विकास के नाम पर विनाश करते स्पीड ब्रेकर

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बेंगलुरु, (परिवर्तन)।

सड़क दुर्घटनाएं केवल घटना मात्र नहीं होती बल्कि एक प्रकार की वार्निंग है, कि कैसे आपकी और आपके परिवार व प्रियजनों की जान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। शहर की सुंदरता वैसे ही इन दिनों जगह-जगह बने गड्ढों की वजह से ख़राब हुई पड़ी है। ऊपर से हर दस कदम पर बने इन स्पीड ब्रेकरों ने बची हुई कसर पूरी कर दी। शहर के किसी भी इलाके के किसी भी कोने से कम से कम दो किलोमीटर जाने के क्रम में भी अमूमन पांच स्पीड ब्रेकरों से होकर गुजरना पड़ता है। यह नज़ारा केवल सुन्दर चौड़े सड़कों का ही नहीं बल्कि हर गली के हर मोड़ का है। चमचमाती सड़कों पर जहां-तहां स्पीड ब्रेकर बनाये गए हैं। कुछ स्पीड ब्रेकर आपको रोलर कोस्टर राइड की याद दिलाती है तो कुछ आपको ऊंट की सवारी करने का एहसास करा देती है। लेकिन सीधे तौर पर देखा जाए तो इन स्पीड ब्रेकरों की वजह से कई बार गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होतीं हैं। कई बार यह स्पीड ब्रेकर अनचाहे दुर्घटनाओं को निमंत्रण देता है। प्रत्येक स्पीड ब्रेकर से लगने वाला हर झटका अन्य स्पीड ब्रेकर से अलग होता है। इससे यही साबित होता है कि शहर में सभी स्पीड ब्रेकर नियमों के विरूद्ध बनाए गए है। ज्यादातर लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि एक सड़क को बनाने के लिए निर्दिष्ट मानक हैं, लेकिन स्पीड ब्रेकर को लेकर अमूमन न तो कोई वैज्ञानिक सोच है न आधार। क्या कोई मानकीकृत और आदर्श स्पीड ब्रेकर जैसी चीज होती है? विशेषज्ञों का कहना है कि विकास के नाम पर बनाए जा रहे स्पीड ब्रेकर अंततः विनाश का ही काम कर रहे हैं।

इस खास रिपोर्ट को लेकर हमने कई लोगों से बात की तो उन्होंने बताया कि कई बड़े शहरों में तो एक भी आदर्श स्पीड ब्रेकर नहीं है। उनका कहना था कि बड़े शहरों की बात करें या ग्रामीण इलाकों की, जब रोड ही नहीं है तो स्पीड ब्रेकर का आदमी क्या करें। अतः ये मनचाहे तरीकों से बनाए गए स्पीड ब्रेकर मासूमों की जान ही ले रहे हैं। समाचार परिवर्तन के संवाददाता ने जब इससे संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया जो जवाब मिले, वे न तो साफ थे और न पूरे।

परिवहन विभाग के एक अधिकारी ने नाम न बताने के शर्त पर कहा, कई कोशिशों के बाद भी मनचाहे तरीकों से बनाये जाने वाले स्पीड ब्रेकरों पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका है। उन्होंने कहा विभाग इस कोशिश में है कि स्पीड ब्रेकर एक निश्चित स्थान पर सोच-विचार कर बनाया जाए। उन्होंने बताया कि शहरों के अलावा ग्रामीण इलाकों में हर 100 मीटर पर एक स्पीड ब्रेकर बना मिलता है। शहरों में ऐसा ज्यादातर रिहायशी इलाकों में होता है। कई जगह लोग ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए ईंटों की मदद से डीआईवाई बम्प्स (हाथ से बने स्पीड ब्रेकर) बना देते हैं। हालांकि विभाग ने हाइवे बनाने वाली सभी एजेंसियों को आदेश दिए हैं कि मुख्य रास्तों से सभी स्पीड ब्रेकर हटा दिए जाएं। अधिकारी का कहना है कि केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय द्वारा राज्यों को केवल नियमों का पालन करने के आदेश दिए जा सकता है, लेकिन अंततः नियमों का पालन करना और करवाना राज्य सरकार के कार्य के अधीन है।

क्या कहता है नियम ?

