राजनीतिक दल-दल में फंसते किसान

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश में राजनीतिक अशांति। भ्रष्ट तंत्र और भ्रष्ट तंत्र की चपेट में बढ़ती, पलती भ्रष्ट राजनीति। सत्तारूढ़ पार्टी के कानून का विरोध, जनता की मांगों को अनदेखा किया जाना और राजनीति की दल-दल में फसंती मासूम जनता। यही हाल है देश के राजनीतिक परिदृश्य का। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोधी पार्टियों का होना बहुत जरूरी है ताकि सत्ताधारी मनमानी न कर सके। विरोधी पार्टियां केवल सरकार की भरपूर निंदा और विरोध करने पर तुली रहती हैं। विरोधी पार्टियों के इस रवैये के कारण न तो देश का विकास संभव है और न ही देश की बड़ी-बड़ी समस्याओं का निराकरण।

देश में किसान आंदोलन जोरों पर है। बीते कई दिनों से किसान सड़कों पर है। इस आंदोलन का जो स्वरूप सामने आ रहा है, उससे लगता है कि ये आंदोलन, किसान आंदोलन न होकर राजनीतिक स्वार्थ से भरा आंदोलन बनकर रह गया है। आंदोलन के नाम पर आज कल दिल्ली और सरकार को घेरने का ट्रेंड चल गया है। किसानों को अन्नदाता कहकर उनसे झूठी हमदर्दी दिखाने वाले क्या सचमुच अन्नदाता का भला चाहते हैं? यदि ऐसा है तो उन्हें अधिक लाभ कमाने के अवसर देने के खिलाफ क्यों खड़े हैं? किसानों के मन में भ्रम और शंकाएं पैदा की जा रही हैं, किंतु जो सच्चा किसान है वह वास्तविकता समझता है इसीलिए पंजाब और हरियाणा के अलावा देश के दूसरे हिस्से के किसान इस आंदोलन में शामिल नहीं हैं।

लेखिका रंजना मिश्रा लिखती हैं, यह आंदोलन का कैसा विकृत रूप है, जहां कुछ महिलाएं देश की जनता द्वारा चुने हुए प्रधानमंत्री की मृत्यु के गाने गा रही हैं। देश विरोधी लोगों के पोस्टर लगाना, खालिस्तान के पोस्टर लगाना दर्शाता है कि किसान आंदोलन को अल्ट्रा लेफ्ट संगठनों ने हाईजैक कर लिया है। स्वार्थी तत्व किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की फिराक में हैं। देश को हिंसा की आग में झुलसाने की चाल चली जा रही है।

आज जो नेता नये कृषि कानूनों का विरोध करने के लिए पंजाब के किसानों के साथ खड़े दिखाई देते हैं, उन्हीं में से कई नेता पहले इन कानूनों की प्रशंसा कर रहे थे। ये नेता केवल किसान आंदोलन का फायदा उठाकर चुनाव जीतना चाहते हैं। कांग्रेस खुद पूर्व में एमपीएमसी एक्ट में सुधार की बात करती रही है। अपने ही घोषणापत्र में जनता से किए वादों को भुलाकर वह विरोध कर रहे किसानों के पक्ष में खड़ी है। विरोध करने वाले कुछ राजनेता पहले कहते थे कि कांट्रैक्ट फार्मिंग होगी तो किसान टेंशन फ्री हो जाएगा, किंतु अब कह रहे हैं कि कांट्रैक्ट फार्मिंग होगी तो पूंजीपति किसानों की जमीन पर कब्जा कर लेगा। ये पहले कहते थे कि प्राइवेट कंपनियां आएंगी तो किसान मालामाल हो जाएंगे, अब कह रहे हैं कि किसान कंगाल हो जाएंगे। पहले कहते थे कि आढ़तिए किसानों को लूटते हैं, किंतु अब उन्हें किसानों का दोस्त बता रहे हैं। इन स्वार्थी नेताओं का ये दोहरा चरित्र केवल अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण है, उन्हें देश और देश की जनता के भले की कोई चिंता नहीं है। अपने शासनकाल में तो इन्होंने किसानों की समस्या का निदान करने के लिए कोई कारगर कदम उठाया नहीं। अब जब मोदी सरकार किसानों को मजबूत बनाने का प्रयास कर रही है तो ये सरकार का विरोध कर जनता के बीच में सरकार की छवि खराब करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इन कानूनों को किसानों के लिए काला कानून बता रहे हैं।

सरकार बार-बार किसानों के साथ वार्ता कर रही है। उनकी शंकाओं तथा भ्रम को दूर करने का प्रयास व कानूनों में सुधार का आश्वासन भी दे रही है, किंतु पंजाब के किसान अपनी जिद पर अड़े हैं कि सभी कानून पूरी तरह निरस्त करने होंगे, तभी वे आंदोलन वापस लेंगे। विदेशी ताकतें भी इस आंदोलन का फायदा उठाना चाहती हैं। अभीतक देश के किसान परेशान होकर आत्महत्या करने पर मजबूर थे, अब सरकार उनकी स्थिति सुधारना चाहती है और उन्हें लाभ के ज्यादा अवसर देना चाहती है तो कुछ स्वार्थी तत्व ऐसा होने नहीं देंगे। यह कानून पूरे देश के किसानों के लिए है। देश के केवल एक हिस्से के किसानों की बात मानकर देश के बाकी हिस्से के किसानों को उनके उज्ज्वल भविष्य से वंचित करना कहां तक सही होगा?

