वित्त मंत्री जी, अर्थव्यवस्था संभालें

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

 केंद्र सरकार के राज्यों को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था के तहत क्षतिपूर्ति घाटे को पूरा करने के लिए उधार लेने के प्रस्ताव को ठुकराते हुए गैर भाजपा शासित राज्यों के चार मुख्यमंत्रियों का कहना है कि इसके बजाय केंद्र सरकार को उधार लेना चाहिए। यह सारा मामला शुरू हुआ जीएसटी के कलेक्शन से। कोरोना महामारी की वजह से लॉकडाऊन की घोषणा की गई थी। करीब 60 दिनों तक लॉकडाऊन के बाद छोटे - बड़े सभी उद्योगों और व्यवसायिय संगठनों को काफी नुकसान का सामना करना पड़ा, जिसकी वजह से जीएसटी कलेक्शन काफी न्यूनतम रहा। वित्त मंत्रालय ने कोरोना महामारी से उत्पन्न इस संकट को एक्ट ऑफ गॉड कह कर किनारा कर लिया और राज्यों को जीएसटी प्रतिशत के भुगतान पर अपने हाथ खड़े कर दिए। अब भला ऐसे में कोई क्या कहे। देश की इकोनॉमी की चिंता अगर वित्त मंत्री को स्वयं नहीं है तो कोई विशेषज्ञ भी क्या करे। हालांकि अर्थशास्त्र के जानकारों का कहना है कि अब समय आ गया है कि वित्त मंत्री जी को उल-झूलूल बातों से और भाजपा नेताओं को जुमलेबाजी से किनारा करते हुए अर्थव्यवस्था के सुधारों की दिशा में ध्यान देना चाहिए। विश्व के अन्य कई देशों में कोरोना महामारी ने कहर बरपाया है, लेकिन अर्थव्यवस्था की इतनी खास्ता हालत किसी अन्य देश की तो नहीं हुई। तो इसके लिए अगर केंद्र सरकार को जिम्मेदार न ठहराया जाए तो किसे ठहराया जाए। 

सुझाव के विरोध में लिखे जा रहे पत्र

एक अंग्रेजी अखबार के रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा, जबकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखा है। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस संबंध में प्रधानमंत्री को पत्र लिखा। मालूम हो कि पिछले हफ्ते जीएसटी परिषद की बैठक के दो दिन बाद केंद्र सरकार ने 2.3 लाख करोड़ रुपये के मुआवज़े की कमी उधार लेकर पूरा करने के लिए राज्यों को दो विकल्प दिए थे।

केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने कहा कि राज्य न सिर्फ केंद्र सरकार का प्रस्ताव ठुकरा रहे हैं, बल्कि तीसरा विकल्प भी दे रहे हैं और यह तीसरा विकल्प यह है कि केंद्र सरकार पूरा मुआवजा खुद उधार ले और राज्यों को यह राशि उपलब्ध कराएं। उन्होंने कहा, केंद्र सरकार का उधार लेना आसान है। वह सीधे बाजार से उधार ले सकती है लेकिन अगर उसे डर है कि ब्याज दरें बढ़ेंगी तो कर्ज का मुद्रीकरण कर दें। सभी देश ऐसा ही कर रहे हैं। इन दोनों विकल्पों को चुनौती देने को लेकर कानूनी प्रक्रिया पर विचार-विमर्श पर हो रहा है. हालांकि कई राज्यों के वित्त मंत्रियों का कहना है कि यह आखिरी उपाय होगा। इस मामले पर जीएसटी परिषद की अगली बैठक में वोटिंग होगी. यह बैठक 19 सितंबर को होने जा रही है। आठ गैर भाजपा शासित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों- पंजाब, पश्चिम बंगाल, केरल, दिल्ली, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, राजस्थान और पुदुचेरी ने 31 अगस्त को बैठक में केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

