क्या यह भी है जुमलों भरा मैनिफेस्टो

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

क्या याद है आपको 15 लाख का वो वादा। क्या याद है आपको 20 लाख युवाओं को रोज़गार देने का वो वादा। क्या याद है आपको देश के किसानों को आर्थिक मदद करने का वो वादा। और क्या याद है आपको देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन तक पहुंचाने का वो वादा। हां, आपको वादे तो खुब याद होंगे लेकिन अफसोस आप उन्हें न तो सच होता देख सकें और न ही आने वाले दिनों में आप इसे सच होता हुआ देख सकेंगे। क्योंकि ये वादे कागजों तक ही सीमित रखने के लिए बनाए गए थे। इन वादों का सच होना कभी महत्वपूर्ण था ही नहीं। इसीलिए मंत्री जी ने खुद एक रैली के दौरान कह दिया था कि चुनाव के पहले किए गए उन सारे वादों को चुनावी जुमला कहा जाता है। 

राजनीति को एक खेल की तरह प्रदर्शित करने वाले विभिन्न पार्टियों के नेताओं की सोच इतने निम्न स्तर की हो गई है कि अब वे जनता के सरेआम बेवकूफ समझते हुए चुनावी जुमलों के मायाजाल में फांस रहे हैं। लेकिन यहां सवाल ये है कि क्या पार्टियों के चुनाव घोषणापत्र को देख जनता संतुष्ट हो जाती है। क्या वे अब नेताओं के वादे को सच मान लेते हैं। क्या जनता को अब भी चुनावी जुमलों का मतलब समझना बाकी है। खैर, यह तो वक्त ही बताएगा। बिहार चुनाव में फैसला जनता कर लेगी और जनता ने किस बात पर कितना विश्वास किया यह भी सरेआम हो जाएगा। 

आज चुनावों के विकास में बाधक होने का तर्क स्वीकार कर लिया गया तो क्या कल समूचे लोकतंत्र को ही

विकास विरोधी ठहराने वाले आगे नहीं आ जायेंगे? किसे नहीं मालूम कि विकास हमेशा ही शासक दलों का

हथियार रहा है और सरकारों को असुविधा तभी होती है जब उसके लाभों के न्यायोचित वितरण की बात कही

जाये। चूंकि सरकार अपने जाप के आगे किसी की और कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है, स्वाभाविक ही उसके

इस संबंधी इरादों को लेकर संदेह घने हो रहे हैं। हमारे संवैधानिक ढांचे में सामान्य परिस्थितियों में सरकारें पांच

साल के लिए चुनी जाती हैं। हां, उनसे जनता का भरोसा उठता है और वे गिरती हैं, तो मध्यावधि चुनाव होते हैं,

जिनमें जनता को फिर से अपने विकल्प बताने का मौका मिलता है।  

क्यों न कहें जुमला पार्टी

सरकारें समस्याओं की जटिलताओं में जाकर उनके समाधान के समुचित प्रयासों का रास्ता छोड़कर उनके सरलीकरणों के बहस जुमलों में उलझने और उलझाने लग जाएं तो वही होता है, जो हम इन दिनों प्रायः रोज देख रहे हैं। इनमें ताजा मामला चुनावों से जुड़ा है, जिनकी अरसे से रुकी पड़ी सुधार-प्रक्रिया को किंचित सार्थक ढंग से आगे बढ़ाने के बजाय युवाओं को नौकरी देने के जुमले को इस तरह आगे किया जा रहा है, जैसे वक्त की सबसे बड़ी जरूरत वही हो। भारतीय जनता पार्टी को जब भी मन होता है, इस जुमले का जाप करने ही लग जाते हैं, अब उन्होंने अपने इस जाप में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी शामिल कर लिया है। राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे में आप अगर इन्हें जुमला पार्टी कहते हैं तो क्या बुराई है। 