बीच का रास्ता निकालने की जरूरत

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार ऋतुपर्ण दवे लिखते हैं, क्या किसान मजबूर है और खेती मजबूरी? यह प्रश्न बहुत अहम हो गया है। अब लग रहा है कि किसानों की स्थिति ‘उगलत लीलत पीर घनेरी’ जैसे हो गई है। बदले हुए सामाजिक व राजनीतिक परिवेश में वाकई किसानों की हैसियत और रुतबा घटा है। किसान अन्नदाता जरूर है लेकिन उसकी पीड़ा बहुत गहरी है। एक ओर खेती का घटता रकबा बड़ा सवाल है तो दूसरी ओर बढ़ती लागत। घटते दाम से पहले ही किसान परेशान है। करीब 3-4 डिग्री सेल्सियस की कड़कड़ाती ठण्ड और सर्द हवाओं ने दिल्ली सहित देश के काफी बड़े भू-भाग को जबरदस्त ठिठुरन में जकड़ लिया है। ऐसे में धीरे-धीरे महीने भर होने को आ रहे किसान आन्दोलन और शरीर को तोड़ देने वाली ठिठुरन के बावजूद किसानों का न टूटना बता रहा है कि आन्दोलन, किसानों के भविष्य की चिन्ताओं से प्रभावित है।

किसान आन्दोलन को लेकर बीच का कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। न तो सरकार झुकने को तैयार है और न ही किसान। 135 करोड़ की आबादी वाले भारत में लगभग 60 प्रतिशत आबादी के भरण-पोषण का जरिया खेती है। ऐसे में किसान अपनी उपज की खातिर एमएसपी, खेत छिन जाने का डर और बिजली जैसी समस्याओं से डरे हुए हैं। लेकिन सरकार का भी अपने बनाए कानून को वापस लेना साख का सवाल बन गया है। इस बीच देश की सर्वोच्च अदालत की सलाह भी बेहद अहम है। कुल मिलाकर आन्दोलन के पेंच को सुलझाने के लिए बीच का रास्ता बेहद जरूरी है। जिन तीनों कानूनों को लेकर आन्दोलन चल रहा है उसे होल्ड कर देने में भी सरकार की साख पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। वहीं किसानों को भी लगेगा कि उनके लिए एक रास्ता बन रहा है। इस बीच दोनों को समय मिल जाएगा और नए सिरे से बातचीत की संभावनाओं से भी नया कुछ निकल सकता है। इससे न तुम जीते न हम हारे वाली स्थिति होगी और रास्ता भी निकल सकता है।

आसमान के नीचे सड़क पर लगभग महीने भर से बैठे किसानों ने समय के साथ काफी कुछ बदलते देखा है। जहां नई पीढ़ी खेती के बजाए शहरों को पलायन कर मजदूरी को ही अच्छा मानती है, वहीं जमीन के मोह में गांव में पड़ा असहाय किसान कभी अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि का दंश झेलता है। कभी भरपूर फसल के बाद भी उचित दाम न मिलने और पुराने कर्ज को न चुका पाने से घबराकर मौत का रास्ता चुनता है।

सरकार चिन्तित तो दिखती है लेकिन किसानों को भरोसा नहीं है। किसानों के लिए बने तीनों कानूनों में कहीं न कहीं किसानों की समृध्दि का दावा तो सरकार कर रही है लेकिन इसमें किसान संगठनों को अपने ही खेत-खलिहान की सुरक्षा और मालिकाना हक से वंचित कर दिए जाने का भय सता रहा है। कुल मिलाकर स्थिति जबरदस्त भ्रम जैसी बनी हुई है।

किसानों को लेकर सभी को सहमति और संवेदनाओं को जगाना होगा। सरकारी स्तर पर भी बड़ी मदद की जरूरत है। हर समय सरकारी इमदाद को मोहताज किसान, विभिन्न संगठनों का साथ मिलने से मानसिक रूप से मजबूत होगा। इससे न केवल अवसाद से बाहर निकलेगा बल्कि स्थानीय स्तर पर सुगठित व्यावसायिक मंच का हिस्सा बनने, कृषि को व्यवसाय के नजरिया से भी देखेगा। इसका फायदा जहां किसानों को भ्रम से बचाने और जीवन को संवारने में तो मिलेगा ही व्यापारिक-वाणिज्यिक संस्था से जुड़े होने से कृषि उत्पादों के विक्रय और विपणन के लिए मित्रवत उचित माहौल तैयार होगा।

