चुनावी दंगल का हुआ आगाज़

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

कोरोना वायरस महामारी के बीच आशंकाएं जताई जा रही थी कि बिहार चुनाव हो टाला जा सकता है, लेकिन आख़िरकार बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। चुनाव आयोग द्वारा बिहार में विधानसभा चुनावों को लेकर तिथि की घोषणा कर दी गई है। बिहार में चुनाव तीन चरणों (28 अक्तूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर) में होंगे और इसका परिणाम 10 नवंबर को आएगा।

हालांकि चुनाव आयोग की घोषणा के कहीं पहले बिहार चुनाव का दंगल शुरू हो चुका है। एक ओर बिहार की नीतीश सरकार अपने किए गए वादों के पूरा होने का दावा कर रही है वहीं विपक्षी आरजेडी का कहना है कि ज़मीन पर कुछ हुआ ही नहीं है। इसी बीच 21 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में डिजिटली 9 हाइवे प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी और बिहार के 45,945 गांवों को ऑप्टिकल फ़ाइबर के ज़रिए इंटरनेट से जोड़ने की योजना की भी शुरुआत की। इन योजनाओं का प्रलोभर जनता को दिया जा रहा है, ताकि इसका सीधा लाभ चुनाव में मिल सके। एक ओऱ भाजपा तो दूसरी ओर नीतिश सरकार योजना को ख़ासा भुनाने में लगी हुई है और बार-बार हर चुनावी रैलियों और बैठकों में राजनेता इसका ज़िक्र कर रहे हैं। केवल इतना ही नहीं बल्कि बिहार में चुनाव के मद्देनजर कृषि विधेयक को लेकर भी राजनीति शुरू हो गई है। इस बार विपक्ष एक साथ नहीं बल्कि अलग अलग तरीकों से पार्टी पॉलिटिक्स में जुट गए हैं। एक ओर, भारतीय जनता पार्टी, दूसरी ओर तेजस्वी यादव, तीसरी और नीतिश सरकार और अंतिम में कांग्रेस पार्टी। कोई किसी से पीछे नहीं, कोई किसी से कम नहीं। सब अपने स्तर पर राजनीति करने में व्यस्त हैं। जनता की चिंता और किसानों के हित की चिंता शायद ही किसी को हो। अब देखना यह है कि कोरोना वायरस महामारी के बीच बिहार चुनाव के लिए पार्टियां और क्या क्या कर सकती है। ऐसे कौन से हथकंडे होंगे जिन्हें पार्टियां बिहार चुनाव में भुनाना चाहेंगी। 

हालांकि पिछले कई राज्यों, जिनमें मुक्य रूप से मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि में विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा और पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। जबकि कुछ राज्यों में राजनीतिक तोड़जोड़ के बाद पार्टी ने सत्ता हासिल कर ली है। अब बिहार चुनाव भाजपा के लिए काफी मुश्किलों भरा हो सकता है। 


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