नियम कहता है कि स्पीड ब्रेकर सिर्फ उन्हीं जगहों पर होने चाहिए जहां स्कूल व न्यायिक व्यवस्थाएं मसलन कोर्ट होती हैं। इसके अलावा अन्य जगहों पर बेवजह स्पीड ब्रेकर नहीं बनाना चाहिए। दूसरी ओर पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारी कहते हैं कि कई बार विवाद व दुर्घटनाओं के बाद दबाव के कारण स्पीड ब्रेकर बनाने पड़ते हैं। अब सवाल ये उठता है कि आखिर कब तक मासूम लोग विभागीय लापरवाही का शिकार बनते रहेंगे और सरकार व प्रशासन मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते रहेंगे।


क्यों चौंकाते हैं आंकड़ें

हाल ही में किये गए एक अध्ययन के अनुसार भारत में स्पीड ब्रेकर संभवत: उतनी जानें बचाते नहीं हैं  जितनी अधिक जानें ले लेते हैं। सर्वे के दौरान रोड ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री से मिले आंकड़ों से पता चला है कि दुर्घटनाओं से बचाने के लिए बनाए गए स्पीड ब्रेकर के कारण रोज 500 दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें कम से कम 20 लोगों की मौत हो जाती है। यह 2 सालों का औसतन आंकड़ा है। केंद्र सरकार ने साल 2014 से स्पीड ब्रेकर के कारण होने वाले हादसों का डाटा जुटाना शुरू किया था। बीते साल का डाटा अभी सरकार द्वारा जारी किया जाना है लेकिन सरकारी सूत्रों का कहना है कि आंकड़ा लगभग बराबर ही होगा। स्पीड ब्रेकर के कारण अकेले भारत में जितनी जानें जाती हैं उससे कम लोग ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया में सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। आस्ट्रेलिया में 2017 में सड़क दुर्घटनाओं में कुल 2937 और ब्रिटेन में कुल 3409 लोगों की मौत हुई थी। अपने एक बयान में केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने माना, यह समस्या पूरे देश में है। हमारे यहां हर रोड पर स्पीड ब्रेकर हैं जो कि आपकी हड्डियां तोड़ सकते हैं और आपके वाहन को क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि वह राज्य सरकारों को पत्र लिखेंगे। ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्पीड ब्रेकर बनाते समय नियमों का पालन हो।

ट्राफिक नियमों के विरुद्ध कैसे बना दिया स्पीड ब्रेकर ?

इस मामले में ट्रैफिक एक्सस्पर्ट का मानना है कि रोड में स्पीड ब्रेकर हो या नहीं यह रोड पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए जब कोई छोटा रोड हाइवे या किसी बड़े रोड से मिल रहा है तो वहां पर स्पीड ब्रेकर होने चाहिए क्योंकि छोटे रोड से आने वाले वाहन को स्पीड कम करने की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि अक्सर ज्यादा भीड़ भाड़ वाले इलाकों में सड़क पर नियंत्रण रखने के लिए क्षेत्रीय निवासियों द्वारा स्पीड ब्रेकर बनाए जाते हैं। लेकिन यह सरासर ट्रैफिक नियमों के विरूद्ध है। उन्होंने बताया स्पीड ब्रेकर बनाने के लिए भी उचित दिशा निर्देश है। उनके नियमों का पालन कर ही इसे मुख्य सड़कों पर बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा एक सड़क बनवाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन स्पीड ब्रेकर के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता। आजकल सड़कों पर काले-पीले रबड़ के स्ट्रिप भी स्पीड ब्रेकर के रूप में दिखाई देते हैं। ये लगाने में आसान और सस्ते ज़रूर हैं, लेकिन इन्हें इतना किफायती नहीं माना जाता। वो इसलिए क्योंकि ये बहुत जल्दी ही घिसने लगते हैं और फिर सड़क पर दबे रह जाते हैं। इन पर लगी कीलें वाहनों के टायरों को नष्ट कर देती हैं। यानि जो स्पीड ब्रेकर के रूप में रफ्तार रोकने के लिए बने थे, वहीं स्पीड ब्रेकर अब टायरों को पंक्चर करने के काम आ रहे हैं। एक यातायात पुलिस अधिकारी ने कहा कि जब सिविल एजेंसियां बृहत् बेंगलुरु महानगर पालिके (बीबीएमपी) या बैंगलोर डेवलपमेंट अथॉरिटी (बीडीए) द्वारा चिन्हित सड़कों पर जब स्पीड ब्रेकर बनाया जाता है तो उन्हें नियमों के अनुसार संकेत चिह्न भी बनाये जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि सड़क के जिस भाग में स्पीड ब्रेकर बनाया जाना है, उससे करीब 30 से 40 मीटर पहले ही ब्रेकर के लिए संकेत बनाये जाने चाहिए। उन्होंने बताया इससे वाहन चालकों को स्पीड ब्रेकर होने का अंदेशा पहले से हो जायेगा और वे वाहन की रफ़्तार को कम कर सकेंगे।


