क्या भाजपा के शासन काल में हुए संदिग्ध समझोतों की जांच करेगी मोदी सरकार ?

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)

जोधपुर के एक ट्रायल कोर्ट ने उदयपुर में लक्ष्मी विलास होटल के निजीकरण के करीब 18 वर्षों के बाद, वाजपेयी मंत्रिमंडल-अनुमोदित विनिवेश में पूर्व मंत्री अरुण शौरी पर जांच का आदेश दिया है। बीते 17 सितंबर, 2020 को न्यायाधीश ने सीबीआई द्वारा मामले को बंद करने का आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि होटल लक्ष्मी विलास पैलेस, जिसकी बहुमूल्यता करीब 252 करोड़ रुपये से अधिक थी, उस समय अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विनिवेश मंत्री अरुण शौरी की देखरेख में उसे करीब 7.5 करोड़ रुपये की सामान्य रकम में बेच दिया गया। मालूम हो कि यह होटल तत्कालीन भाजपा सांसद स्वर्गीय ललित सूरी को बेचा गया था। शौरी के खिलाफ पहली सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) 13 अगस्त 2014 को पीएम मोदी के शासन में दर्ज की गई थी। 2014 में इसकी प्रतिक्रिया देते हुए शौरी ने पूर्व कानून मंत्री और उनके कट्टर विरोधी अरुण जेटली का नाम इस मामले से जोड़ा था। उन्होंने कहा था कि, होटल को भारत होटल समूह द्वारा मंत्रिमंडल की स्वीकृति के साथ बोली के माध्यम से अधिग्रहित किया गया था। शौरी ने एक मीडिया लेख में कहा कि, उस समय कानून मंत्री अरुण जेटली थे, जिनके विभाग ने तीन बार फाइलों को मंजूरी दी थी। भारत होटल के प्रवर्तक, स्वर्गीय ललित सूरी उस समय भाजपा के सांसद और जेटली के करीबी मित्र थे। शौरी के अनुसार उनकी पत्नी ज्योत्सना सूरी, जो अब होटल का कामकाज चला रही हैं, भी जेटली की करीबी दोस्त थीं।

मुंबई में दो होटल, जुहू सेंटूर और एयरपोर्ट सेंटूर को सस्ते दामों में बेचा

पूर्व विनिवेश मंत्री अरुण शौरी, पीएम वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में मुंबई में दो पांच सितारा होटलों के निजीकरण में उनकी भूमिका के लिए सुर्खियों में रहे थे। बीते 6 मई 2005 को संसद में पेश नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में गंभीर सख्ती पारित की गई।

सीएजी ने इस तथ्य पर अपना ध्यान केंद्रित किया कि दोनों होटलों के लिए वित्तीय बोली एकल बोलीदाता लेनदेन प्रक्रिया के माध्यम से की गई थी। यह बताया कि यद्यपि जुहू सेंटूर के लिए 20 दलों ने और एयरपोर्ट सेंटूर के लिए 21 अलग अलग बोलियां लगाई गई थी, लेकिन प्रत्येक होटल के लिए केवल एक वित्तीय बोली को स्वीकृत किया गया था। मालूम हो कि इन पांच सितारा होटलों के बोली में प्रतिस्पर्धा की अनुपस्थिति के कारण ने सरकार ने बिक्री से बेहतर प्राप्ति का अवसर खो दिया।

वर्ष 2005 में सीएजी ने देखा कि उसे यह दिखाने के लिए रिकॉर्ड नहीं मिले कि क्या सरकार ने पर्याप्त प्रतिस्पर्धा पैदा करने के लिए कदम उठाए थे। विशेष रूप से, यह देखा गया कि संपर्क सूची, बोलीकर्ताओं के साथ संचार और पार्टियों की वापसी के कारण, और दस्तावेज की पूरी जानकारी नहीं मिली। बताया गया कि इससे संबंधित जानकारी और विवरणों की अनुपलब्धता के कारण, सरकार द्वारा बोलीदाताओं से बेहतर प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए गए थे या नहीं की जाँच नहीं की जा सकी। 

कैग ने यह भी नोट किया कि विनिवेश मंत्रालय के सवालों के जवाब में एनडीए सरकार ने पूरे बिक्री प्रक्रिया में सीमित प्रतिस्पर्धा से निपटने के लिए क्या कदम उठाए, इस बारे में उसके सवालों के जवाब से संतुष्टी नहीं मिली।

