हिंदी भाषा को लेकर इतनी घृणा भावना क्यों !

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

पिछले 70 वर्षों से देश में हिंदी दिवस मनाया जा रहा है, लेकिन क्या सरकारी कामकाज और देश के विभिन्न राज्यों में हिंदी की मांग आगे बढ़ी। जवाब है नहीं। क्योंकि आज भी कई राज्यों में हिंदी को लेकर विरोध की भावना लोगों के मन में है। इसके कई कारण हैं, जिनमें सबसे मुख्य है देश में फैलती राजनीतिक मनोभावना। हालांकि हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया जा चुका है लेकिन गौर करें तो देश में कानून अंग्रेजी में बने है। अदालतों में फैसले अंग्रेजी में सुनाए जाते हैं। उच्च स्तरीय शिक्षा के लिए अंग्रेजी भाषा का ही इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में हिंदी को अपनाए जाने को लेकर पैरवी कैसे की जा सकती है।

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे कद्दावर नेता भी हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे। तब भी दक्षिण भारतीय हिंदी विरोधी गुट इसके विरोध में था। हालांकि देशभर में अंग्रेजी के प्रयोग को लेकर यह दक्षिण भारतीय गुट सहमत था। 1949 में संवैधानिक समिति ने एक समझौता किया। इसे मुंशी-आयंगर समझौता कहा जाता है। इसके बाद देवनागरी लिपि वाली हिंदी को राष्ट्रभाषा के बजाए राजभाषा बना दिया गया था। फिलहाल संविधान में देश की केवल दो ऑफिशियल भाषाएं हैं लेकिन इनमें से कोई 'राष्ट्रीय भाषा' नहीं है। संविधान समिति ने मात्र 15 साल के लिए अंग्रेजी के ऑफिशियल भाषा के बतौर प्रयोग का लक्ष्य रखा था। यह 15 साल का समय 26 जनवरी, 1965 को खत्म हो गया था।

हिंदी समर्थक नेता बालकृष्ण शर्मा और पुरुषोत्तम दास टंडन थे। ये अंग्रेजी के कट्टर विरोधी थे। इसे वे साम्राज्यवाद का अवशेष कहते थे। उन्होंने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाए जाने की मांग करते हुए कई प्रदर्शन किए लेकिन दक्षिण और पूर्वी भारत की भाषाई स्थिति का हवाला देते हुए उनकी मांग खारिज होती रही। बाद में मुंशी-आयंगर समझौता हुआ। 

इसके बाद 1965 में अंग्रेजी की ऑफिशियल भाषा की समयसीमा खत्म होने पर जब हिंदी को ऑफिशियल भाषा बना दिया गया तो फिर से तमिलनाडु में हिंसक आंदोलन होने लगे। फिर तय किया गया कि हिंदी एकमात्र ऑफिशियल भाषा नहीं हो सकती। इससे कुछ दिन पहले ही राजभाषा अधिनियम, 1963 बना था। इसे 1967 में संशोधित किया गया। इसके जरिए द्विभाषीय पद्धति अपना ली गई। ये दो ऑफिशियल भाषाएं थीं, अंग्रेजी और हिंदी।

दक्षिणी राज्यों में हमेशा से हिंदी भाषा को लेकर विरोध के स्वर सुनाई देते रहे हैं। इन विरोधों में कहीं न कहीं राजनीतिक छाप दिखाई देता है। आप अक्सर देखेंगे जिन राज्यों में हिंदी का पुरजोर विरोध किया जा रहा है, उन राज्यों में जनता नहीं बल्कि इसका विरोध केवल राजनीतिक पार्टियां और उनके कार्यकर्ता कर रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि राजनीतिक दाव पैंच के बीच एक मुद्दा हिंदी भाषा भी है जिसे लेकर नेता राजनीति कर सकते हैं और कर भी रहे हैं। हिन्दी के विरोध से दक्षिण भारत के नेताओं के सियासी लाभ की बात तो समझ में आती है। लेकिन इससे वहां के आम लोगों का बड़ा नुकसान होता है। हिन्दी नहीं आने के कारण वहां के अधिकांश युवा रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई, दिल्ली, कोलकाता या अन्य हिंदी भाषी राज्यों में नहीं जा पाते हैं। सवाल यह है कि हिन्दी राष्ट्रीयता की पहचान होने के बाद भी दक्षिण के राज्य हिन्दी से घृणा क्यों करते हैं।

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