राष्ट्रीय राजमार्ग में स्पीड ब्रेकर बनाने का नियम नहीं

नेशनल हाइवे हो या फिर नगरीय निकाय या राजमार्ग, स्पीड ब्रेकर की भरमार है। यही नहीं राष्ट्रीय राजमार्ग में स्पीड ब्रेकर बनाने का नियम नहीं है, पर सुरक्षा के लिहाज से कुछ चिह्नांकित स्थानों पर ब्रेकर बनाए गए हैं, पर उसमें भी मानकों का ख्याल नहीं रखा गया है। अधिकांश स्पीड ब्रेकर में सफेद या पीला पेंट नहीं किया गया है, जिससे बाइक सवार या वाहन चालकों को दिन में दूर से ब्रेकर दिखाई नहीं देते हैं। इससे अक्सर दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है।  कायदे से कहीं भी स्पीड ब्रेकर बनाने का नियम नहीं है। बेहद जरूरी होने पर पहले यह मामला जिला यातायात सुरक्षा समिति के पास जाता है और अनुमोदन के बाद ही निश्चित मापदंड के अनुरूप ब्रेकर बनवाए जाते हैं। वर्तमान में जहां भी सड़कें बनती हैं, वहां दबावपूर्वक कुछ लोग स्पीड ब्रेकर बनवा लेते हैं जो कि जानलेवा साबित होता हैं। शहर के पास से गुजरने वाले नेशनल हाइवे में मैसूरु रोड से करीब 10 किलोमीटर की दूरी में कई ब्रेकर बनाए गए हैं, पर किसी ब्रेकर में भी सफेद-पीली पट्‌टी पेंट नहीं की गई है। कई ब्रेकर तो मानकों से अधिक ऊंचे हैं। इससे चालक जब तक ब्रेकर को देख पाता उससे पहले बाइक उछलकर अनियंत्रित हो जाती है, जिससे कई बार दुर्घटनाएं होती हैं। हालांकि इन स्पीड ब्रेकर के पहले रेडियम लगाए गए हैं, जो दिन में दिखाई देते हैं, पर ब्रेकर के पेंट नहीं होने से ये स्पीड ब्रेकर दिन के वक्त दूर से दिखाई नहीं देते। मैसूरु से निकलने वाले राजमार्गों में कई स्पीड ब्रेकरों पेंट तक नहीं किया गया है।


स्पीड ब्रेकर बनाए जाने के मापदंड :

शहर में कईं जगहों पर बेतरतीब स्पीड ब्रेकर के कारण दुर्घटनाएं घटित हो रही हैं। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए स्पीड ब्रेकर्स बनाए जाते हैं, जिनके लिए कुछ मानक बनाए गए हैं किन्तु स्पीड ब्रेकर्स का निर्माण करते वक्त संबंधित विभाग द्वारा इसका ध्यान नहीं रखा जाता। आइऐ जानते हैं क्या हैं ये मानक -

  • स्पीड ब्रेकर की ऊंचाई 10 सेंटीमीटर, लंबाई 3.5 मीटर और वृत्ताकार क्षेत्र यानि कर्वेचर रेडियस 17 मीटर होना चाहिए।

  • ड्राइवर को सचेत करने के लिए स्पीड ब्रेकर आने से 40 मीटर पहले एक चेतावनी बोर्ड लगा होना चाहिए।

  • स्पीड ब्रेकर पर थर्मोप्लास्टिक पेंट से पट्टियां बनाई जानी चाहिए ताकि रात के समय वे ड्राइवरों की नज़रों से न चुके।

  • स्पीड ब्रेकर्स का निर्माण दुर्घटना रोकने के लिए किया जाता है।

  • हाईवे पर गोल व कम ऊंचाई का स्पीड ब्रेकर ही होना चाहिए वो भी वहां बना  होना चाहिए जहां उसकी ज्यादा आवश्यकता हो।

