किसान विधेयकों का लाभ : किसानों को या पूंजीपतियो को

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश में बीते कुछ अरसे से हालात काफी विपरीत दिशा में चल रहे हैं। एक तरफ कोरोना वायरस महामारी तेज गति से फैल रहा है तो दूसरी और देश के अन्न दाता सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पंजाब, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक समेत कई राज्यों में जोर शोर से कृषि विधेयकों को लेकर विरोध किया जा रहा है। एक तरफ जहां किसान खुद इन विधेयकों का विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इस पर राजनीति करने से नहीं चुक रहा। इन सबके बीच केंद्र सरकार इन विधेयकों को किसान के हित वाला बता रही है। ये तीनों विधेयक किसानों के लिए हितकारी है या नहीं इसकी चर्चा हम जरूर करेंगे, लेकिन उससे भी पहले यह समझना जरूरी है कि विपक्ष एक बार फिर से इस पर राजनीति क्यों कर रहा है। तीन महीने पहले की बात करें तो जब इन तीनों विधेयकों को आध्यादेश के रूप में लाया गया था, तब संसद में लगभग सभी विपक्षी दलों ने इनका स्वागत किया था। लेकिन इसके बाद जब इन आध्यादेश को कानून के रूप में लाया गया तो अचानक से इस पर राजनीति शुरू हो गई। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के भीतर ही घमासान मच गया। भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने तीनों विधेयकों को किसान विरोधी बताते हुए केंद्रीय मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया। आधुनिक खेती और अनाज उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में अन्नदाता आंदोलन पर उतारू हो गए। अनुबंध खेती और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आशंकाएं सामने आने लगीं। यहां इन विधेयकों को लेकर सवाल तो कई उठाए जा रहे हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसान विधेयकों का सीधा लाभ किसे मिलेगा। क्योंकि अगर इसका सीधा लाभ देश के किसानों को मिलता तो शायद आज वे सड़कों पर नहीं उतरते। विशेषज्ञ कहते हैं कि देश के लगभग 86 प्रतिशत छोटे किसान एक ज़िले से दूसरे ज़िले में नहीं जाते, किसी दूसरे राज्य में जाने का सवाल ही नहीं उठता। अतः ये बिल पूंजीपतियों और बाजार हितों के लिए बना है, किसान के लिए तो कतई नहीं।

हालांकि इन तीनों विधेयकों को लेकर सरकार द्वारा किए जा रहे दावे बिल्कुल स्पष्ट हैं। उनका कहना है कि इनसे किसान मंडियों, आढ़तियों और बिचैलियों से मुक्त हो जाएंगे और उनको वैकल्पिक बाजार मिलेगा। औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश और तकनीकी समावेश से पूरे देश में कृषि उत्पादकता बढ़ेगी। फिलहाल देश में केवल हरियाणा-पंजाब में गेहूं की उत्पादकता 55-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जो अंतरराष्ट्रीय कृषि उत्पादन दर से भी 13 प्रतिशत ज्यादा है। जबकि अन्य राज्यों में यही उत्पादकता आधी है। गोया, मंडियों का वर्चस्व खत्म कर अनुबंध-खेती लाभदायी होगी। किसानों को पूरे देश में फसल बेचने की छूट रहेगी। इससे किसान वहां अपनी फसल बेचेगा, जहां उसे दाम ज्यादा मिलेंगे। आइए जानते हैं क्या है ये तीनों विधेयक।

क्या हैं इन तीनों विधेयक में - 

कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020

इस बिल में एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने का प्रावधान है, जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फ़सल बेचने की आज़ादी होगी। प्रावधानों में राज्य के अंदर और दो राज्यों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने की बात कही गई है। मार्केटिंग और ट्रांस्पोर्टेशन पर ख़र्च कम करने की बात कही गई हैं।

कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक, 2020

इस विधेयक में कृषि क़रारों पर राष्ट्रीय फ्रेमवर्क का प्रावधान किया गया है। ये बिल कृषि उत्‍पादों की बिक्री, फ़ार्म सेवाओं, कृषि बिज़नेस फ़र्मों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ किसानों को जुड़ने के लिए सशक्‍त करता है। अनुबंधित किसानों को गुणवत्ता वाले बीज की आपूर्ति सुनिश्चित करना, तकनीकी सहायता और फ़सल स्वास्थ्य की निगरानी, ऋण की सुविधा और फ़सल बीमा की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020

इस बिल में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्‍याज़ आलू को आवश्‍यक वस्‍तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान है। माना जा रहा है कि विधेयक के प्रावधानों से किसानों को सही मूल्य मिल सकेगा क्योंकि बाज़ार में स्पर्धा बढ़ेगी।

क्या है एमएसपी ?

किसानों को अपने फसल में नुकसान नहीं हो इसके लिए देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू की गई है। इसमें अगर फसल की कीमत बाजार के मुताबिक कम मिलती है तो सरकार उसे एमएसपी के हिसाब से खरीद लेती है। ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके। एमएसपी पूरे देश के लिए एक होती है।

किसान क्यों है इसके विरोध में

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के लगभग सभी किसान संगठनों का आरोप है कि नए क़ानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूँजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका सीधा नुक़सान किसानों को होगा। कृषि मामलों के जानकार देवेंद्र शर्मा के मुताबिक़ किसानों की चिंता जायज़ है। बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, किसानों को अगर बाज़ार में अच्छा दाम मिल ही रहा होता तो वो बाहर क्यों जाते। उनका कहना है कि जिन उत्पादों पर किसानों को एमएसपी नही मिलती, उन्हें वो कम दाम पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं। पंजाब में होने वाले गेहूँ और चावल का सबसे बड़ा हिस्सा या तो पैदा ही एफ़सीआई द्वारा किया जाता है, या फिर एफ़सीआई उसे ख़रीदता है। साल 2019-2020 के दौरान रबी के मार्केटिंग सीज़न में, केंद्र द्वारा ख़रीदे गए क़रीब 341 लाख मिट्रिक टन गेहूँ में से 130 लाख मिट्रिक टन गेहूँ की आपूर्ति पंजाब ने की थी। 

प्रदर्शनकारियों को यह डर है कि एफ़सीआई अब राज्य की मंडियों से ख़रीद नहीं कर पाएगा, जिससे एजेंटों और आढ़तियों को क़रीब 2.5 प्रतिशत के कमीशन का घाटा होगा। साथ ही राज्य भी अपना छह प्रतिशत कमीशन खो देगा, जो वो एजेंसी की ख़रीद पर लगाता आया है। देवेंद्र कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा नुक़सान आने वाले समय में ये होगा कि धीरे-धीरे मंडियां ख़त्म होने लगेंगी।

प्रदर्शनकारियों मानते हैं कि अध्यादेश जो किसानों को अपनी उपज खुले बाज़ार में बेचने की अनुमति देता है, वो क़रीब 20 लाख किसानों- ख़ासकर जाटों के लिए तो एक झटका है ही। साथ ही मुख्य तौर पर शहरी कमीशन एजेंटों जिनकी संख्या तीस हज़ार बताई जाती है, उनके लिए और क़रीब तीन लाख मंडी मज़दूरों के साथ-साथ क़रीब 30 लाख भूमिहीन खेत मज़दूरों के लिए भी यह बड़ा झटका साबित होगा।

बाज़ार के लिए है विधेयक

दो राज्यों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के प्रावधान पर देवेंद्र कहते हैं, बिल के मुताबिक़ इससे किसानों इससे नई तकनीक से जुड़ पाएंगे, पाँच एकड़ से कम ज़मीन वाले किसानों को कॉन्ट्रैकर्टस से फ़ायदा मिलेगा। हालांकि देवेंद्र कहते हैं कि इस प्रावधान से किसान अपनी ही ज़मीन पर मज़दूर हो जाएगा। आवश्यक वस्तु संशोधन बिल पर देवेंद्र कहते हैं कि इससे कालाबाज़ारी को बढ़ावा मिल सकता है। वो कहते हैं, हमने जमाख़ोरी को वैधता दे दी है, इन चीज़ों पर अब कंट्रोल नहीं रहेगा।