भाजपा का चुनावी घोषणापत्र और वादों का बहार

भाजपा ने आत्मनिर्भर बिहार का रोडमैप में एक लक्ष्य, 5 सूत्र और 11 संकल्पों का जिक्र किया है। लालू-राबड़ी के 15 साल के बाद और नीतीश के 15 साल के बाद बिहार के 11 अलग-अलग सेक्टर में आए बदलाव की भी तुलना की गई है। एक न्यूज़ पोर्टल की एक रिपोर्ट के अनुसार घोषणापत्र जारी करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि लालू-राबड़ी के 15 साल के औद्योगिक उत्पादन का कोई डेटा नहीं मिला, इसलिए हमने इस घोषणापत्र में वो जगह खाली छोड़ दी। हमारे 15 साल के शासन में औद्योगिक विकास में 17 प्रतिशत का इजाफा हुआ।


एक लक्ष्य: आत्मनिर्भर बिहार

क्या है वो 5 सूत्र

  • स्वस्थ समाज, आत्मनिर्भर बिहार

  • शिक्षित बिहार, आत्मनिर्भर बिहार

  • गांव-शहर, सबका विकास

  • सशक्त कृषि, समृद्ध किसान

  • उद्योग आधार, सबल समाज

कौन से हैं वो 11 संकल्प

  • बिहार के हर निवासी का मुफ्त कोरोना टीकाकरण कराएंगे।

  • मेडिकल, इंजीनियरिंग समेत तकनीकी शिक्षा अब हिंदी में उपलब्ध कराएंगे।

  • 3 लाख शिक्षकों की नियुक्ति करेंगे।

  • आईटी हब के रूप में विकसित कर 5 साल में 5 लाख से ज्यादा रोजगार के अवसर उपलब्ध कराएंगे।

  • एक करोड़ महिलाओं को स्वावलंबी बनाएंगे।

  • कुल 1 लाख लोगों को स्वास्थ्य विभाग में नौकरी उपलब्ध कराएंगे, अखिल भारतीय आरोग्य संस्थान एम्स का संचालन 2024 तक सुनिश्चित करेंगे।

  • धान और गेहूं के बाद अब दलहन की भी खरीद एसएमपी की निर्धारित दरों पर करेंगे।

  • ग्रामीण क्षेत्रों तथा शहरी क्षेत्रों के और 30 लाख लोगों को वर्ष 2022 तक पक्के मकान देंगे।

  • दो वर्षों में निजी और कॉम्फेड आधारित 15 नए प्रोसेसिंग उद्योग लगाएंगे।

  • अगले 2 वर्षों में मीठे पानी में पलने वाली मछलियों के उत्पादन में राज्य को देश का नंबर एक राज्य बनाएंगे

  • बिहार के 10 हजार नए किसान उत्पाद संघों को आपस में जोड़कर राज्यभर के विशेष फसल उत्पाद जैसे, मक्का, फल, चूड़ा, मखाना, पान, मसाला, मेंथा, औषधीय पौधों की सप्लाई चेन विकसित करेंगे। इससे प्रदेश में 10 लाख रोजगार के अवसर सृजित होंगे।


कैसे हो सालों साल का हिसाब

न्यूज पोर्टल ने घोषणापत्र जारी होने से एक दिन पहले ही इसमें शामिल बिंदुओं की खबर छापी थी। घोषणापत्र में 15 साल बनाम 15 साल का जिक्र किया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में राज्य सरकार में क्या किया गया, उसके बाद नीतीश सरकार ने क्या उपलब्धि हासिल की, यह दर्शाया गया है। तकनीकी शिक्षा में 15 साल के राजद शासन में क्या स्थिति थी और अब के शासन में क्या स्थिति है। भाजपा ने यह भी बताया कि लालू-राबड़ी के 15 साल में प्रति व्यक्ति आय 8 हजार रुपए थी, जो भाजपा-जदयू की गठबंधन सरकार में बढ़कर 43 हजार रु. से ज्यादा हो गई।