  • स्पीड ब्रेकर्स को चैराहे, अस्पताल य स्कूल से पहले बनाया जाना चाहिए।

  • स्पीड ब्रेकर्स की ऊंचाई अधिक होने से जहां वाहन चालक दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं तो वहीं उनकी रीढ़ की हड्डी में भी समस्या उत्पन्न हो सकती है।


स्पीड ब्रेकर का गैर-कानूनी बाज़ार

स्पीड ब्रेकर बनाए जाने के लिए उचित मानक हैं। सरकारी तरीकों की बात करें तो अगर किसी ऐसी जगह, जहां दुर्घटनाएं बढ़ रही हों या दुर्घटना होने की संभावनाओं की वजह से स्पीड ब्रेकर की ज़रूरत हो, तो ट्रैफिक पुलिस या रेज़िडेन्ट वेलफेयर असोसिएशन उस प्राधिकरण को आवेदन पत्र लिख सकते है। जिसके अधिकार क्षेत्र में वो सड़क पड़ती है। आवेदन पत्र मिलने के बाद इंजीनियरों की सलाह ली जाती है। जिसके बाद स्पीड ब्रेकर बनना है या नहीं इस पर सहमति दी जाती है। लेकिन इन दिनों रबड़ के स्पीड ब्रेकर (रंबल स्ट्रिप) फैक्ट्रियों में सस्ते दामों में बिकते हैं, जिन्हें कोई भी खरीद कर अपनी गली में लगवा सकते हैं। जब ऐसे ही एक रंबल स्ट्रिप बनाने वाली फैक्ट्री के मालिक से बात की गई तो उन्होंने फटाफट रेट बताकर आश्वासन दे दिया कि पुलिस या पीडब्लूडी के चक्कर में पड़ने की ज़रूरत ही नहीं है। सस्ते दामों और आसानी से उपलब्ध्ता की वजह से हर गली, हर मोड़ पर ऐसे गैर-कानूनी तरीके से स्पीड ब्रेकर बना दिए गए हैं।

जब समाचार परिवर्तन ने बृहत बेंगलूरु महानगर पालिके के रोड इंफ्रास्ट्रक्चर के चीफ इंजीनियर के कार्यालय से संपर्क करने की कोशिश की तो अधिकारियों ने सीधे तौर पर इस विषय को लेकर बात करने से मना कर दिया। लेकिन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि बड़े शहरों में सड़क निर्माण की जिम्मेदारी बड़ी कंपनियों को दी जाने लगी है, जिसके बाद से नियमों की अवहेलना शुरु हो गई है। विभाग को इस बात की जानकारी काफी बाद में चलती है कि नियमों में हेराफेरी की गई है। उन्होंने बताय़ा कि हम हमेशा यही कोशिश करते हैं कि अगर ऐसी कोई भी घटना हमारे नज़र में आती है तो हम जल्द से जल्द उस पर कार्रवाई कर दोषी को सज़ा दिलाते हैं। 

सेंटर फॉर रोड रिसर्च इस्टिट्यूट के ट्रैफिक इंजिनियरिंग विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर एस वेलमुरुगन का कहना है कि अगर दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए, तो सुरक्षा के साथ-साथ मुसाफ़िरों का सफर भी सुखदायी हो सकता है। तो फिर सवाल ये उठता है कि आखिर इन दिशा-निर्देशों का पालन क्यों नहीं होता? इसका जिम्मेदार कौन? इस सवाल के जवाब में डॉक्टर एस वेलमुरुगन ने कहा, “दिक्कत ये है कि विभिन्न नागरिक प्राधिकरणों के बीच आपसी तालमेल नहीं है जिसकी वजह से सड़क पर बनने वाले विभिन्न प्रकारों के स्पीड ब्रेकरों पर कोई नज़र नहीं डाल रहा है। इसके अलावा लोग निर्धारित गति का पालन नहीं करते, जिसके चलते कभी-कभी लाल बत्ती से पहले, तो कभी फ्लाईओवरों के ऊपर भी स्पीड ब्रेकर लगाने पड़ते हैं, जो कि एक बेतुकी बात है।” उनका मानना है कि भारतीय लोगों की ड्राइविंग आदतों को सभ्यता की ओर ले जाने के लिए अधिकारियों को कभी-कभी ऐसे बेतुके फैसले भी लेने पड़ते हैं। हालांकि लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष दिनेश शर्मा की निजी राय ये है कि सड़कों पर कम से कम स्पीड ब्रेकर होने चाहिए। लेकिन उनका कहना है कि जहां दुर्घटनाएं होने लग जाती हैं, वहां स्पीड ब्रेकर लगाने के अलावा कोई दूसरा समाधान ईजाद करना मुश्किल है। और फिर स्पीड ब्रेकर लगवाना इतना मुश्किल काम नहीं है। हां, अगर कानूनी रूप से बनवाना हो, तो ये ज़रूर एक मुश्किल काम है।


