किसानों की आत्महत्या की जानकारी क्यों है अधूरी

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

सरकार का कहना है कि कृषि ऋण के कारण किसानों की आत्महत्या मामलों के बारे में वर्ष 2016 के बाद से कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है क्योंकि गृह मंत्रालय ने अभी तक इसके बारे में रिपोर्ट प्रकाशित नहीं किया है। गृह मंत्रालय के तहत आने वाले राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) अपने ‘भारत में आकस्मिक मौत और आत्महत्या’ शीर्षक वाली रपट में आत्महत्याओं के बारे में आंकड़े जुटाता है और इसकी जानकारी देता है। पिछले दिनों कृषि राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा को बताया, ‘वर्ष 2015 तक आत्महत्या के बारे में ये रिपोर्ट उसके वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। वर्ष 2016 के बाद की रिपोर्ट अभी तक प्रकाशित नहीं की गई है।’ सदन में पेश किए गए आंकडों के अनुसार, वर्ष 2015 में किसानों की आत्महत्या के मामलों की संख्या 3,097 और वर्ष 2014 में 1,163 थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल मई महीने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया था कि किसानों की आय और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने की तमाम कोशिशों के बावजूद साल 2013 से हर साल 12,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं। 

किसानों की स्थिति को लेकर एनजीओ सिटीज़न रिसोर्स एंड एक्शन इनीशिएटिव की ओर से उच्चतम न्यायालय में दाख़िल याचिका के संबंध में केंद्र सरकार की ओर से ये आंकड़े दिए गए थे। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने कहा था, ‘केंद्र सरकार कम आय वाले किसानों पर ध्यान दे रही है. आत्महत्या की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को किसानों की आय बढ़ाकर कम किया जा सकता। इस समझ के साथ केंद्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है।’ रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान कृषि क्षेत्र में होने वाली आत्महत्याओं का आंकड़ा देते हुए सरकार ने कहा था कि साल 2015 में कृषि क्षेत्र में काम करने वाले 12,602 लोगों में 8,007 किसान और 4,595 कृषि मज़दूरों ने आत्महत्या की। यह आंकड़ा देश में उस साल हुईं कुल 1,33,623 आत्महत्याओं का 9.4 प्रतिशत है।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि किसानों की आत्महत्या के मामले में 4,291 आत्महत्याओं के साथ महाराष्ट्र शीर्ष पर है। इसके बाद कर्नाटक में 1,569, तेलंगाना में 1,400, मध्य प्रदेश में 1,290, छत्तीसगढ़ में 954, आंध्र प्रदेश में 916 और तमिलनाडु में 606 किसानों ने आत्महत्या की। इन सातों राज्यों में आत्महत्या करने वाले कुल किसानों की संख्या 11,026 है, जो कि देश में उस साल आत्महत्या करने वाले 12,602 किसानों का 87.5% है। इसके अलावा केंद्र ने बताया था कि साल 2014 में कृषि क्षेत्र में 12,360 लोगों में से 5,650 किसान और 6,710 कृषि मज़दूरों ने आत्महत्या की। यह आंकड़ा उस साल आत्महत्या करने वाले 1,31,666 लोगों का कुल 9.4 प्रतिशत है। साल 2013 में कृषि क्षेत्र के 11,772 लोगों ने आत्महत्या की, जो कि उस साल आत्महत्या करने वाले 1,34,799 लोगों का कुल 8.7 प्रतिशत है।

कैसे बदलेगी किसानों की हालात 

किसानों का पूरा काम इतना श्रम आधारित है कि इसमें शरीर तोड़ने वाले श्रम की जरूरत पड़ती है। दूसरी तरफ ये कि किसान को मदद पहुंचाने वाला जो पशुधन था हमारा, उसे बिलकुल ही खत्म कर दिया गया है। मशीनें उसकी जगह ले नहीं सकती हैं, ले नहीं पाई हैं, तब किसान के लिए अपना शरीर ही रह जाता है। वो प्रकृति से भी लड़ता है क्योंकि प्रकृति कभी भी उसके नियम से चलती नहीं है और सरकार के द्वारा बनाई गई तमाम व्यवस्थाएं जो उसके प्रतिकूल जा रही हैं, किसान को उससे भी लड़ना होता है। उसके दीन हीन होने, कमजोर होने, लाचार होने, बेचारा होने के अलावा उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता है। बचा सिर्फ इतना है कि वह ऐसी चीज का उत्पादन करता है जिसके बगैर मनुष्य का अस्तित्व संभव नहीं है, इसलिए हम अभी तक उसे बर्दाश्त किए हुए हैं।

इसलिए किसान की परिस्थिति को बदलना हो तो दो चीजें फौरन करनी होंगी। उसके मदद के लिए बनाई गई व्यवस्थाओं पर फौरन विचार किया जाए। जैसे समर्थन का मूल्य का सवाल किसान समितियों के पास जाएगा तो जोड़ने-घटाने के बाद एक फार्मूला ऐसा बन सकता है जिससे तत्काल राहत हो सकती है। और दूसरा जो भी समर्थन मूल्य तय हो, उसको बाजार का व्यापारी किसान की लाचारी का फायदा उठाकर उसको कम दाम पर बेचने के लिए बेबस न करे। ये देखने के लिए सरकार बाजार में कोई व्यवस्था करे।