कैग द्वारा बनाया गया एक अन्य बिंदु यह था कि इसके ऑडिट में विनिवेश के लिए वैश्विक सलाहकार जेपी मॉर्गन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा संपत्तियों के मूल्यांकन में विसंगतियां पाई गईं। कैग ने देखा कि इसके ऑडिट मूल्यांकन प्रक्रिया में अंतर्निहित विसंगतियों के कारण संपत्ति का मूल्य कम हो गया। 

यह बताया कि जब विनिवेश मंत्रालय द्वारा निजीकृत किए गए अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से संबंधित मामलों की तुलना की गई तो सेंटूर के होटलों के मामले में विनिवेश मंत्रालय द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण में मतभेद मिले। एयरपोर्ट सेंटूर की बिक्री में, संपत्तियों के मूल्यांकन और आरक्षित मूल्य के निर्धारण के लिए बनाई गई धारणाएं अन्य मामलों में मंत्रालय द्वारा किए गए कार्यों के अनुरूप नहीं थीं। निष्कर्ष में, सीएजी ने टिप्पणी की कि यह दिखाने के लिए कोई सबूत नहीं था कि सर्वोत्तम संभव मूल्य प्राप्त करने के प्रयासों से सरकार की संपत्तियों को जल्दी से बेचने की इच्छा संतुलित थी।

सीएजी ने यह भी देखा कि जुहू सेंटूर के लिए बोली लगाने वाले विजेता को ही बिक्री की तमाम सुविधाएं देते हुए उन्हें बार-बार एक्सटेंशन दिया गया था और रिलैक्सेशन की भी अनुमति दी गई थी। बीते 4 मई 2005 को, चिदंबरम ने लोकसभा को बताया कि शौरी को लगता है कि उन्होंने इस मामले में सक्रिय रुचि ले ली है।

मुनाफा कमाने वाले होटल शौरी के हाथों घाटे में चले गए

विनिवेश मंत्रालय के इस कथन के बारे में भी सीएजी का रवैय्या आलोचनात्मक था कि जुहू सेंटूर, मुम्बई घाटे में चल रही थी। यह देखा गया कि होटल को बेचने का निर्णय 1998 में लिया गया था, तब तक होटल को काफी मुनाफा हो रहा था। सीएजी ने बताया कि विनिवेश प्रक्रिया शुरू होने के बाद जुहू सेंटौर की वित्तीय स्थिति खराब हो गई और (बाद में) इसकी भविष्य की स्थिति अनिश्चित हो गई। यह उल्लेख किया गया कि होटल के विनिवेश के निर्णय के बाद भी, होटल का एक बड़ा हिस्सा नवीकरण के अधीन था और एचसीआई की यह इकाई संभावित मूर्त संपत्ति के कब्जे में थी। 

ऐसा कहा गया कि जुहू सेंटूर, मुंबई का समायोजित परिसंपत्ति मूल्य 134 करोड़ रुपए होगा, जो होटल के लिए निर्धारित आरक्षित मूल्य से 32 करोड़ रूपए अधिक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बोली लगाने वाले की वित्तीय शक्तियों की प्रारंभिक जांच अपर्याप्त होने के कारण, मंत्रालय को बिक्री की समाप्ति सुनिश्चित करने के लिए कई शर्तों को शिथिल करना पड़ा और बाद के चरण में हस्तक्षेप करना पड़ा।  इसे एक अच्छे अभ्यास के रूप में नहीं देखा जा सकता है।

मोदी और कांग्रेस सरकार ने अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की?

शौरी ने कहा है कि कोई भी निर्णय उनके द्वारा या यहां तक ​​कि किसी भी अधिकारी द्वारा यहां नहीं लिया गया था। इसके बजाय इनमें से प्रत्येक के पास विनिवेश पर कैबिनेट समिति के अनुमोदन की मुहर लगाई गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में और तत्कालीन वित्त मंत्री की देखरेख में शामिल था। यहां गौर करने वाली बात यह है कि कांग्रेस सरकार ने अपने दस साल के शासन काल में यानि 2004 से लेकर 2014 तक, शौरी के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई क्यों नहीं की, क्या उन्हें भी इससे कोई फायदा हुआ?

