आंदोलन से बिफरती सरकार

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

लोकतांत्रिक देश में आंदोलन करना गलत तो नहीं है। लोकतंत्र में अपनी बात रखना गुनाह तो नहीं है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब क्या सरकार समझ कर भी समझना नहीं चाहती। एक ओर बीते कई दिनों से अपनी मांगों को लेकर किसान सड़कों पर हैं। तो दूसरी ओर सरकार और विपक्ष केवल राजनीति में व्यस्त हैं। यूं तो केंद्र सरकार का कहना है कि किसान हितों की रक्षा हेतु इस बिल को लाया गया है लेकिन क्या उचित रूप से किसानों के समक्ष इस बिल से मिलने वाले लाभ की व्याख्या की गई। क्योंकि अगर किसान इस बिल को अच्छी तरह समझे होते और उन्हें हितों की समझ हुई होती तो शायद आज वे सड़कों पर न होते। दूसरी बात अगर किसान सड़कों पर उतरे हैं तो क्या सरकार का फ़र्ज़ ये नहीं बनता कि वे अन्नदाताओं की मांगों को विस्तार से सुने और और फिर उस पर विचार करें। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि आज किसानों को लेकर देश में जितनी घिनौनी राजनीति की जाती है उतनी शायद ही किसी अन्य मुद्दे पर होती होगी। 

राजनीति की सीमा कहां तक गिर गई है, इस बात का स्पष्ट अंदाज़ा आप इससे लगा सकते हैं कि आज आंदोलन में बैठे किसानों को टुकड़े - टुकड़े गुट के सदस्य, खालिस्तानी, पाकिस्तानी, नक्सलबादी, मास्कबादी और ना जाने क्या क्या नाम से बुलाया जा रहा है। ये तो वैसी बात हो गई कि आंदोलन कर रहे देश के नागरिक को आंदोलन से भटकाने के लिए उन्हें किसी भी अन्य नाम से बुला लो या फिर उन पर तरह तरह के इल्जाम लगा लो और उनका मनोबल तोड़ दो। आखिर सरकार को डर किस बात का है। आंदोलन से सरकार इतनी घबराती क्यों है। आखिर क्यों देश में लोग अभिव्यक्ति की आजादी के लिए अपनी लड़ाई भी नहीं लड़ सकते। वो भी देश के वे किसान जिन्होंने आज तक आंदोलन को उग्र नहीं होने दिया। आखिर क्यों किसानों के पक्ष में खुलकर सामने आने वाले बुद्धिजीवियों को माओबादी, विश्लेषकों को अर्बन नक्सल, पंजाब से लोग जाएं तो खालिस्तानी, किसी राजनीतिक पार्टी से लोग समर्थन करें तो टुकड़े - टुकड़े गैंग आदि कह कर उन्हें तोड़ने की और असली मुद्दे को दबाने की नाकाम कोशिशें की जाती है। क्या लोकतंत्र में इसी प्रकार सरकार को जनता की मांगों के खिलाफ अपनी क्रूरता दिखानी चाहिए। इस पर बात करे कौन। इस पर अपनी राय देगा कौन। आखिरकार टुकड़े टुकड़े गैंग पर किसी प्रकार की कोई आधिकारिक जानकारी है नहीं, आपसी रंजीश और घिनौनी राजनीति के फलस्वरूप इन नामों का आविर्भाव हुआ है।

अगर स्पष्ट रूप से आप अपनी राय रखेंगे तो आपको भी किसी न किसी गैंग का सदस्य करार दे दिया जाएगा। सोशल मीडिया के जमाने में अधिकारों पर बात तो होती है लेकिन वो बातें केवल वहीं तक सीमित रह जाती है। यूं तो सत्ता में आने से पहले मोदी सरकार ने कहा था कि विपक्ष जितना मजबूत होगा देश में सरकार के काम करने के तरीके उतने ही बेहतर होंगे, लेकिन सच्चाई तो यह है कि विपक्ष तो क्या सरकार अपने सामने किसानों को तक टिकने और अपनी बातों को रखने का पूर्ण मौका नहीं दे रही तो ऐसे में कोई क्या ही कहे।  

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