किसानों के मुद्दे और विरोध

हिंद किसान के मुख्य संपादक और कृषि मामलों के जानकार हरवीर सिंह ने बीबीसी को बताया कि कुछ जगहों पर विरोध प्रदर्शन तेज़ होने की वजह का नाता वहां की राजनीति और किसान संगठनों से तो है ही साथ ही अनाज ख़रीद की सरकारी व्यवस्था से भी है। वो बताते हैं, अगर किसान आंदोलन के इतिहास को देखें तो आपका पता चलेगा कि आंदोलन का केंद्र ज़्यादातर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहा है। वो कहते हैं, रही महाराष्ट्र की बात तो वहां आंदोलन अधिकतर पश्चिमी हिस्से में दिखते हैं जहां गन्ने और प्याज़ की खेती होती है। मध्यप्रदेश में आंदोलन नहीं होगा ऐसी बात नहीं है। वहां कभी किसानों के मज़बूत संगठन नहीं रहे हैं। लेकिन वहां भी मंडियों में इसका विरोध हुआ है और मंडी कर्मचारियों ने हड़ताल की है। महाराष्ट्र में किसान बड़ा वोट बैंक है लेकिन यहां गन्ना किसान अधिक हैं और गन्ने की ख़रीद के लिए फेयर एंड रीमुनरेटिव सिस्टम (एफ़आरपी) मौजूद है और उसका मूल्य तय करने के लिए शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर अभी भी है। उत्तर प्रदेश में भी काफी ज़मीन हॉर्टिकल्चर के लिए इस्तेमाल होने लगी है जिसका एमएसपी से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में जहां किसानों पर इन बिल का सीधा असर पड़ रहा है वहां किसान सड़क पर आ गए हैं लेकिन जहां ये सीधे तौर पर किसानों को प्रभावित नहीं कर रहे वहां विरोध उतना अधिक नहीं दिख रहा।

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि अगर ये सवाल है कि किसान इसका विरोध क्यों कर रहे हैं तो ये समझिए कि उन्हें ये लगता है कि ये उनके हित में नहीं है। लेकिन बाज़ार इसका विरोध नहीं कर रहा क्योंकि इससे उन्हें लाभ है। वो समझाते हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों की समस्याएं, मुद्दे और उनकी राजनीति अलग है इसलिए उनके विरोध को देखने का तरीक़ा भी बदलना होगा। वो कहते हैं, सरकार जो अनाज की ख़रीद करती है उसका सबसे अधिक हिस्सा यानी क़रीब 90 फीसदी तक पंजाब और हरियाणा से होता है। जबकि देश के आधे से अधिक किसानों को ये अंदाज़ा ही नहीं है कि एमएसपी क्या है। ऐसे में उन्हें ये समझने में वक़्त लगेगा कि उनकी बात आख़िर क्यों हो रही है।

देविंदर शर्मा कहते हैं, ये समझने की ज़रूरत है कि जिस पर सीधा असर होगा वो सबसे पहले विरोध करेगा। एक अनुमान के अनुसार देश में केवल 6 फीसदी किसानों को एमएसपी मिलता है। लेकिन 94 फीसदी किसानों को तो पहले ही एमएसपी नहीं मिलता और वो बाज़ार पर निर्भर हैं। ऐसे में ये समझा जा सकता है कि पंजाब और हरियाणा के किसान विरोध क्यों कर रहे हैं। वो कहते हैं कि भारतीय कृषि क्षेत्र लगातार संकट से जूझता रहा है लेकिन कुछ ही किसान हैं जो इस संकट से बचे हुए हैं। वो कहते हैं, जिन 6 फीसदी किसानों को एमएसपी मिलता है वो संकट से बचे हुए हैं क्योंकि उनकी आय निश्चित हो जाती है।

