भर है? कुछ लोग ये भी सवाल उठा रहे हैं कि जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में कैपिटल हिल हिंसा पर ट्वीट करते हैं, तो क्या ये अमेरिका के अंदरूनी मामले में दखल नहीं होता? इसलिए ये समझने की ज़रूरत है कि विदेशी नागरिकों की टिप्पणियों पर सरकारें कब बोलती है कब नहीं? भारत की मशहूर हस्तियाँ, जो आम तौर पर बड़े से बड़े आंतरिक मुद्दे पर चुप रहती हैं, वो क्यों और कैसे बोलीं? इतना ही नहीं ये भी समझने की ज़रूरत है कि रिहाना का भारत के कृषि क़ानूनों पर ट्वीट और भारत के प्रधानमंत्री का अमेरिका की कैपिलट हिल हिंसा पर ट्वीट दोनों की तुलना कितनी सही और कितनी ग़लत है।

भारतीय हस्तियों द्वारा सरकार के समर्थन में किए गए ट्वीट को प्रोफ़ेसर केसवन केंद्र सरकार की तरफ़ से किया गया पीआर एक्सरसाइज़ करार देते हैं। पीआर एक्सरसाइज़ यानी जनता के बीच सरकार की छवि सुधारने की एक मुहिम। वैसे प्रोफ़ेसर केसवन को इसमें कोई बुराई भी नज़र नहीं आती। वो कहते हैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि बेहतर करने के लिए सरकारें ऐसा करती हैं। हो सकता है कि पीआर करने का ये सबसे अच्छा तरीका ना हो, लेकिन सरकारें ऐसा क्यों ना करें? पब्लिक ओपिनियन बनाने के लिए सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण हथियार है, लेकिन परेशान करने वाली बात ये है कि इस पूरे पीआर एक्सरसाइज़ का इंचार्ज विदेश मंत्री जैसे कैबिनेट मंत्री को ना बना कर विदेश मंत्रालय के पब्लिसिटी विभाग को बनाया जाना चाहिए था। दूसरी परेशानी ये है कि ये सब बुरे तरीक़े से मैनेज किया गया। ट्वीट से साफ़ पता चल रहा था कि भारत की मशहूर हस्तियाँ सरकार की कठपुतली बन कर रह गई हैं।


किसान आंदोलन भारत का आंतरिक मामला है?


ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या किसान आंदोलन देश के बाक़ी आंतरिक मुद्दों से अलग है। भारत में पिछले 72 दिन से चल रहा किसान आंदोलन नए कृषि क़ानूनों के विरोध में चल रहा है। विदेश की कोई मशहूर हस्ती इस आंदोलन पर ट्वीट करे, तो क्या वो भारत के आंतरिक मामले में दखल माना जाना चाहिए? विवेक काटजू कहते हैं, बिलकुल, माना जाना चाहिए। किसान आंदोलन पर टिप्पणी भारत के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप है। ये नए कृषि क़ानून भारत के किसानों के लिए हैं। इन क़ानूनों से किसी दूसरे देशों पर कोई असर नहीं पड़ता। अगर कोई देश में ऐसा हादसा होता है, जिसकी वजह से दुनिया पर असर पड़ता है किसी क्षेत्र पर असर पड़ता है, या दुनिया पर असर पड़ता है, तब टिप्पणी जायज़ हो सकती है। लेकिन कृषि क़ानून पर जो भी फ़ैसले हैं, वो भारत के संविधान के तहत होंगे, उसका असर सिर्फ़ भारत पर पड़ेगा, दूसरे देश पर कोई असर नहीं होगा, तो ये भारत का आंतरिक मामला हुआ। लेकिन देश के पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का तर्क है कि किसान आंदोलन का मुद्दा मानव अधिकारों और आजीविका का मुद्दा है और इन मुद्दों को उठाने वाले लोग राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं पहचानते हैं।

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