आर्थिक तंगी से जूझते राज्य

इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में केंद्र सरकार सिर्फ़ 1.85 लाख करोड़ रुपये जीएसटी ही वसूल कर पाई थी जबकि पिछले वित्तीय वर्ष की इसी अवधि में उसने 3.14 लाख करोड़ रुपये वसूले थे। अर्थशास्त्री मानते हैं कि जीएसटी की वसूली में और भी ज़्यादा गिरावट के आसार हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में काफ़ी समय लग जाएगा। इस मामले पर कांग्रेस की तरफ़ से बोलते हुए पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल का कहना था कि अगर राज्यों को उनका जीएसटी का मुआवज़ा नहीं मिलता है तो इसे राज्यों के साथ छल के रूप में देखा जाएगा। कर्नाटक के कांग्रेस नेता राजीव गौड़ा कहते हैं कि महामारी के इस संकट काल में राज्यों को इस पैसे की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है।

उधर सोनिया ने कहा कि वह चाहती थीं कि सभी राज्यों बात की जाए ताकि राज्य जीएसटी जैसे ज्वलंत और महत्वपूर्ण मुद्दों पर साझा तरीके से अपनी बात केंद्र सरकार तक पहुंचा पाएं। सोनिया गाँधी का कहना था कि 11 अगस्त को वित्त मामलों पर संसद की स्टैंडिंग कमिटी के सामने भारत के वित्त सचिव का यह बयान दुर्भाग्यपूर्ण था कि केंद्र इस स्थिति में नहीं है कि राज्यों को जीएसटी का मुआवज़ा दे सके। उनका कहना था कि चालू वित्त वर्ष में केंद्र सरकार को जीएसटी का 14 प्रतिशत राज्यों को बतौर मुआवज़ा देना था।

भाजपा शासित राज्य भी कर रहे मांग

जीएसटी काउंसिल की 41वीं बैठक से पहले हुई ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों के नेताओं की इस बातचीत को अहम माना जा रहा है क्योंकि सभी मिलकर केंद्र सरकार पर मुआवज़े के लिए दबाव बनाना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि बीजेपी शासित राज्य जीएसटी मुआवज़ा नहीं मांग रहे। बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने भी स्पष्ट कर दिया कि सरकार को जीएसटी का मुआवज़ा राज्यों को देना ही चाहिए, चाहे इसके लिए उसे क़र्ज़ क्यों न लेना पड़े। मोदी का कहना था कि बिहार के राजस्व का 76 प्रतिशत केंद्र से ही आता है। ऊपर से कोरोना वायरस और बाढ़ ने राज्य की आर्थिकी को चोट पहुंचाई है। इसी तरह की मांग गुजरात ने भी की है।

क्या है रास्ता?

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार इंस्टिट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इंडिया के चांद वाधवा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि ये सही है कि अर्थव्यवस्था संकट में है और केंद्र सरकार राज्यों को मुआवज़ा नहीं दे पा रही है। वो कहते हैं कि इसका एक हल यह हो सकता है कि सरकार क़र्ज़ लेकर राज्यों का भुगतान करे क्योंकि सारे राज्य आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रहे हैं। वाधवा का कहना था कि न सिर्फ़ राज्य, बल्कि आम व्यवसायी भी परेशान हैं। जिन व्यवसायों ने जीएसटी रिटर्न भरे थे, उनको भी भुगतान नहीं हो पाया है। वहीं केंद्र सरकार ने जीएसटी काउंसिल की बैठक से पहले कानूनी राय भी मांगी है कि किस तरह मुआवज़े के भुगतान की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाए।

ज़ाहिर सी बात है कि बैठक के हंगामेदार होने के आसार हैं क्योंकि सभी राज्यों की वित्तीय हालत ख़राब है। ऐसे में वे केंद्र पर ज़्यादा से ज़्यादा बक़ाये के भुगतान के लिए दबाव बनाएंगे। जीएसटी काउंसिल का कहना है कि उसने राज्यों को मई महीने में 8920.41 करोड़ रुपये और जून में 11116.8 करोड़ रुपये का जीएसटी का भुगतान किया है। अप्रैल में भुगताम की रक़म 1833.08 करोड़ रुपये थी। कांग्रेस का कहना है कि कोरोना महामारी के कारण राज्यों को लगभग 6 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुक़सान हुआ है और केंद्र सरकार को इसका मुआवज़ा देना चाहिए।



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