कब होगी शिक्षा प्रणाली में सुधार

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के लागू होने से देश भर में लोगों की उम्मीदें बढ़ गई है। लगभग तीन दशक के बाद देश की शिक्षा प्रणाली में इतने व्यापक स्तर पर बदलाव किया गया है। इस नई शिक्षा नीति के अंतर्गत शिक्षा के नए आयामों को सेट करने की तैयारियां की जा रही है। लेकिन क्या इसका लाभ गांव में रहने वाले ग़रीब परिवार के बच्चे उठा सकेंगे। भारत में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का वादा देश के संविधान में किया गया है। इसे दस साल में पूरा करने का लक्ष्य भी तय किया गया था, जो पूरा नहीं हो सका। सभी बच्चे स्कूल जाएँ और सबको गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, ये दो धाराएँ न होकर एक-दूसरे से परस्पर संबंधित और अपरिहार्य शर्तें हैं। इनमें से किसी एक को पूरा करके संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। बच्चों की असफलता का दोष केवल स्कूल के संस्थागत कारणों को नहीं दिया जा सकता। दोष प्रायः संसाधनों के अभाव और शिक्षकों के अकुशल रवैये को दिया जाता है। लेकिन यह भी तय है कि केवल इन्हें ही दोषी मानकर इस समस्या का हल नहीं खोजा जा सकता। इस समस्या का समाधान यही है कि अध्यापकों पर संदेह करने और उनके कार्यों की निगरानी के बजाय उन पर भरोसा किया जाए और उन्हें समर्थ और कुशल बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जाएँ। इसके अलावा पाठ्यक्रम के बोझ को कम करना, पास-फेल की नीति में बदलाव या बाल केंद्रित शिक्षा के बहाने संसाधनों की भरमार के बावजूद यह विचार करना होगा कि कैसे शिक्षा की प्रक्रिया में गाँव और शहर का अंतर कम हो सके। ग्रामीण क्षेत्रों में शैक्षणिक स्तर ऊंचा उठाने के लिए हर हाल में प्राथमिक शिक्षा का स्तर बढ़ाना होगा। लेकिन इस दिशा में न तो जन प्रतिनिधि पर्याप्त रुचि दिखाते हैं और न ही शिक्षा विभाग के अधिकारी। सरकार की ओर से कई तरह की सुविधाएँ देने के बावजूद धरातल पर स्थिति में बहुत बदलाव नज़र नहीं आता।

कोरोना से इतर भी देखा जाए तब भी भारत जैसे गरीब देश में ऑनलाइन शिक्षा की जरूरत आ गई है, क्योंकि बढ़ती जनसंख्या और जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप हमारे पास पर्याप्त स्कूल-कॉलेज उपलब्ध नहीं हैं। नर्सरी और प्राइमरी कक्षाओं में दाखिले के लिए भी पूरे देश में अफरा-तफरी मची रहती है। ऑनलाइन के विकल्प से स्कूलों पर दबाव भी कम होगा और अभिभावकों एवं बच्चों के लिए अपने-अपने ढंग से पढ़ने-पढ़ाने की स्वतंत्रता भी। यानी स्कूल में दाखिले की अनिवार्यता खत्म हो जाएगी।

ग्रामीण शिक्षा की हालत और समस्याएं क्या है

आज भी ऐसे ग्रामीण स्कूल हैं, जहाँ कमरों व डेस्क-बेंच जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी पूरी तरह से उपलब्ध नहीं हैं। बहुत से स्कूलों में बच्चे बरामदों व पेड़ों के नीचे बैठकर ही पढ़ते नज़र आते है। गर्मी के मौसम में बच्चों को पीने के पानी के लिये भी भटकना पड़ता है। शौचालय स्कूलों में बनाए अवश्य गए हैं, लेकिन पानी के अभाव में उनमें साफ-सफाई रख पाना मुश्किल हो जाता है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत बच्चों को निःशुल्क पुस्तकें उपलब्ध करवाने का प्रावधान है, लेकिन इस दिशा में कोई बेहतर स्थिति दिखाई नहीं देती। शिक्षा सत्र शुरू होने के तीन महीने बाद तक भी पहली से आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को पाठ्य पुस्तकें नहीं मिल पातीं।

