पुलिस की बर्बरता जनता सहे कब तक ?

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

- क्यों लोग पुलिस को देख सुरक्षित नहीं बल्कि असहज महसूस करते हैं

- क्या राजनीतिक स्तर पर भी है सुधार की जरूरत

देखिए देश में किस प्रकार बेटियों का सम्मान किया जा रहा है। देखिए और सोचिए किस प्रकार से बेटियों के दामन में दाग लगा कर, दाग समेत उनके अस्तित्व को मिटाया जा रहा है। देखिए, सोचिए और शर्म कीजिए कि हो न हो आप इन जघंन्न वारदातों के गवाह बन रहे हैं। आने वाली पीढ़ी को शिक्षा देने की कल्पना तो दूर की बात है, पहले अपने को तो शिक्षित कर लें उसी में बेटियां सुरक्षित महसूस करेंगी। पिछले दिनों जिस प्रकार से उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक बेटी जिसने अन्य कई बेटियों की तरह पढ़ने, आगे बढ़ने और कुछ कर गुजरने का सपना देखा था, एक घिन्नोने अपराध ने उसके सपनों को चखनाचूर कर दिया। बदकिस्मती उसकी ऐसी कि आखिरी बार उसे उसके परिवार वाले देख भी न सके। हाथरस में हुई घटना एक बार फिर से आम आदमी के साथ पुलिस की बदसलूकी का भयावह दृश्य पेश कर रही है। इस घटना से निपटने में पुलिस प्रशासन ने जो बर्बरता दिखाई है उसकी चर्चा देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी हो रही है। इतना ही नहीं इस घटना पर सरकार का उदासीन रवैय्या देख संयुक्त राष्ट्र संघ के भारतीय प्रमुख ने भी इसकी आलोचना की है। गैंगरेप की यह घटना अन्य कई आपराधिक घटनाओं से भी ज्यादा भयानक हैं, क्योंकि यहां अपराधियों से ज्यादा दोष पुलिस की भूमिका को दिया जा रहा है। 

हालांकि यह कोई पहली बार नहीं है जब देश के किसी राज्य पुलिस प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। अक्सर प्रदेश पुलिस के कार्यों को राज्य सरकार द्वारा दबा दिया जाता है और लोगों को इसकी भनक तक नहीं पड़ती। इस बात में भी कोई दो राय नहीं होगी कि शायद इन्हीं घटनाओं की वजह से देश की जनता के नज़रों में पुलिस की छवि बहुत अच्छी नहीं है। आप किसी सड़क से चलिए, अगर वहां पुलिस खड़ी हो तो हम में से ज्यादातर लोग सुरक्षित महसूस करने की बजाए और अधिक असहज महसूस करने लगते हैं। लोकसभा चुनाव के पहले अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय एवं लोक-नीति द्वारा देश के बारह राज्यों में करवाए गए एक सर्वे के अनुसार देश की जनता के लिए पुलिस सबसे अविश्वसनीय संस्थाओं में से है। उसी सर्वे में जनता ने सेना को सबसे अधिक विश्वसनीय संस्था माना है। लेकिन इसके लिए पुलिस के ऊपर सारा दोष मढ़ देना पुलिस के साथ अन्याय होगा। लोकतंत्र में पुलिस का दायित्व आंतरिक सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, अपराध-नियंत्रण के साथ-साथ नागरिक के आत्मसम्मान की सुरक्षा का भी होता है। भारत में पुलिस के साथ अनेकों समस्याएं हैं जिनपर शायद ही कभी चर्चा होती है। पुलिस की बात आते ही नागरिकों के मन में असुरक्षा की भावना आ जाती है। ऐसा इसीलिए क्योंकि सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध पुलिस गैरकानूनी कार्यों में लिप्त होती जा रही हैं। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि अगर हिरासत में हिंसा और मौत होती है तो यह कानून के शासन का उल्लंघन करता है और हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ है। भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के आधार पर एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की एक रिपोर्ट ने स्वीकार किया, कि 01 अप्रैल, 2017 से 28 फरवरी, 2018 तक हिरासत में कुल 1674 मौतें हुई हैं, जिनमें न्यायिक हिरासत में 1530 और पुलिस हिरासत में करीब 144 लोगों की मौतें शामिल है।