क्या होता है निजीकरण और विनिवेश

किसी कंपनी के निजीकरण और विनिवेश में बहुत अंतर होता है। निजीकरण में सरकार अपनी बहुल यानि 51 फीसदी हिस्सेदारी निजी क्षेत्र को बेच देती है और उस पर उसका प्रभुत्व खत्म हो जाता है। लेकिन विनिवेश में सरकार अपनी कुछ ही हिस्सेदारी बेचती है और कंपनी पर उसका प्रभुत्व बना रहता है।

विनिवेश को वाजपेयी सरकार ने दी रफ्तार 

सार्वजनिक कंपनियों के विनिवेश की प्रक्रिया तो मनमोहन सिंह के नब्बे के दशक में वित्त मंत्री रहने के दौरान ही शुरू हो गई थी, लेकिन बाद में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा इसे जबरदस्त रफ्तार दी गई। वाजपेयी ने 1999 में अपनी सरकार में विनिवेश मंत्रालय के तौर पर एक नया मंत्रालय ही बना दिया जिसके मंत्री अरुण शौरी बनाए गए थे। इसका मंत्रालय का काम निजीकरण के प्रस्तावों को फटाफट मंजूरी देना था। इसलिए इसके साथ ही विनिवेश के लिए एक कैबिनेट कमिटी का भी गठन किया गया ताकि इन प्रस्तावों को जल्द मंजूरी दी जा सके। शौरी के मंत्रालय ने वाजपेयी के नेतृत्व में भारत एल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को), हिंदुस्तान जिंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की थी। अटल सरकार ने मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज को हिंदुस्तान यूनिलीवर को बेचने का फैसला लिया। आईटी फर्म सीएमसी लिमिटेड को बेच दिया गया। कई सरकारी होटल बेच दिए गए।

भारत में विनिवेश प्रक्रिया शुरू से ही विवादों में रही है। असल में इसमें घोटालों की काफी गुंजाइश रहती है। वाजपेयी सरकार के दौरान किए गए कई विनिवेश में भी घोटालों के जबरदस्त आरोप लगे। कई मामलों की जांच अभी तक चल रही है। अक्सर वाजपेयी सरकार को इसके लिए तीखे विरोध का भी सामना करना पड़ा। बाल्को के निजीकरण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वाजपेयी जी के फैसले को बरकरार रखा।

वाजपेयी सरकार में होटलों की बिक्री पर सबसे ज्यादा विवाद क्यों

विनिवेश मंत्रालय शुरुआती दिनों से ही विवादों में घिरा रहा। सबसे ज्यादा विवाद रहा कई फाइव स्टार होटल कौड़ियों के भाव बेचने को लेकर। वाजपेयी सरकार ने घाटे में चल रहे कई सरकारी होटल को निजी क्षेत्र को दे दिया। इनमें नई दिल्ली में स्थित रंजीत होटल, कुतब होटल और होटल कनिष्क, कोवलम अशोक बीच रिजॉर्ट, कोलकाता का होटल एयरपोर्ट अशोक तथा उदयपुर का लक्ष्मी विलास होटल शामिल था। नई दिल्ली का रंजीत होटल बहुत कम दाम में अनिल अंबानी समूह को बेच दिया गया। 

देश के कुछ अन्य चर्चित घोटाले

कोलगेट स्कैम : यूपीए टू के समय सामने आया कोलगेट घोटाला 1993 से 2008 के बीच सार्वजनिक और निजी कंपनियों को कम दामों में कोयले की खदानों के आवंटन का था। कैग (सीएजी) की ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा गया था कि गलत आवंटन कर इन कंपनियों को 10,673 अरब का फायदा पहुंचाया गया था। इस घोटाले ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि पर नकारात्मक असर डाला। हालांकि अदालत में यह घोटाला साबित नहीं हुआ।

टूजी स्कैम : कंपनियों को गलत तरह से टूजी स्पैक्ट्रम आवंटित करने का यह महाघोटाला भी यूपीए सरकार के समय का है। कैग के एक अनुमान के ​मुताबिक जिस कीमत में इन स्पैक्ट्रमों को बेचा गया और जिसमें इसे बेचा जा सकता था उसमें 17.6 खरब रूपये का अंतर था। यानि देश को लगा कई खरब का चूना लगा। लेकिन अदालत में सीबीआई इसको साबित नहीं कर सकी। अदालत ने कहा कि कोई घोटाला ही नहीं हुआ।