क्या कहते हैं घोषणा पत्र बनाने वाले नेता

भाजपा की घोषणा पत्र समिति के सह संयोजक ऋतुराज सिन्हा का कहना है कि आत्मनिर्भर बिहार एक नारा नहीं बल्कि भविष्य के बिहार की परिकल्पना है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश के सामने जिस आत्मनिर्भर भारत की सोच रखी है, उसको साकार करने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि एक नयी ऊर्जा के साथ, उन बड़े राज्यों में पहल की जाए, जिनमें उस तरीके से विकास नहीं हो पाया, जिसका वह हकदार था। देश की 11 फ़ीसदी जनता बिहार वासी है। ऐसे में आत्मनिर्भर भारत अभियान का आग़ाज़ बिहार से होना स्वाभाविक भी है और न्यायसंगत भी। भाजपा का आत्मनिर्भर बिहार - संकल्प पत्र, प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा बिहार को दी जा रही प्राथमिकता का सूचक है।


घोषणापत्रों का आंकलन


जेडीयू का स्वावलंबी बिहार का सपना - बिहार विधानसभा चुनाव के लिए जेडीयू ने चुनाव घोषणा में पार्टी ने सक्षम बिहार-स्वावलंबी बिहार के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सात निश्चय पार्ट-2 कार्यक्रम को लागू करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई है। सात निश्चय-2 के तहत युवा शक्ति-बिहार की प्रगति, सशक्त महिला-सक्षम महिला, हर खेत तक सिंचाई का पानी, स्वच्छ गांव-समृद्ध गांव, स्वच्छ शहर-विकसित शहर, सुलभ सम्पर्कता और सबके लिए अतिरिक्त स्वास्थ्य सुविधा का वादा किया गया है। सात निश्चय-1 कार्यक्रम में बिहार के युवाओं को लेकर चलाए गए कार्यक्रम को आगे भी जारी रखने के साथ सात निश्चय-2 के युवा शक्ति-बिहार की प्रगति कार्यक्रम के तहत युवाओं को और बेहतर तकनीकी प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाएगी और साथ ही उद्यमिता को और बढ़ावा दिया जाएगा। सात निश्चिय-2 के तहत युवाओं के लिए न सिर्फ उच्च स्तर के प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है बल्कि उनको अपना व्यवसाय लगाने के लिए सरकार मदद करेगी। नया उद्यम या व्यवसाय के लिए परियोजना लागत का 50 फीसदी या अधिकतम तीन लाख रुपये तक का अनुदान दिया जाएगा। सात निश्चिय-2 के सशक्त महिला-सक्षम महिला कार्यक्रम के तहत महिलाओं में उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजना लाई जाएगी। इसके तहत उनकी ओर से लगाए जा रहे उद्यमों में परियोजना लागत का 50 फीसदी या अधिकतम 5 लाख रुपये तक का अनुदान और अधिकतम 5 लाख रुपये तक ब्याज मुक्त लोन दिया जायेगा। उच्चतर शिक्षा हेतु प्रेरित करने के लिए इंटर पास होने पर अविवाहित युवतियों को 25,000 रुपये और स्नातक होने पर महिलाओं को 50,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। क्षेत्रीय प्रशासन में आरक्षण के अनुरूप महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाएगी।