पुलिस को आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारियों, जनता की अपेक्षाओं, नेताओं की मनमानियों, और असामाजिक तत्वों की कारस्तानियों के बीच घंटों काम करना पड़ता है, जिसमें समय की कोइ पाबंदी नहीं होती है। इसके साथ-साथ उनके ऊपर मीडिया और गैर-सरकारी संस्थाओं का भी दबाव होता है जो उनकी जवाबदेही तय करने के लिए कुछ हद तक ठीक भी है। भारतीय पुलिस बल की मौजूदा व्यवस्था भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 के द्वारा निर्देशित होती है। इसके अलावा कुछ और भी कानून हैं जिनसे पुलिस की प्रशासनिक व्यवस्था निर्देशित की जाती है। इन कानूनों में भारतीय दंड संहिता, 1862; भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872; और दंड प्रक्रिया संहिता, 1861 (सीआरपीसी) शामिल हैं। संविधान में पुलिस की जिम्मेदारी राज्यों पर है, लेकिन केंद्र के पास भी अपनी पुलिस होती है। कुछ राज्यों के भी अलग-अलग कानून हैं। केंद्र और राज्यों के बजट का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा ही पुलिस पर खर्च होता है।


पुलिस की समस्याओं को मुख्यतः दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है- संस्थागत और वैधानिक। संस्थागत चुनौतियों की बात की जाए तो भारत में पुलिस बल की कमी पुलिस विभाग के लिए एक गंभीर चुनौती है। 2019 के डाटा के मुताबिक पुलिस की कुल स्वीकृत 25,95,435 संख्या में केवल 20,67,270 ही वास्तविक बल है। यानी लगभग पाँच लाख पद खाली पड़े हैं। हालांकि 2018 की तुलना में वास्तविक संख्या में 9।52 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन फिर भी यह संतोषजनक और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्रभावशाली कानून व्यवस्था बनाने के लिए प्रति लाख नागरिकों में 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए जबकि भारत जैसे विशाल देश में यह संख्या मात्र 158 है।

दूसरी समस्या है वैधानिक। देश का कानूनी ढांचा ऐसा है कि कई बार पुलिस को न चाहते हुए भी नेताओं के दबाव में पक्षपात करना पड़ता है। पुलिस की ड्यूटी की प्रकृति को देखते हुए इस बात की संभावना रहती है कि इसको मिली हुई शक्तियों का दुरुपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा, आईपीए की धारा चार के अनुसार, पुलिस न केवल अपने वरिष्ठ अधिकारी के प्रति, बल्कि कार्यपालिका के नियंत्रण में काम करती है। हालांकि दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की थी कि कार्यपालिका द्वारा इस शक्ति का दुरुपयोग किया जाता है, और मंत्रीगण व्यक्तिगत और राजनीतिक कारणों के लिए पुलिस बलों का उपयोग करते हैं। इसलिए विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि राजनीतिक कार्यकारिणी की शक्तियों का दायरा कानून के तहत सीमित किया जाना चाहिए।

हजारों अत्याचार के बीच अब भी सुरक्षा का इंतजार 

तेईस साल और तीन दूरदर्शी प्रधान मंत्री, स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह, और नरेंद्र मोदी, के सत्ता में आने के बाद भी देश में अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। एंटी टॉर्चर कानून पारित नहीं करने से देश यूपीए और एनडीए सरकार दोनों से ही दुखी है। भारत ने 14 अक्टूबर, 1997 को अत्याचार के खिलाफ अमेरिकी समझौते पर हस्ताक्षर किए, हालांकि, अब तक भारत में इसकी पुष्टि नहीं की गई है। 170 हस्ताक्षरकर्ताओं में से, भारत केवल चार देशों में से एक है जो अभी तक कन्वेंशन को मंजूरी देने के लिए है, यहां तक ​​कि चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों ने भी यू.एन. सम्मेलन की पुष्टि की है। एंटी टॉर्चर कानून में तेजी लाने के लिए 2018 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पूर्व यूपीए कानून मंत्री अश्विनी कुमार की याचिका में कहा गया है कि चूंकि जांच का कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं है, इसलिए संदिग्धों से कबूलनामा प्राप्त करने के लिए यातना जांच का अभिन्न अंग है।

नहीं भूले तूतीकोरिन की घटना

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में पिता-पुत्र का कथित उत्पीड़न करने वाले पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा दर्ज करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य थें, जिसे बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने भी माना। हाईकोर्ट ने ये आदेश कथित पुलिस उत्पीड़न के कारण जान गँवाने वाले पिता पुत्र की चोटों और इस मामले में की गई मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट के आधार पर दिया है। मालूम हो कि तूतीकोरिन में 19 जून को पुलिस ने 60 वर्षीय पी जयराज और उनके बेटे जे फेनिक्स को लॉकडाउन की समयसीमा के बाद दुकान खोलने के आरोप में हिरासत में लिया था। चार दिन बाद संदिग्ध परिस्थितियों में दोनों की मौत हो गई।