व्यापमं घोटाला : भाजपा शासित मध्यप्रदेश में व्यावसायिक परीक्षा मंडल की ओर से मेडिकल समेत अन्य सरकारी क्षेत्रों की भर्ती प​रीक्षा में धांधली से जुड़ा व्यापमं घोटाला अब तक का सबसे जानलेवा घोटाला है। अब तक इससे जुड़े, इसकी जांच कर रहे या इस की खबर लिख रहे पत्रकारों समेत दर्जनों लोगों की रहस्यमयी तरीके से मौत हो चुकी है।

बोफोर्स घोटाला : स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी बोफोर्स के साथ राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के तोपों की खरीद के सौदे में घूसखोरी का ये घोटाला भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित घोटाला है। 410 तोपों के लिए कंपनी के साथ 1.4 अरब डॉलर का सौदा किया गया जो कि इसकी असल कीमतों का दोगुना था. अदालत ने राजीव गांधी को इस मामले से बरी कर दिया था।

कफन घोटाला : 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौर में सामने आया यह घोटाला का​रगिल युद्ध के शहीदों के ताबूतों से जुड़ा था। शहीदों के लिए अमेरीकी कंपनी ब्यूट्रॉन और बैजा से तकरीबन 13 गुना अधिक दामों में ताबूत खरीदे गए थे। हर एक ताबूत के लिए 2,500 डॉलर दिए गए।

हवाला कांड : एलके आडवानी, शरद यादव, मदन लाल खुराना, बलराम जाखड़ और वीसी शुक्ला समेत भारत के अधिकतर राजनीतिक दलों के नेताओं का नाम इस घोटाले में सामने आया। इस घोटाले में हवाला दलाल जैन बंधुओं के जरिए इन राजनेताओं को घूस दिए जाने का मामला था। इसकी जांच में सीबीआई पर कोताही बरतने के आरोप लगे और धीरे-धीरे तकरीबन सभी आरोपी बरी होते गए।

शारदा चिट फंड : 200 निजी कंपनियों की ओर से साझे तौर पर निवेश करने के लिए बनाए गए शारदा ग्रुप में हुआ वित्तीय घोटाला भी महाघोटालों में शामिल है। चिट फंड के बतौर जमा राशि को लौटाने के समय में कंपनी को बंद कर दिया गया। इस घोटाले में त्रिणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद कुणाल घोष जेल भजे गए। साथ ही बीजू जनता दल, बीजेपी और त्रिणमूल कांग्रेस के कई अन्य नेताओं की भी गिरफ्तारियां हुई हैं।

ऑगस्टा वेस्टलैंड डील : इटली की हेलीकॉप्टर निर्माता फर्म ऑगस्टा वेस्टलैंड से 12, एडब्लू101 हेलीकॉप्टर्स की खरीददारी के इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कुछ भारतीय राजनीतिज्ञों और सेना के अधिकारियों पर घूस लेने के आरोप हैं। ऑगस्टा वेस्टलैंड के साथ इन 12 हेलीकॉप्टर्स के लिए ये सौदा 36 अरब रूपये में हुआ था।

चारा घोटाला : करीब 9.4 अरब के गबन का चारा घोटाला भारत के मशहूर घोटालों में से एक है। यह घोटाला राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक अवसान की वजह बना। वहीं इस घोटाले से पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और शिवानंद तिवारी का भी नाम जुड़ा था।

कॉमनवेल्थ : 2010 में आयोजित हुए कॉमनवेल्थ खेल, भारत में खेल जगत का सबसे बड़ा घोटाला साबित हुए। इस खेल में अनुमानित तौर पर 70 हजार करोड़ रूपये खर्च किए गए। ​गलत तरीके से ठेके देकर, जानबूझ कर निर्माण में देरी, गैर वाजिब कीमतों में चीजें खरीद कर इस पैसे का दुरूपयोग किया गया था। इन अनियमितताओं के केंद्र में मुख्य आयोजनकर्ता सुरेश कल्माड़ी का नाम था।


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