ग्रामीण स्कूलों में मिड-डे मील संचालन के तौर-तरीकों पर भी सवाल उठाए जाते हैं। स्कूलों में बच्चों को खाना खिलाने में ही शिक्षकों का काफी समय व्यर्थ हो जाता है। आधिकारिक स्तर पर मिड-डे मील स्कीम के कार्यान्वयन को लेकर ठोस योजना का अभाव एक बड़ा गतिरोध है। ग्रामीण सरकारी स्कूलों की छवि गरीबों और अशिक्षितों के बच्चों के स्कूल वाली बन गई है, जो पूरी तरह शिक्षकों की दया पर निर्भर हैं। आज भी शिक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा स्कूलों में अध्यापकों के वेतन और प्रशासन पर ही खर्च होता है। फिर भी विश्व में बिना अनुमति अवकाश लेने वाले अध्यापकों की संख्या भारत में सबसे अधिक है।

ग्रामीण स्कूलों में अक्सर यह देखने को मिलता है कि अध्यापक आते ही नहीं हैं और चार में से एक सरकारी स्कूल में रोज कोई - न - कोई अध्यापक छुट्टी पर होता है। संविधान में शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया है और इसका प्रमुख ज़िम्मा राज्यों पर है। ऐसे में ज़रूरत है कि सभी राज्य अपनी परिस्थितियों के अनुसार इसकी चुनौतियों को अपने ढंग से हल करें। ऐसा हुआ भी है और इसके अलग-अलग परिणाम सामने आए। जिन राज्यों में स्कूली शिक्षा का विकास बेहतर तरीके से हुआ, वहाँ गरीब बच्चों की शिक्षा संबंधी चुनौतियों को प्राथमिकता दी गई। लेकिन आज भी स्थिति यह है कि प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अपने बच्चों को अंग्रेज़ी शिक्षा दिलाने के लिये निजी स्कूलों में भेजता है।

क्या दर्शाते हैं आंकड़े

देश के विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात की अगर बात करें, तो उसके अनुपालन में पहले के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन अब भी देश के तकरीबन 43 प्रतिशत स्कूल इसके अनुपालन में पीछे हैं। आंकड़े बताते हैं कि साल 2014 में जहां महज 49.3 प्रतिशत स्कूल इस अनुपात का पालन कर रहे थे, वह 2016 में बढ़ कर 53.1 और 2018 में 57.8 पर पहुंच गया. जहां तक राज्यों की बात है, तो इसके अनुपालन में सिक्किम (99 प्रतिशत), नागालैंड (97.6) और केरल (94.6) के स्कूल शीर्ष पर हैं, जबकि बिहार (19.7), झारखंड (28.3) और उत्तराखंड (31.3) जैसे राज्यों के ग्रामीण स्कूल निचले पायदान पर हैं। 

गांवों में स्कूली स्तर पर नामांकन एवं उपस्थिति

कुल नामांकन (6-14 आयु वर्ग) : पिछले दस वर्षों में 6-14 आयु वर्ग के छात्रों का नामांकन 95 फीसदी से अधिक का रहा है। साल 2018 में मात्र 2.8 प्रतिशत बच्चे ही स्कूलों में नामांकित नहीं पाये गये हैं।

स्कूलों में गैर नामांकित लड़कियों की संख्या : साल 2006 में, स्कूलों में गैर पंजीकृत 11 से 14 वर्ष की आयु की लड़कियों का अखिल भारतीय अनुपात 10.3 प्रतिशत था। उस वर्ष, नौ प्रमुख राज्यों में 10 प्रतिशत से अधिक लड़कियां (उम्र 11-14 वर्ष) स्कूलों में नामांकित नहीं थीं।

साल 2018 में, 11 से 14 आयु वर्ग की गैर नामांकित लड़कियों का प्रतिशत 4.1 पर आ गया है। यह आंकड़ा 5 फीसदी से अधिक केवल पांच राज्यों में पाया गया है। साल 2008 में, 15-16 आयु वर्ग की 20 प्रतिशत से अधिक लड़कियां स्कूलों में नामांकित नहीं थी। यह आंकड़ा, साल 2018 में 13.5 प्रतिशत पर आ गया है।