कांग्रेस का क्या हैं बड़े ऐलान - बिहार चुनाव को लेकर कांग्रेस पार्टी ने भी अपना घोषणापत्र जारी किया है। इसमें 10 लाख नौकरियां, कृषि कर्ज माफी, 1500 रुपये बेरोजगारी भत्ता, बिजली बिल में 50 फीसदी छूट और हाल ही में अस्तित्व में आए तीन कृषि कानूनों को समाप्त करने समेत कई वादे किए गए हैं। 10 लाख लोगों को सरकारी नौकरी देने का फैसला महागठबंधन की सरकार बनने पर पहली कैबिनेट बैठक में लिया जाएगा। जिन लोगों को रोजगार नहीं मिल सकेगा, उन्हें 1500 रुपये का बेरोजगारी भत्ता दिया जायेगा। कांग्रेस के घोषणापत्र में कई बातें महागठबंधन के सहयोगियों से मिलती जुलती हैं। इनमें 10 लाख लोगों को नौकरियां देना और कृषि कर्ज माफी का वादा शामिल है। कांग्रेस ने कहा कि महागठबंधन की सरकार बनने पर विधानसभा के पहले सत्र में हाल ही में बनाए गए कृषि संबंधी तीन कानूनों को समाप्त करने का विधेयक पारित किया जायेगा। बिहार के लिए कांग्रेस के घोषणापत्र में दो एकड़ से कम जोत वाले किसानों की मदद के लिए ‘राजीव गांधी कृषि न्याय योजना’ शुरू करने की बात कही गई है ।

महागठबंधन के घोषणा-पत्र की बड़ी घोषणाएं - बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन में घोषणा पत्र जारी किया। इस मौके पर आरजेडी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने कहा कि महागठबंधन का सबसे ज्यादा जोर बेरोजगारी दूर करने पर है। अगर वह सरकार में आते हैं तो उनकी कलम से पहला फैसला 10 लाख बेरोजगारों को सरकारी नौकरी दी जाएगी। सरकारी नौकरी में बहाली के लिए छात्र-छात्राओं से कोई आवेदन शुल्क नहीं लिया जाएगा। राज्य में कर्पूरी श्रमवीर सहायता केंद्र बनेंगे। जहां किसी भी आपदा के वक्त प्रवासी व उनके परिवार को बिहार सरकार से मदद मिल सकेगी। मनरेगा के तहत प्रति परिवार के बजाय प्रति व्यक्ति को काम का प्रावधान, न्यूनतम वेतन की गारंटी एंव कार्य दिवस को 100 से 200 दिन किया जाएगा। मनरेगा की तर्ज पर शहरी रोजगार योजना भी बनाया जाएगा। संविदा प्रथा को समाप्त कर नियोजित शिक्षकों को स्थाई कर समान काम समान वेतन की नीति पर अमल किया जाएगा। सभी विभाग में निजीकरण खत्म किया जाएगा। साथ ही स्थाई और नियमित नौकरी की व्यवस्था की जाएगी। राज्य में वर्ष 2005 से लागू नई अंशदायी पेंशन योजना को बंद कर पूर्व की भांति पुरानी पेंशन योजना लागू की जाएगी।

एलजेपी का विजन डॉक्यूमेंट - एलजेपी अध्यक्ष चिराग पासवान ने अपना बहुप्रतीक्षित विजन डॉक्यूमेंट पटना के पार्टी ऑफिस में लॉन्च किया। चिराग के इस विजन डॉक्यूमेंट का नाम जो पहले से तय था वही रखा गया है यानि बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट। उन्होंने कहा कि इस विजन में चार लाख से ज्यादा बिहारियों के विचार को रखा गया है और मेरे पिता रामविलास पासवान का पूरा अनुभव इसमें शामिल है। चिराग ने कहा कि बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट में सभी की समस्याएं शामिल है, लेकिन कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका हल इसमें शामिल नहीं हो।


मोदी सरकार की बड़ी नाकामियां -


पेट्रोल-डीजल का दाम सातवें आसमान पर : पेट्रोल-डीजल के बढ़े दाम से देश में हाहाकार है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद पेट्रोल सबसे महंगा हुआ है। जबकि मोदी सरकार सत्ता में आने से पहले यह कहती रही कि उनकी सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम कांग्रेस की सरकार से भी कम कर देगी। हैरान करने वाली बात ये है कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम है, बावजूद इसके भारत में तेल की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं। यानी कि मोदी सरकार का महंगाई कम करने का वादा भी सिर्फ वादा ही साबित हुआ।

