सवालों के घेरे में सरकार - किसने बनाया कृषि बिल ? - किसी भी किसान को बिल बनाते वक्त कमीटि में शामिल क्यों नहीं किया गया

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

बीते कई समय से देश में अन्नदाता सड़कों पर हैं। हर दिन एक नई उम्मीद के साथ देश के कई किसान प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं। नए कृषि कानूनों को लेकर सरकार और किसान संगठनों के बीच टकरार जारी है। मालूम हो कि बीते सोमवार को दोनों के बीच हुई, लेकिन उस बैठक में भी कोई नतीजा निकल कर सामने नहीं आ सका। सरकार और किसान संगठन दोनों ही पक्ष अपनी बातों और मांगों पर क़ायम हैं। कोई किसी से समक्ष झूकने को तैयार नहीं। मिली जानकारी के मुताबिक सरकार और किसान संगठनों के बीच आगामी आठ जनवरी को एक बार फिर बातचीत होनी है। हालांकि उम्मीद उसमें भी काफी कम है कि इसका कोई हल निकल कर सामने आए। क्योंकि सरकार अब भी अपनी बातों पर कायम है कि ये कृषि कानून किसानों के हित के लिए बनाया गया है। जबकि किसानों का कहना है कि ये कानून उनके हित के खिलाफ है और इससे किसानों नहीं बल्कि पूंजीपतियों को लाभ मिलेगा। 

बुद्धिजीवियों का कहना है कि केंद्र सरकार और किसानों की बातचीत इतनी बार विफल होने के पीछे कई ठोस कारण है। एक हवाले से मिली खबर के आधार पर ये कहा गया कि कृषि कानून बनाते वक्त सरकार ने किसी भी किसान संगठन के किसान को समीति में शामिल नहीं किया और न हीं बिल बनाते समय उनकी राय ली गई। हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई है, उस पर भी प्रश्न चिन्ह बना हुआ है। लेकिन जो बातें निकल कर सामने आ रही हैं, उससे यही साबित होता है कि किसानों का गुस्सा जायज़ है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि अगर सरकार को किसानों के हित की इतनी ही फिक्र होती तो बिल बनाते वक्त किसानों संगठन के वरीष्ठ नेताओं को शामिल किया जाता, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया, इसीलिए सीधे तौर पर इसे किसान हित में बताना कहां तक उचित है। 

बीते दिनों सरकार और किसानों के बीच बातचीत की शुरुआत तीनों कृषि क़ानूनों के मुद्दे से हुई और सरकार ने इन क़ानूनों के फ़ायदे गिनाने शुरू कर दिए। इस पर किसानों ने सरकार से पूछा कि क्या वो इन क़ानूनों को वापस लेने को तैयार है? सरकार ने सवाल का जवाब देते हुए कहा कि सरकार इन क़ानूनों पर खंडवार चर्चा करने को तैयार है। ज़ाहिर तौर पर क़ानूनों को वापस लेने की मांग पर अड़े किसानों ने इसे ख़ारिज़ कर दिया।

ज़मीन नहीं पर ज़मीर है, हम अपराजेय हैं। सिंघु बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे लोग गर्मजोशी से ये बात कहते हैं। सरकार और किसानों के बीच आज फिर बैठक हो रही है। बैठकें चली और साल बदल गया। सिंघु बॉर्डर आंदोलन का एक अहम चेहरा है। वहां महीने भर से मौजूद लोग नए साल में किस उम्मीद के साथ कदम रख रहे हैं? उन्हें इस भारत से क्या उम्मीद है ? क्या वे थके नहीं? ऊबे नहीं, उकताए नहीं है अब तक?

किसने बनाया कृषि बिल ?

