कहां जाएगा देश के अन्नदाताओं का हक !

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश में कई सरकारें आई और गई लेकिन देश के अन्नदाताओं के हित की चिंता को लेकर अब भी प्रश्न चिह्न बना हुआ है। कृषि एवं किसान की हालत सुधारने वाले विधेयक जबरदस्त हंगामें के बाद राज्यसभा से भी पारित हो गए। दरअसल तीन माह पहले जब इन तीन विधेयकों को अध्यादेश के रूप में लाया गया था, तब संसद में लगभग सभी दलों ने इनका स्वागत किया था। लेकिन अब, जब इन्हें कानूनी रूप देने के लिए लोकसभा में पारित कराने के बाद राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया तो एकाएक राजनीतिक मतभेद दिखने शुरू हो गए। सत्तारूढ़ राजग के भीतर ही घमासान मच गया। भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने तीनों विधेयकों को किसान विरोधी बताते हुए केंद्रीय मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया। आधुनिक खेती और अनाज उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में अन्नदाता आंदोलन पर उतारू हो गए। अनुबंध खेती और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आशंकाएं सामने आने लगीं।

दरअसल इन विधेयकों के माध्यम से सरकार दावा कर रही है कि किसान मंडियों, आढ़तियों और बिचैलियों से मुक्त हो जाएगा और किसान को वैकल्पिक बाजार मिलेगा। औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश और तकनीकी समावेश से पूरे देश में कृषि उत्पादकता बढ़ेगी। फिलहाल देश में केवल हरियाणा-पंजाब में गेहूं की उत्पादकता 55-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जो अंतरराष्ट्रीय कृषि उत्पादन दर से भी 13 प्रतिशत ज्यादा है। जबकि अन्य राज्यों में यही उत्पादकता आधी है। गोया, मंडियों का वर्चस्व खत्म कर अनुबंध-खेती लाभदायी होगी। किसानों को पूरे देश में फसल बेचने की छूट रहेगी। इससे किसान वहां अपनी फसल बेचेगा, जहां उसे दाम ज्यादा मिलेंगे।

लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि इन बिलों के माध्यम से क्या किसानों का हक बड़े उद्योगपतियों के हाथ सौंपा जा रहा है। वो ऐसे-पहला बिल कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 है जो एक ऐसा क़ानून होगा जिसके तहत किसानों और व्यापारियों को एपीएमसी की मंडी से बाहर फ़सल बेचने की आज़ादी होगी। इसमें यह बात याद रखने वाली है कि सरकार का कहना है कि वह एपीएमसी मंडियां बंद नहीं कर रही है बल्कि किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था कर रही है जिसमें वह निजी ख़रीदार को अच्छे दामों में अपनी फ़सल बेच सके। दूसरा बिल कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक, 2020 है। यह क़ानून कृषि करारों पर राष्ट्रीय फ़्रेमवर्क के लिए है। ये कृषि उत्‍पादों की बिक्री, फ़ार्म सेवाओं, कृषि बिज़नेस फ़र्मों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ किसानों को जुड़ने के लिए सशक्‍त करता है। आसान शब्दों में कहें तो कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग में किसानों के आने के लिए यह एक ढांचा मुहैया कराएगा।

सरकार ने जो भी क़ानून में कहा है वैसा तो पहले भी होता रहा है, कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग और अपनी फ़सलों को बाहर बेचने जैसी चीज़ें पहले भी होती रही हैं। लेकिन अब यह बिल क्या सिर्फ़ अंबानी-अडानी जैसे व्यापारियों को लाभ देने के लिए लाया गया है। किसान अब कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग करता है तो कोई विवाद होने पर वह सिर्फ़ एसडीएम के पास जा सकता है जबकि पहले वह कोर्ट जा सकता था। इस तरह की पाबंदी क्यों लगाई गई। इससे तो लगता है कि सरकार किसानों को बांध रही है और कॉर्पोरेट कंपनियों को खुला छोड़ रही है। उन्हें अब किसी फ़सल की ख़रीद के लिए कोई लाइसेंस की ज़रूरत नहीं है।

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