कालेधन पर सरकार फेल : 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले के पीएम मोदी के भाषण को याद करें। चुनावी रैलियों में पीएम मोदी का एक भी भाषण ऐसा नहीं होता था, जो बिना कालेधन के जिक्र के संपन्न हो जाए। हालांकि आज हकीकत सबके सामने है। पीएम मोदी अपने भाषणों में कहा करते थे कि उनकी सरकार जब सत्ता में आएगी तो विदेशों में जमा भारतीय लोगों का कालाधन वो ले आएंगे और यह कालाधन इतना अधिक होगा कि सरकार हर व्यक्ति को 15 -15 लाख रुपये देगी। मोदी सरकार का पहला कार्यकाल पूरा हो गया और दूसरे कार्यकाल की शुरुआत होकर भी साल भर का समय बीत गया, लेकिन अब भी लोगों को इस बात का इंतजार है कि विदेशों से कालाधन कब आएगा और उनके अकाउंट में 15 लाख रुपये कब आएंगे, जिसका वादा चुनाव से पहले पीएम मोदी ने किया था। इस मामले पर मोदी सरकार की यह सबसे बड़ी नाकामी है कि अभी तक न सरकार को पता है कि विदेशों में कितना कालाधन जमा है।

बेरोजगारी और बैकफुट पर मोदी सरकार : अपने अन्य चुनावी मुद्दों में नरेंद्र मोदी ने बेरोजगारी को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया था। और बेरोजगारी के इसी मुद्दे को इस बार फिर से बिहार चुनावों में भूनाने की तमाम कोशिशें की जा रही है। सरकार के सत्ता में आते ही उन्होंने सत्ता सुख भोगना शुरू कर दिया। कहीं न कहीं इन्हीं वजहों से बेरोजगारी का मुद्दा, जिसके सफल प्रयोग से बीजेपी ने कांग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंका, वह केवल मात्र एक वादा ही रह गया। मोदी सरकार ने चुनावी घोषणा पत्र में हर साल 2 करोड़ रोजगार का वादा किया था, मगर रोजगार सृजन के मामले में मोदी सरकार औंधे मुंह गिरी है। यही वजह है कि बेरोजगारी के मुद्दे पर बीजेपी और मोदी सरकार बैकफुट पर नजर आ रही है। बेरोजगारी के मुद्दे पर जब मोदी सरकार फंसी तो पकौड़े बेचने को भी रोजगार की श्रेणी में ले आई। सच्चाई तो यह है कि रोजगार के सृजन का वादा मोदी सरकार नहीं निभा पाई है।

झूठे वादे और जुमले की राजनीति

वर्ष 2014 की लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कई वादें किए। इनमें मुख्य रूप से अच्छे दिन आएंगे, भ्रष्टाचार का खात्मा किया जाएगा, कालाधन वापस लाया जाएगा, बेरोजगारों को नौकरी मिलेगी, हरेक के बैंक खाते में 15 लाख रूपए दिए जाएंगे, किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा, महंगाई दर कम किया जाएगा, शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जाएगा, रूपए को मजबूत किया जाएगा, आतंरिक और बाहरी सुरक्षा बढ़ाई जाएगी, जैसे मुद्दे शामिल थे। लेकिन हकीकत तो यह है कि इनमें से एक भी वादे पूरे नहीं हुए। मजेदार बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2019 लोकसभा चुनाव से पहले तैयार अपने घोषणापत्र में एक बार फिर इन वादों को शामिल किया है। जब भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को इन वादों के बारे में सवाल किया जाता है तो वे कहते हैं कि ये तो चुनावी जुमला था। वे कहते हैं कि राजनीति में जुमलों का बाजार गर्म रखना जरूरी होता है। 


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