बेंगलूरु में बने अनवांटेड स्पीड ब्रेकर्स

बेंगलूरु में बनाए गए स्पीड ब्रेकर जानलेवा साबित हो रहे हैं। यदि आंकड़ों पर गौर फरमायें तो बीते कुछ महीनों में शहर की सड़कों पर बने इन स्पीडब्रेकर्स की वजह से कई वाहन सवार चोटिल हो चुके हैं और कई अपनी जान से हाथ धो चुके हैं। बेंगलूरु में मानकों के विपरीत बने ये स्पीड ब्रेकर आमजन के लिए खतरा बन चुके हैं। जिस ओर सरकार एवं प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है। दुर्घटना रोकने के लिए बनाए गए स्पीड ब्रेकर जानलेवा बने हैं जिन्हें, स्मूथ करने की ओर भी कोई कदम शासन व प्रशासन द्वारा नहीं उठाया जा रहा है। 

गौरतलब है कि कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने मरीजों की संवेदनशीलता को देखकर स्पीड ब्रेकर बनाए जाने को लेकर गाइडलाइन जारी की थी और मानकों के विपरीत बनाए गए सभी स्पीड ब्रेकरों को हटाने का निर्देश दिया था लेकिन शहर के कई हिस्सों में अमानक बने स्पीड ब्रेकर से सुरक्षा कम और दुर्घटना की संभावना अधिक हो रही है।

शहर में कई इलाके हैं जहां स्पीड ब्रेकर जरूरत से ज्यादा बना दिए गए हैं। इन्हें बनाया भी ऐसा गया है कि इस मार्ग से गुजरते वक्त जोरदार झटका लगता है। स्पीड ब्रेकर बनाए जाने के पीछे अधिकारी अपनी राय यही देते है कि इसे बनाए जाने से वाहनों की स्पीड कम होती है जिससे दुर्घटना होने की संभावना कम होती है लेकिन ऐसे स्पीड ब्रेकरों से सुरक्षा कम और घटित हो रही हैं। इसके बावजूद अधिकारी इन्हें स्मूथ करने की दिशा में काम नहीं कर रहे हैं।

आश्चर्य की बात है, पिछले दिनों एक आरटीआई दाखिल कर आईआरसी के नियमों के बारे में जब बीबीएमपी से जवाब मांगा गया तो उन्होंने नियमों की अनुपलब्धता की सूचना दी। और इस प्रकार, इन मानकों के अनुसार सड़क के कई स्पीड ब्रेकर नहीं बनाए गए हैं और अधिकांश बीबीएमपी कार्यालयों में विषय से संबंधित कोई रिकॉर्ड नहीं होने के साथ अनधिकृत हैं। अगर बेंगलूरु जैसा शहर ही इतना पिछड़ा हुआ है, तो देश के अन्य शहरों की बात क्या ही करें ? दुर्घटनाओं के अलावा, इन स्पीड ब्रेकरों को "स्पाइन-ब्रेकर" करार दिया गया है। यह इस संदर्भ में है कि जब सेंट एलायसियस कॉलेज में एक समारोह के लिए राष्ट्रपति कलाम ने 2005 में मैंगलोर का दौरा किया था, तो बेंडोर क्रॉस जंक्शन पर स्थित स्पीड ब्रेकर को हटा दिया गया था, और बाद में उसे दोबारा नहीं बनवाया गया। राष्ट्रपति के लिए क्या अच्छा है बाकी नागरिकों के लिए भी अच्छा होना चाहिए। लेकिन राष्ट्रपति और अन्य वीवीआईपी कमर तोड़ सड़कों पर यात्रा नहीं करते हैं, जैसे कोट्टारा चौकी-उरवा रोड, जो अब खराब तरह से डिज़ाइन किए गए स्पीड-ब्रेकरों से भरा हुआ है। चिंताजनक बात यह है कि ये स्पीड ब्रेकर अब आंतरिक सड़कों तक फैल गए हैं। यह आशा की जाती है कि जिले में मेंगलूरु और पीडब्ल्यूडी में निगम नए स्पीड-ब्रेकर के निर्माण से बचेंगे और मौजूदा को दुरुस्त करने या लोगों के लिए सुरक्षित सड़क बनाने के लिए समीक्षा करेंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि रंबलर स्ट्रिप्स एक अच्छा विकल्प है क्योंकि वाहनों को धीमा करने के उद्देश्य की सेवा करते समय वाहन चालक के शरीर को किसी भी प्रकार से तकलीफ नहीं देते हैं।