नाराज किसानों ने पहले भी कई बार सरकार से सवाल किया है कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को तीन नए कृषि कानूनों को क्यों लाना पड़ा? जिनके बारे में केंद्र सरकार कहती है कि ये कृषि सुधार से जुड़े हैं और ये दीर्घकालिक मांगों को पूरा करते हैं। महीनों से जारी बड़े आंदोलन के बीच किसान समूह के प्रतिनिधियों ने कहा था कि सरकार केवल कॉरपोरेट्स के कल्याण में रुचि रखती है, यही कारण है कि इस तरह के "काले कानून" लाए जा रहे हैं। किसान नेताओं में से एक ने कहा, हम सरकार से पूछते हैं कि सरकार ने किस किसान संगठन ने और किन किसानों ने सरकार से अपना भला करने की मांग की थी। सरकार बताए कि कौन से बिचौलिए को निकालने की बात कह रही है। बिचौलिए को डिफाइन करे सरकार। किसान नेताओं ने कहा, देश भर के किसान आंदोलन कर रहे हैं और सरकार के कानों में जूं तक न रेंग रही है। क्या ठंड, क्या बरसात और क्या कोरोना वायरस की मार, सरकार को किसी की कोई परवाह नहीं। सच तो ये है कि सरकार यह स्वीकार नहीं करना चाहती है कि आंदोलन एक अखिल भारतीय आंदोलन बन गया है। किसान संगठन के नेताओं का कहना है कि कृषि बिल को बनाते वक्त किसी भी किसान को क्यों नहीं शामिल किया गया। इस प्रश्न का जवाब सरकार पहले दें। सरकार में बैठे मंत्री जी न तो किसान है और न ही किसान परिवार से कोई ताल्लुक रखते हैं, तो उन्हें किसानों की हित की परवाह होगी कैसे?

हो चुकी हैं कई बैठकें

बीते एक महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है। और इस बीच सरकार और किसानों के बीच कई राउंड की बैठक हुई। कुछ पर किसान और सरकार में सहमति भी हुई तो कई अब तक धरे के धरे है। चार जनवरी को हुई बैठक के पहले 30 दिसम्बर को हुई बैठक में सरकार और इन संगठनों के बीच दो मुद्दों पर सहमति बन गई थी। इसके अलावा दोनों ने ही एक दूसरे के साथ खाना भी खाया जिससे माहौल थोड़ा खुशनुमा भी हुआ और दोनों के बीच की दूरियां भी कम होती नजर आई। लेकिन बीते सोमवार को जब सबसे प्रमुख दोनों मुद्दों पर बातचीत की बारी आई तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके विपरीत सरकार और किसानों के बीच एक बार फिर से तक़रार बढ़ने के ही संकेत मिले जब बैठक के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि ताली दोनों हाथों से बजती है। इतना ही नहीं, सरकार ने ये भी कहा कि वो 8 जनवरी को होने वाली बैठक से पहले देश के दूसरे राज्यों के किसान संगठनों के साथ भी बातचीत करेगी। सरकार के इस क़दम से टकराव और बढ़ने की सम्भवना है। पिछले दिनों में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कई ऐसे किसान संगठनों से बात की जो इन क़ानूनों के समर्थन में हैं। आंदोलन कर रहे किसान संगठन पहले ही इन मुलाक़ातों पर आपत्ति जता चुके हैं।

सत्ता का अहंकार छोड़े मोदी सरकार : सोनिया गांधी

केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान संगठनों का आंदोलन एक महीने से ज्यादा समय से दिल्ली बॉर्डर पर चल रहा है। इस दौरान 50 से ज्यादा किसानों की मौत हो चुकी है, जिसे लेकर कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार पर हीलाहवाली करने का आऱोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सरकार सत्ता का अहंकार छोड़ बिना शर्त तोनों कानून वापस ले। किसानों के समर्थन में बयान जारी कर सोनिया गांधी ने सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि कंपकपाती ठंड और बारिश में दिल्ली की सीमाओं पर अपनी मांगों के समर्थन में 39 दिनों से संघर्ष कर रहे अन्नदाताओं की हालत देखकर देशवासियों सहित मेरा मन भी बहुत व्यथित है। उन्होंने कहा कि आंदोलन को लेकर सरकार की बेरुखी के चलते अब तक 50 से अधिक किसान जान गंवा चुके हैं। कुछ ने तो सरकार की उपेक्षा के चलते आत्महत्या जैसा कदम उठाया लेकिन बेरहम सरकार का न तो दिल पसीजा और न ही आज तक प्रधानमंत्री या किसी भी मंत्री के मुंह से सांत्वना का एक शब्द निकला।