वहीं हरवीर सिंह कहते हैं कि पंजाब और हरियाणा में राजनीति किसानों से जुड़ी है और इस कारण वहां पार्टियों के लिए किसानों के पक्ष में आना मजबूरी हो गया है। वो बताते हैं, ये समझने के लिए आपको देखना होगा कि कहां क्या खेती होती है और कहां से सरकार अधिक अनाज ख़रीदती है। ऐसे में अधिकतर राज्यों में किसानों को ये मुद्दा सीधे तरीक़े से प्रभावित नहीं करता। लेकिन इसका बड़ा असर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों पर भी पड़ेगा। मुझे लग रहा है कि कई राज्यों में आने वाले दिनों में आंदोलन तेज़ हो सकता है। 

एसएसपी और किसान

एनएसएसओ की साल 2012-13 की रिपोर्ट के अनुसार देश के 10 फीसदी से भी कम किसान अपने उत्पाद एमएसपी पर बेचते हैं। वहीं भारतीय खाद्य निगम की कार्य कुशलता और वित्तीय प्रबंधन में सुधार के लिए बनाई गई शांता कुमार समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार के अनाज ख़रीदने की व्यवस्था का लाभ न तो अधिक किसानों तक और न ही अधिक राज्यों तक पहुंचा है। किसानों से सरकार जो अनाज सबसे अधिक खरीदती है उनमें गेहूं और चावल शामिल है और अगर अनाज की ख़रीद के आंकड़ों के देखा जाए तो ये स्पष्ट होता है कि राज्य के कुल उत्पादन और ख़रीद के मामले में पंजाब और हरियाणा की स्थिति दूसरों से काफी बेहतर है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग की रिपोर्ट के अनुसार बीते कुछ सालों में पंजाब और हरियाणा में हुए कुल धान उत्पादन का 80 फीसदी सरकार ने खरीदा, जबकि गेंहू के मामले में इन दो राज्यों से कुल उत्पादन का 70 फीसदी से अधिक सरकार ने खरीदा। लेकिन दूसरे राज्यों की स्थिति ऐसी नहीं है। दूसरे राज्यों में कुल उत्पादन का छोटा हिस्सा सरकार ख़रीदती रही है और किसान वहां पहले से ही बाज़ार पर निर्भर करते रहे हैं।

एमएसपीऔर खाद्य सुरक्षा से इसका नाता

भारत में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पैदा हुए खाद्य संकट से जूझने के लिए 1942 में खाद्य विभाग बनाया गया था। आज़ादी के बाद 29 अगस्त 1947 को इसे खाद्य मंत्रालय में तब्दील कर दिया गया। 1960 में इस मंत्रालय के तहत दो विभाग बने खाद्य विभाग और कृषि विभाग। खाद्य विभाग पर सरकार की तरफ से खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अनाज ख़रीदने का काम सौंपा गया। आज़ादी के बाद पहली बार 60 के दशक की शुरुआत में देश को गंभीर अनाज संकट का सामना करना पड़ा। इस दौरान कृषि क्षेत्र के लिए नीतियां बनाई गईं और अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत की गई। इसके बाद अनाज खरीदने के लिए सरकार ने 1964 में खाद्य निगम क़ानून के तहत भारतीय खाद्य निगम बनाया और इसके एक साल बाद एग्रीकल्चर प्राइसेस कमीशन बनाया ताकि उचित क़ीमत पर (न्यूनतम समर्थन मूल्य) किसानों ने अनाज ख़रीदा जा सके। इसी अनाज को बाद में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम, पीडीएस) के तहत सरकार ज़रूरतमंदों को देती है और खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज का भंडारण भी करती है।