ऐसा हुआ तो एकबार फिर खेती, धंधा बनकर लहलहा उठेगी। व्यापार भी फलीभूत होगा और छोटे-मंझोले, बड़े हर वर्ग के किसानों के लिए यह वरदान साबित होगा। शायद किसान भी यही चाहता है और सरकार भी। ऐसे में बीच का भ्रम क्यों बढ़ रहा है यह दोनों को ही समझना होगा। इसके लिए सर्वोच्च अदालत के सुझाव से बेहतर कुछ हो नहीं सकता।

क्या कहते है किसान यूनियन के नेता

सरकार के किसान संगठनों को एक बार फिर बातचीत के लिए आमंत्रित करने के एक दिन बाद किसान संगठनों ने कहा है कि सरकार उनका समय बर्बाद कर रही है। किसान संगठनों का कहना है कि वो सरकार के प्रस्ताव पर चर्चा करेंगे और इस बात पर फ़ैसला लेंगे कि उन्हें सरकार को क्या जवाब देना है। एक अंग्रेजी अखबार में छपी एक ख़बर के अनुसार कृषि मंत्रालय की चिट्ठी लेने वाले क्रांतिकारी किसान यूनियन के डॉक्टर दर्शन पाल ने कहा कि सरकार काम में गंभीर नहीं है। उन्होंने एक बार फिर हाल में पारित किए गए तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने की मांग की और कहा कि, हमने पहले ही सरकार को कह दिया है हम कृषि क़ानूनों में किसी तरह से संशोधन की बात स्वीकार नहीं करेंगे। अख़बार के अनुसार जम्हूरी किसान सभा के महासचिव कुलवंत सिंह संधू ने कहा कि किसानों का अगला कदम क्या होगा इस पर चर्चा करने के लिए मंगलवार को किसान संगठनों की बैठकर होगी। उन्होंने कहा, सरकार ने हमें पांच पन्नों की एक चिट्ठी दी है जिसमें कहा गया है कि पहले हुई बैठकों में क्या हुआ है. ये वक्त बर्बाद करने का तरीका है। जानकारी के अनुसार वहीं राष्ट्रीय किसान मज़दूर महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिव कुमार कक्का ने कहा है कि सरकार बैठक करना ही नहीं चाहती, वो केवल औपचारिकता पूरी कर रह है। अगले दौर की बातचीत को लेकर सरकार गंभीर होती तो वो समय और वक्त बता देती।

क्रिसमस पर कुछ किसानों से बात करेंगे पीएम

कृषि मंत्रालय ने कहा है कि 25 दिसंबर को क्रिसमस डे के मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पीएम किसान डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजना के तहत किसानों के लिए अगली किस्त रिलीज़ करेंगे, और साथ ही खेती से मुद्दों पर कुछ किसानों से बात करेंगे। अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक ख़बर के अनुसार इस योजना के तहत 8 करोड़ किसानों के बैंक खातों में 18,000 करोड़ रुपये पहुंचाए जाएंगे। किसानों के खातों में कैश ट्रांसफर करने की योजना के तहत साल 2019 में पहली किस्त रिलीज़ की गई थी। लेकिन इस बार सरकार किसानों को कैश ऐसे वक्त देने जा रही है जब राजधानी दिल्ली में हज़ारों की संख्या में किसान कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि कृषि क़ानूनों का बुरा असर उनकी आजीविका पर पड़ेगा। हालांकि सरकार का कहना है कृषि सुधारों से किसानों के लिए नए बाज़ार खुलेंगे और कृषि के क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा। अख़बार में एक अधिकारी के हवाले से लिखा है कि मोदी नए कृषि क़ानूों के फायदों के बारे में किसानों से बात कर सकते हैं। पीएम किसान योजना के तहत सरकार किसानों को चार महीनों में एक बार दो-दो हज़ार रुपये की राहत राशि, यानी साल में 6000 रुपये देती है। ये योजना फरवरी 2019 में लांच की गई थी और उस वक्त इसकी पहली किस्त किसानों को दी गई थी। अधिकारी के हवाले से अख़बार लिखता है कि मोदी किसानों से ये पूछ सकते हैं कि सरकार की इस योजना से उन्हें कैसे और कितना लाभ मिला। साथ ही वो आने वाले बजट के मद्देनज़र भी किसानों से पूछ सकते हैं कि उनकी बजट से क्या अपेक्षा है। अधिकारी के अनुसार देश के अलग-अलग कोने से किसान पंचायत में मौजूद इंटरनेट की सुविधा के ज़रिए मोदी से वर्चुअल मुलाक़ात करेंगे।

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