किसानों की अन्य समस्याएं

भूमि पर अधिकार : देश में कृषि भूमि के मालिकाना हक को लेकर विवाद सबसे बड़ा है। असमान भूमि वितरण के खिलाफ किसान कई बार आवाज उठाते रहे हैं। जमीनों का एक बड़ा हिस्सा बड़े किसानों, महाजनों और साहूकारों के पास है जिस पर छोटे किसान काम करते हैं। ऐसे में अगर फसल अच्छी नहीं होती तो छोटे किसान कर्ज में डूब जाते हैं।

फसल पर सही मूल्य : किसानों की एक बड़ी समस्या यह भी है कि उन्हें फसल पर सही मूल्य नहीं मिलता। वहीं किसानों को अपना माल बेचने के तमाम कागजी कार्यवाही भी पूरी करनी पड़ती है। मसलन कोई किसान सरकारी केंद्र पर किसी उत्पाद को बेचना चाहे तो उसे गांव के अधिकारी से एक कागज चाहिए होगा। ऐसे में कई बार कम पढ़े-लिखे किसान औने-पौने दामों पर अपना माल बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

अच्छे बीज : अच्छी फसल के लिए अच्छे बीजों का होना बेहद जरूरी है।  लेकिन सही वितरण तंत्र न होने के चलते छोटे किसानों की पहुंच में ये महंगे और अच्छे बीज नहीं होते हैं। इसके चलते इन्हें कोई लाभ नहीं मिलता और फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। 

सिंचाई व्यवस्था : भारत में मॉनसून की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। इसके बावजूद देश के तमाम हिस्सों में सिंचाई व्यवस्था की उन्नत तकनीकों का प्रसार नहीं हो सका है। उदाहरण के लिए पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में सिंचाई के अच्छे इंतजाम है लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जहां कृषि, मॉनसून पर निर्भर है। इसके इतर भूमिगत जल के गिरते स्तर ने भी लोगों की समस्याओं में इजाफा किया है।

मिट्टी का क्षरण : तमाम मानवीय कारणों से इतर कुछ प्राकृतिक कारण भी किसानों और कृषि क्षेत्र की परेशानी को बढ़ा देते हैं। दरअसल उपजाऊ जमीन के बड़े इलाकों पर हवा और पानी के चलते मिट्टी का क्षरण होता है। इसके चलते मिट्टी अपनी मूल क्षमता को खो देती है और इसका असर फसल पर पड़ता है।

मशीनीकरण का अभाव : कृषि क्षेत्र में अब मशीनों का प्रयोग होने लगा है लेकिन अब भी कुछ इलाके ऐसे हैं जहां एक बड़ा काम अब भी किसान स्वयं करते हैं। वे कृषि में पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। खासकर ऐसे मामले छोटे और सीमांत किसानों के साथ अधिक देखने को मिलते हैं। इसका असर भी कृषि उत्पादों की गुणवत्ता और लागत पर साफ नजर आता है।

भंडारण सुविधाओं का अभाव : भारत के ग्रामीण इलाकों में अच्छे भंडारण की सुविधाओं की कमी है। ऐसे में किसानों पर जल्द से जल्द फसल का सौदा करने का दबाव होता है और कई बार किसान औने-पौने दामों में फसल का सौदा कर लेते हैं। भंडारण सुविधाओं को लेकर न्यायालय ने भी कई बार केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार भी लगाई है लेकिन जमीनी हालात अब तक बहुत नहीं बदले हैं।

परिवहन भी एक बाधा : भारतीय कृषि की तरक्की में एक बड़ी बाधा अच्छी परिवहन व्यवस्था की कमी भी है। आज भी देश के कई गांव और केंद्र ऐसे हैं जो बाजारों और शहरों से नहीं जुड़े हैं। वहीं कुछ सड़कों पर मौसम का भी खासा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में, किसान स्थानीय बाजारों में ही कम मूल्य पर सामान बेच देते हैं। कृषि क्षेत्र को इस समस्या से उबारने के लिए बड़ी धनराशि के साथ-साथ मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धता भी चाहिए। 

पूंजी की कमी : सभी क्षेत्रों की तरह कृषि को भी पनपने के लिए पूंजी की आवश्यकता है। तकनीकी विस्तार ने पूंजी की इस आवश्यकता को और बढ़ा दिया है। लेकिन इस क्षेत्र में पूंजी की कमी बनी हुई है। छोटे किसान महाजनों, व्यापारियों से ऊंची दरों पर कर्ज लेते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में किसानों ने बैंकों से भी कर्ज लेना शुरू किया है। लेकिन हालात बहुत नहीं बदले हैं।

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