दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कौन

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

वायु प्रदूषण के मामले में दिल्ली की हालत पतली है। हर साल सर्दियों के शुरु होने के पहले वायु प्रदुषण बढ़ने लगता है। इस बार भी यह सिलसिला शुरु हो गया है। दिल्ली में ख़राब हवा को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच सियासी तकरार तेज़ रही है लेकिन इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ सालों में केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में बदलाव के लिए कुछ किया ही नहीं। मिसाल के तौर पर अब दिल्ली में कोई भी बड़ा उद्योग नहीं है। सारा पब्लिक ट्रांसपोर्ट और छोटे व्यावसायिक वाहन नेचुरल गैस पर चल रहे हैं। दिल्ली के सभी कोयला बिजली घर बन्द कर दिए गए हैं। कोयला, पेट कोक और प्रदूषण फैलाने वाले फर्नेस ऑइल पर पाबंदी है और पेट्रोल पंपों में बीएस -6 ईंधन मिल रहा है। ट्रकों के शहर में प्रवेश पर पाबंदी है और जो शहर में प्रवेश करते हैं उन्हें पर्यावरण सेस देना पड़ता है। इसके बावजूद दिल्ली को साफ़ हवा के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। इतने कदम उठाने के बाद भी हम केवल उच्चतम स्तर के प्रदूषण को ही मिटा पाए हैं और दिल्ली के प्रदूषण में 65 प्रतिशत अतिरिक्त कटौती करनी होगी। इसके लिये बड़े स्तर पर कदम उठाने के साथ उन्हें उसी गंभीरता से लागू करने और सख्त सज़ा और जुर्माने का प्रावधान करना होगा। दिल्ली सरकार की एक सबसे अच्छी पहल ऑड-इवेन योजना भी रही। कुछ समय के बाद ऑड-इवेन योजना की वजह से प्रदूषण के स्तर को कुछ हद तक नीचे लाया गया।  

राजधानी की हवा को साफ़ करने के लिए सभी सख़्त कदम दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में बराबर कड़ाई से लागू करने चाहिए क्योंकि हवा की गुणवत्ता सरहदों को नहीं पहचानती। हर साल अक्टूबर - नवंबर के महीने में किसानों के पराली जलाए जाने को लेकर काफ़ी विवाद होता है, लेकिन यह भी सच है कि पराली प्रदूषण का बहुत छोटा हिस्सा है। दिल्ली के आसपास के राज्यों में साल भर में बड़ी मात्रा में कूड़ा जलाया जाना कहीं बड़ी समस्या है। 

हालांकि सबसे बड़ी बात ये है कि दिल्ली शहर के लिए, लिए गए निर्णयों में केजरीवाल सरकार के साथ राज्यपाल का और केंद्र सरकार का दखल होता है, जिसकी वजह से किसी समस्या का हल निकाल पाना इतना आसान नहीं होता। इसीलिए हर वर्ष स्मॉग की इस समस्या के आते ही सियासी दावपेंच रचे जाते हैं और जैसे ही जनवरी का माह आता है तो सारी बातें ताक पर रख दी जाती है। आपसी सहमति से समस्या का समाधान होना तो दूर की बात है एक मत पर पहुंचना भी कभी कभी मुश्किल हो जाता है। हालांकि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बीते कुछ वर्षों में अरविंद केजरीवाल की सरकार ने दिल्ली की लोगों के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं को लाया है और सरकार निरंतर जनता हित में कार्य कर रही है। अब सवाल ये उठता है कि पड़ोसी देश चीन की तरह स्मॉग टॉवर लगाने की बात तो केजरीवाल सरकार कर देती है लेकिन फिर केंद्र सरकार के हस्तक्षेप की वजह से सारा का सारा मामला गड़बड़ा जाता है। 

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