केंद्र की मोदी सरकार को निशाने पर लेते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि आजाद भारत के इतिहास में यह पहली ऐसी अहंकारी सरकार है जिसे आम जनता तो दूर, देश का पेट भरने वाले अन्नदाताओं की पीड़ा भी नहीं दिख रही। चंद उद्योगपति के लिए मुनाफा सुनिश्चित करना ही इस सरकार का मुख्य एजेंडा बनकर रह गया है। उन्होंने कहा कि अब भी समय है कि मोदी सरकार सत्ता के अहंकार को छोड़ बिना शर्त तीनों काले कानून वापस ले और ठंड एवं बारिश में दम तोड़ रहे किसानों के आंदोलन को खत्म कराए। सोनिया ने कहा कि यही राजधर्म है और दिवंगत किसानों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी। मोदी सरकार को याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र का अर्थ ही जनता और किसान-मजदूर हितों की रक्षा करना है।

कृषि अनुसंधान को हिंदी में गांव-गांव तक पहुंचाएगी सरकार

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कृषि अनुसंधान को हिंदी में गांव-गांव पहुंचाने पर जोर देते हुए कहा कि केंद्र सरकार का कामकाज अधिक से अधिक हिंदी में होना चाहिए और इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। तोमर ने मंगलवार को मंत्रालय की संयुक्त हिंदी सलाहकार समिति की बैठक की अध्यक्षता करते हुए कहा कि कृषि मंत्रालय से देशभर के किसान जुड़े हुए हैं, जिन्हें योजनाओं व कार्यक्रमों का लाभ राजभाषा के उपयोग के माध्यम से अच्छे से पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने कृषि अनुसंधान को भी किसानों तक हिंदी में अधिकाधिक पहुंचाने पर जोर दिया, ताकि कृषि क्षेत्र में नीचे गांव-गांव तक इसका लाभ सभी को मिल सके। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि राजभाषा हिंदी के प्रति हम सब के मन में सम्मान है और इस बात की महती आवश्यकता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक यह सम्मान निरंतर बढ़े ताकि हमारी एकता ज्यादा मजबूत हो। भाषायी व मजहबी विविधता हमारे लोकतंत्र की बड़ी ताकत है। हिंदी हमारी एकता की परिचायक है। केंद्र सरकार का कामकाज अधिक से अधिक हिंदी में होना चाहिए और इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय हिंदी में काम कर रहा है, जिसके क्रियान्वयन की गति निरंतर बढ़ती रहनी चाहिए, तभी हम लक्ष्य प्राप्त कर पाएंगे। तोमर ने कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग में बनाए जा रहे सरल हिंदी शब्द कोष का कार्य समय-सीमा में पूरा करने के लिए दिशा-निर्देश दिए। कृषि राज्य मंत्री परषोत्तम रूपाला ने कहा कि सरल हिंदी का उपयोग किया जाए और इसका सभी अनुपालन करें तो राष्ट्रभाषा का गौरव बढ़ेगा। राष्ट्रभाषा के माध्यम से देशभक्ति के भाव प्रबल होते हैं। कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ने कहा कि देश के अधिकांश राज्यों में हिंदी बोली व समझी जाती है, ऐसे में किसानों को सारी जानकारी हिंदी में मिलेगी तो उन्हें आसानी होगी। समिति के सदस्य सांसद सुनीता दुग्गल, डा. रामबोध पांडे व विजय कुमार तथा कृषि सचिव संजय अग्रवाल एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डा. त्रिलोचन महापात्र ने भी विचार रखे।