जहां तक बात सार्वजनिक वितरण प्रणाली की है भारत में ये व्यवस्था राशन सिस्टम की तरह थी जो आज़ादी से पहले भी कुछ शहरी इलाक़ों तक सीमित थी। लेकिन 1951 में इसे देश की सामाजिक नीति का हिस्सा बनाया गया और पहली पंचवर्षीय योजना में इसका विस्तार गांवों तक किया गया। दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान इसका दायरा और बढ़ा दिया गया। एग्रीकल्चर प्राइसेस कमीशन बनने के बाद पीडीएस की स्थिति और अहम हो गई क्योंकि इससे एक तरफ किसानों को निश्चित आय मिलने का भरोसा मिला, दूसरी तरफ ज़रूरतमंदों को कम क़ीमत में अनाज की सुविधा मिली और तीसरी तरफ़ खाद्य सुरक्षा बेहतर हुई।

क्या इन तीनों बिल का व्यापक असर हो सकता है?

बीबीसी से बातचीत करते हुए मुंबई स्थित इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेवेलपमेन्ट रीसर्च की कृषि अर्थशास्त्रीसुधा नारायणन कहती हैं कि सरकार ने कहा है कि एमएसपी और अनाज ख़रीदने की जो मौजूदा व्यवस्था है उसके साथ छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। वो कहती हैं, मुझे लगता है कि किसान इस बात से चिंतित नहीं है कि सरकार इन बिल में क्या कह रही है, बल्कि वो बिल में जो नहीं कहा गया है उसे लेकर चिंतित हैं। हालांकि वो कहती हैं कि इनमें से किसी बिल में ऐसा कुछ स्पष्ट नहीं लिखा है लेकिन ये बिल कृषि क्षेत्र में किए जाने वाले बड़े सुधारों की दिशा में एक कदम हैं जो सरकार के विज़न का एक हिस्सा है। वो कहती हैं, शांता कुमार की रिपोर्ट के अनुसार सरकार को इन-काइंड यानी अनाज की ख़रीद की व्यवस्था ख़त्म करनी चाहिए और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बजाय कैश ट्रांसफर पर ध्यान देना चाहिए। और इस बिल से जुड़ी व्यापक तस्वीर या कहें लार्जर नैरेटिव यही है। इन बिल को उस प्रक्रिया को शुरू करने की कवायद की तरह देखा जा रहा है और ये चिंता का विषय है।

हालांकि वो कहती हैं, मुझे इसकी चिंता उतनी अधिक नहीं है जितनी इस बात की है कि इसके ज़रिए एपीएमसी को ख़त्म कर दिया जाएगा और अनाज का मूल्य तय करने वाली एक पूरी व्यवस्था के न रहने का बड़ा असर किसानों पर हो सकता है। क्योंकि किसानों के लिए क़ीमतों का कोई बेंचमार्क ही नहीं रहेगा और ऐसे में बाज़ारों पर उनकी निर्भरता कहीं अधिक बढ़ जाएगी। शांता कुमार की रिपोर्ट के अनुसार सरकार निजी क्षेत्र की कंपनियों को सरकार की तरफ से अनाज खरीदने के लिए भी कह सकती है इसलिए ऐसा भी नहीं कहा जा सकता वितरण प्रणाली पर कुछ असर पड़ेगा। जून 2019 में उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने कहा था कि एफ़सीआई को लेकर शांता कुमार के सुझावों को लागू करना सरकार की प्राथमिकताओं में से है।

सरकार इस दिशा में बढ़ सकती है इसका संकेत उस वक्त भी मिला था जब इसी साल जून में मोदी सरकार के प्रमुख आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम ने आर्थिक सर्वेक्षण में कहा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कवरेज को 70 फीसदी से घटा कर 20 फीसदी तक लाया जाना चाहिए, और अनाज की ख़रीद कम कर डायरेक्ट कैश ट्रांसफर की तरफ बढ़ना चाहिए। कुछ यही शांता कुमार कमिटी की रिपोर्ट में भी कहा गया है।



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