क्या कहते हैं विशेषज्ञ

शहर के फोर्टिस अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ चिराग नारायण थोंसे का कहना है कि हालांकि दुर्घटनाओं को रोकने के लिए, राज्य में स्पीडब्रेकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहे हैं, जिससे उनके उद्देश्य के अनुसार अधिक दुर्घटनाएं और स्वास्थ्य समस्याएं हो रही हैं। इंटरवर्टेब्रल डिस्क एक सदमे अवशोषक के रूप में काम करता है। जब बाइक या कार पर, पैरों पर कोई सनसनी नहीं होती है और जब वाहन सवार गड्ढों या स्पीडब्रेकर पर कूदता है, तो उत्पन्न दबाव बहुत अधिक होता है, जिससे डिस्क का शिथिलता या स्लिप डिस्क की समस्या हो सकती है। यह एक गंभीर समस्या है जिसका आमतौर पर कोई इलाज नहीं होता।


नियमों का पालन कर बनाये जाने वाले स्पीड ब्रेकरों की तुलना में मनमाने तरीकों से बनाये गए स्पीड ब्रेकर स्वास्थ्य की दृष्टिकोण से ज्यादा खतरनाक होते हैं। उन्होंने कहा कि बेंगलुरु में एक सामान्य व्यक्ति सड़क पर कम से कम दो से तीन घंटे का समय बीतता है। ऐसे में उन तीन घंटों में एक व्यक्ति न जाने कितने स्पीड ब्रेकर से होकर गुजरता होगा। इन स्पीड ब्रेकरों से चालकों और यात्रियों को परेशानी और पीठ की यानी रीढ़ की हड्डी में गंभीर समस्याएं हो सकती है। ब्रेकरों की वजह से बसों पर यात्रा करने वाले यात्रियों को भी खासा नुक्सान पहुँचता है। बस में खड़े रहने और बैठने वाले व्यक्तियों को स्पीड ब्रेकरों से चोट पहुँचती हैं।


फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक एंड गायनेकोलॉजिकल सोसायटी ऑफ़ इंडिया की चेयरपर्सन, यशोधरा प्रदीप कहती हैं,  मासिक धर्म से गुजरने वाली महिला को इसके फैलने का डर होता है जो अत्यधिक शर्मिंदगी का कारण बन सकता है क्योंकि वह कपड़े के एक अतिरिक्त सेट के साथ तैयार नहीं होगी। गर्भवती महिला के मामले में, यह बहुत खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि यह माँ और बच्चे की जान ले सकता है।


अभ्यस्था अस्पताल की जनरल मेडिसीन की डॉक्टर सुप्रिया मल्लिक कहती हैं, स्पीड ब्रेकर आवश्यक हैं, लेकिन उन्हें सही तरीके से बनाया जाना चाहिए। हमारे देश में कोई मानक मानदंड का पालन नहीं किया जा रहा है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संरचनाएं बहुत अधिक नहीं हैं और इसलिए वे जनता, विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं। इससे कई बार गर्भाशय फटने की भी संभावनाएं होती है। इन स्पीड ब्रेकरों से बाइक सवार अपनी सीटों पर उछल पड़ते हैं। इस तरह के स्टंट रीढ़ को प्रभावित कर सकते हैं। बहुत से स्पीड ब्रेकर भी अच्छे नहीं होते, क्योंकि जिन व्यक्तियों को पहले से ही पीठ की समस्या है, उन्हें इससे अत्यधिक दर्द होगा। 

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