क्या कहते हैं आंकड़ें

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 40 प्रतिशत से अधिक काम करने वाले लोग खेती से जुड़े हुए हैं। ग्रामीण भारत की घरेलू आय से जुड़े हाल के कोई आंकड़े नहीं है, लेकिन कृषि मजदूरी, जो कि ग्रामीण आय का एक अहम हिस्सा है, उससे जुड़े कुछ आंकड़े मौजूद है। इसके मुताबिक साल 2014 से 2019 के बीच विकास की दर धीमी हुई है। भारत में महंगाई दर पिछले कुछ सालों में बढ़ी है, वर्ल्ड बैंक के डेटा के मुताबिक उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 2017 में 2.5% से थोड़ी कम थी जो कि बढ़कर 2019 में लगभग 7.7% हो गई। इसीलिए मजदूरी में मिले लाभ का कोई फ़ायदा नहीं हुआ। ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर इकॉनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलेपमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2013 से 2016 के बीच सही मायने में किसानों की आय केवल 2 प्रतिशत बढ़ी है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इनकी आय ग़ैर-किसानी वाले परिवारों का एक तिहाई भर है। कृषि मामलों के जानकार देवेंद्र शर्मा का मानना है कि किसानों की इनकम नहीं बढ़ी है, और मुमकिन है कि पहले से ये कम ही हो गई है। अगर हम महंगाई को देखें तो महीने के दो हज़ार रुपये बढ़ जाने से बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। शर्मा खेती से जुड़े सामानों की बढ़ती कीमतों की ओर भी इशारा करते हैं, और बाज़ार में उत्पादन के घटते बढ़ते दामों को लेकर भी चिंतित हैं।

ये भी बताता ज़रूरी है कि हाल के सालों में मौसम ने भी कई जगहों पर साथ नहीं दिया। सूखे के कारण किसानों की आय पर बुरा असर पड़ा है। 2017 में एक सरकारी कमेटी ने रिपोर्ट दी थी कि 2015 के मुकाबले 2022 में आय दोगुनी करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किसानों को 10.4 प्रतिशत की दर से बढ़ना होगा। इसके अलावा, ये भी कहा गया था कि सरकार को 6.39 बिलियन रुपये का निवेश खेती के सेक्टर में करना होगा। 2011-12 में सरकार का कुल निवेश केवल 8.5 प्रतिशत था। 2013-14 में ये बढ़कर 8.6 प्रतिशत हुआ और इसके बाद इसमें गिरावट दर्ज की गई। 2015 से ये निवेश 6 से 7 प्रतिशत भर ही रह गया है। साल 2016 में नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट ने एक सरकारी सर्वे में पाया था कि तीन सालों में किसानों का कर्ज़ करीब दोगुना बढ़ गया था। केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ़ से पिछले कुछ सालों में कोशिश की गई है कि किसानों को सीधे वित्तीय सहायता दी जाए और दूसरे कदम उठाकर भी मदद की जाए, जैसे कि उर्वरक और बीज पर सब्सिडी और कुछ क्रेडिट स्कीम देना। 2019 में केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि 8 करोड़ लोगों की कैश ट्रांसफर से मदद ली जाएगी। इस स्कीम के तहत केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि किसानों को हर साल 6000 रुपये की मदद की जाएगी।

देश के 6 राज्य इससे पहले से ही कैश ट्रांसफर स्कीम चला रहे थे। देवेंद्र शर्मा के मुताबिक इनसे किसानों की आय बढ़ी है। वो कहते हैं, सरकार सीधे किसानों को सपोर्ट करने की स्कीम लेकर आई,ये एक सही दिशा में उठाया गया कदम था। लेकिन इन स्कीम ने काम किया या नहीं, ये बताने के लिए हमारे पास डेटा उपलब्ध नहीं है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए बना सरकार की एक कमेटी के चेयरमेन अशोक दलवाई के मुताबिक सरकार सही दिशा में आगे बढ़ रही है। वो कहते हैं, हमें डेटा का इंतज़ार करना चाहिए। लेकिन मैं यह कह सकता हूं कि पिछले तीन सालों में विकास की रफ़्तार तेज़ हुई है, और आने वाले समय में यह और बढ़ेगी। दलवाई कहते हैं कि उनके आंतरिक मूल्यांकन' के मुताबिक वो 'सही दिशा में हैं।

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