पुलिस हिरासत में कथित उत्पीड़न के बाद पिता पुत्र की इस मौत के मामले ने भारत में पुलिस हिरासत में मौत और उत्पीड़न के मुद्दे को एक बार फिर से उठा दिया था। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हिरासत में रोज़ाना औसतन पाँच लोगों की मौत होती है। इंडिया एनुअल रिपोर्ट ऑन टार्चर 2019 के मुताबिक़ साल 2019 में हिरासत में कुल 1731 मौतें हुईं इनमें से 125 मौतें पुलिस हिरासत में हुईं थीं। वहीं एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक़ साल 2017 में पुलिस हिरासत में कुल 100 मौतें पुलिस हिरासत में हुईं थीं। इनमें से 58 लोग ऐसे थे जिन्हें हिरासत में तो लिया गया था लेकिन अदालत के समक्ष पेश नहीं किया गया था। इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक हिरासत में मौत के 62 मामलों में 33 पुलिसकर्मियों को गिरफ़्तार किया गया था जबकि 27 अन्य पर चार्जशीट दायर की गई थी।

क्यों हमेशा जनता बनती है उत्पीड़न का शिकार

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस उत्पीड़न का शिकार जनता ही होती है लेकिन ये बिडंबना ही है कि जनता ने न सिर्फ़ पुलिस उत्पीड़न को स्वीकार किया है बल्कि समय-समय पर उसका समर्थन भी किया है। हाल के सालों में तकनीक की दुनिया में हुए विकास का असर पुलिस की कार्यशैली पर भी पड़ा है। सीसीटीवी कैमरों, स्मार्टफ़ोन कैमरों ने जनता को पुलिस की कारगुज़ारियों को रिकॉर्ड करने का अवसर दिया है। क्या इससे पुलिस की कार्यशैली पर कुछ फ़र्क पड़ा है?

विशेषज्ञ कहते हैं, पुलिस सीसीटीवी कैमरों से बचना जानती है। सभी तकनीकी सुविधाओं के बावजूद जबतक समाज का नज़रिया नहीं बदलेगा तब तक पुलिस की कार्यशैली में बदलाव नहीं आएगा। जब तक समाज ये नहीं कहेगा कि हमें बर्बर पुलिस नहीं चाहिए, हमें क़ानून पर चलने वाली पुलिस चाहिए तब तक वास्तविक बदलाव नहीं आएगा।

आमतौर पर ये देखा गया है कि जब थाना या चौकी स्तर पर पुलिसकर्मी अभियुक्तों का उत्पीड़न करते हैं, तो शीर्ष पुलिस अधिकारी उनका बचाव करते नज़र आते हैं। सर्वश्रेष्ठ शिक्षा हासिल करने और मानवाधिकारों और क़ानून का प्रशिक्षण हासिल करने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी पुलिस के ऐसे व्यवहार का समर्थन क्यों करते हैं, इसकी वजह बताते हुए विभूतिनारायण राय कहते हैं, आईपीएस अधिकारियों के प्रदर्शन को आँकने वाले हमारे राजनेताओं का इस बात में विश्वास नहीं होता कि पुलिस क़ानून का पालन करते हुए जाँच करे, वो ख़ुद थर्ड डिग्री में विश्वास रखते हैं। शीर्ष अधिकारियों में उत्पीड़न के ऐसे मामले सामने आने पर सज़ा मिलने का डर भी नहीं होता है। वे कहते हैं, जब तक किसी थाने में हिरासत में हुई हत्या पर शीर्ष आईपीएस अधिकारियों को दंडित नहीं किया जाएगा इस तरह के मामले सामने आते रहेंगे। ये वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की ज़िम्मेदारी है कि जूनियर अधिकारी क़ानून और मानवाधिकारों का पालन करें। राय कहते हैं, 1861 में भारत में जो पुलिस व्यवस्था बनी, वो 1947 में आज़ादी मिलने के बाद भी जारी रही। इसकी वजह शायद ये है कि जो लोग सत्ता में आए उन्हें भी ऐसी ही पुलिस अच्छी लग रही थी जो क़ायदे-क़ानूनों का उल्लंघन करते हुए उनके राजनीतिक हित पूरे करने में मददगार हो। मैंने देखा है कि अधिकतर आईपीएस अधिकारी ये मानते हैं कि थर्ड डिग्री एक कारगर तरीक़ा है।

पुलिस प्रशासन और राजनीतिक कनेक्शन

ऐसे में सवाल उठता है कि सुधार पुलिस के स्तर के बजाए राजनीतिक स्तर पर होना ज़्यादा ज़रूरी है? विशेषज्ञ कहते हैं, सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से जब पुलिस में सुधार की बात हुई थी तो कहा गया था कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें पुलिस अधिकारी पर नेताओं का दबाव न हो। साथ ही शिकायत की प्रक्रिया को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया गया था। लेकिन ये दोनों ही चीज़े नहीं हो सकीं। हम देखते हैं कि पुलिस कई बार उत्पीड़न की कार्रवाई करते हुए ये सोचती है कि सरकार जैसा चाह रही है वो वैसा कर रही है और उसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। पुलिस पर ही क़ानून व्यवस्था को संभालने की ज़िम्मेदारी और जब पुलिस ही क़ानूनों का उल्लंघन करे तो क्या हो। क्या सिस्टम में पर्याप्त चेक एंड बैलेंस है? विभूतिनारायण राय कहते हैं, पुलिस में सुधार की ज़रूरत है। लेकिन जिन बुनियादी बदलावों की ज़रूरत है वो नहीं हो पा रहे हैं और इसकी सिर्फ़ एक ही वजह है, हमारे शासक वर्ग को ऐसी ही पुलिस पसंद है। वो कहते हैं, जब तक जो हमारा शासक वर्ग है, जो राजनीतिक प्रतिनिधि क़ानून बनाते हैं, जो पुलिस की ट्रेनिंग और अकाउंटेबिलीटी के लिए ज़िम्मेदार है, जब तक वो स्वयं ये विश्वास नहीं करेंगे कि एक सभ्य पुलिस भारत को चाहिए, तब तक पुलिस की कार्यशैली में बहुत परिवर्तन नहीं हो पाएगा।

अत्याचार निवारण विधेयक और मोदी सरकार का रवैय्या

सन् 1997 के संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन को प्रमाणित करने के लिए, अत्याचार निवारण विधेयक 2010 को लोकसभा में पेश किया गया और 06 मई, 2010 को पारित किया गया। जब यह राज्यसभा में स्थानांतरित हुआ, तो प्रबुद्धों ने विधेयक को एक प्रवर समिति को संदर्भित किया। हालांकि, फोकस और प्राथमिकता में कमी के कारण, बिल 15 वीं लोकसभा के विघटन के साथ समाप्त हो गया। यूपीए सरकार के पूर्व कानून मंत्री, तत्कालीन संसदीय मामलों के मंत्री कमलनाथ पर तत्काल प्रभाव न दिखाने का दोष लगाया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय में एक नागरिक रिट याचिका के जवाब में, सरकार ने भारत के विधि आयोग को मामले को भारत में उच्चतम संवैधानिक निकाय के रूप में संदर्भित किया। 30 अक्टूबर 2017 को, अपनी 273 वीं रिपोर्ट में, यह सिफारिश की थी कि केंद्र इसे अत्याचार निवारण विधेयक अधिनियमित करता है, जो पुलिस को हिरासत में अत्याचार के लिए जिम्मेदार बनाता है। विधि आयोग के न्यायमूर्ति बीएस चौहान ने रिपोर्ट में प्रस्तावित की एक मसौदा प्रति संलग्न की।

दिसंबर 2017 में, उक्त विधेयक को वाईएसआर कांग्रेस से वी विजयसाई रेड्डी द्वारा राज्यसभा में एक निजी सदस्य बिल के रूप में पेश किया गया था। और फिर 2018 में,  पूर्व एम.पी. बिहार के सिवान से बीजेपी विधायक ओम प्रकाश यादव द्वारा लोकसभा में उसी रूप में पेश किया गया। 16 वीं लोकसभा के विघटन के साथ, विधेयक को भी समाप्त कर दिया गया। बीते 12 फरवरी, 2019 को एक हलफनामे में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय में दायर, भारत सरकार ने खुलासा किया कि सभी राज्यों और यूनियन टेरिटोरी ने अपने इनपुट / सुझाव दाखिल किए थे और यह कि अत्याचार निवारण कानून बनाने का प्रश्न विचाराधीन है। फरवरी 2019 से, 17 महीने बीत चुके हैं, और मोदी सरकार द्वारा कोई कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है।


देश की बेटी के साथ आतंकवादियों जैसे बर्ताव क्यों

देश द्रोही और आतंवादियों को भी अपने परिवार से मिलने के लिए आखिरी बार इजाजत दी जाती है। इस लड़की ने ऐसा क्या गुनाह किया था कि उसके शव को ही सही आखिरी बार ही सही उसके परिजनों को देखना नसीब नहीं हुआ। 


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