निजी स्कूलों में नामांकन : साल 2006 से 2014 की अवधि में, निजी स्कूलों में नामांकित बच्चों (6-14 आयुवर्ग) के अनुपात में साल-दर-साल वृद्धि देखी गयी है। साल 2014 में, यह आंकड़ा 30.8 प्रतिशत था। इसके बाद से नामांकन में स्थिरता रही है। निजी स्कूलों में नामांकित बच्चों (6-14 आयुवर्ग) का प्रतिशत साल 2016 में 30.6 प्रतिशत था और वर्ष 2018 में मात्र 0.3 फीसदी अधिक 30.9 प्रतिशत रहा। राष्ट्रीय औसत राज्यों में निजी स्कूल के आंकड़ों के परिवर्तन को छिपाती दिखती है।

राजस्थान, उत्तर प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में निजी स्कूलों में नामांकन में साल 2016 से दो प्रतिशत से अधिक अंकों की गिरावट दर्ज की गयी है। वहीं इसी दौरान, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, बिहार और गुजरात में दो प्रतिशत से अधिक अंकों की बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। उत्तर-पूर्व के अधिकांश राज्यों के निजी स्कूलों में नामांकन में साल 2016-2018 के बीच वृद्धि देखी गयी है।

आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल में कई मुश्किलें 

देश के बहुत से ग्रामीण स्कूल ऐसे हैं जहाँ बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के उद्देश्य से कई आधुनिक उपकरण मुहैया कराए गए हैं, लेकिन कुछ मुलभूतः सुविधाओं के अभाव में सरकारी स्कूलों द्वारा इन सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाना मुश्किल हो गया है। स्थानीय सरकारी स्कूल की शिक्षिका यामिनी कहती हैं, स्कूल में एडूसेट के उपकरण लगाए गए हैं। लेकिन भारी-भरकम खर्च से लगाए गए ये उपकरण अधिकांश स्कूलों में मात्र शो-पीस बनकर रह गए हैं। इसके एक नहीं बल्कि हजारों कारण हैं। पहला और प्रमुख कारण यह है कि स्कूलों में आधारभूत संरचरना की कमी है। कई स्कूलों में वस्तुओं के रखरखाव की समस्या उत्पन्न होती है। यामिनी कहती है, स्कूलों में कई बार तो बिजली न पहुंचने और कभी तो अतिरिक्त बिजली बिल की वजह से मशीनों को इस्तेमाल नहीं किया जाता है। 

सुविधाओं के अभाव में कैसे आएगी शिक्षा में क्रांति

कोरोना महामारी के फैलने बाद में जिस तरह की परिस्थितियां बन रही है, उसमें ऑनलाइन शिक्षण प्रक्रिया चलाई जा रही है। इसमें ज्ञान वाणी नाम का चैनल दूरदर्शन के माध्यम से चलाया जा रहा है। इसमें यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि हर बच्चा इस चैनल को देखे और सीखे। पर अभी तक के अनुभव यह कहते हैं कि इसमें शहरी बच्चों के अलावा ग्रामीण एवं हाशिये पर रहे परिवारों के बच्चे इसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इसका कारण यह है कि हर घर में टीवी नहीं है। गांवों में बिजली हमेशा रहती नहीं है। बच्चों के पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। अभिभावक इतने सजग नहीं है कि बच्चों को ये सुविधाएं उपलब्ध करवा सकें। ग्रामीण क्षेत्र में घरों में बच्चों पर खेत से चारा लाना, जानवरों की देखभाल में मदद करना, छोटे भाई-बहनों को संभालना और यहां तक कि माता-पिता के मजदूरी पर चले जाने पर खाना बनाने तक का बोझ आमतौर पर होता है।

कई स्कूल वाले वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शिक्षण कार्य कर रहे हैं लेकिन अभावहीनता की वही स्थिति इन ग्रामीण बच्चों के समक्ष उपस्थित होती है। उनके पास मोबाइल फोन या इंटरनेट कनेक्शन की सुविधा नहीं है। जिससे इस शिक्षा का लाभ उन तक नहीं पहुंचता है। अतः ऑनलाइन शिक्षा एक विकल्प तो हो सकता है पर यह स्कूली प्रक्रिया की जगह नहीं ले सकता। दूसरी बात यह कि एक बालक जब किसी दबाव में टेलीविजन और मोबाइल की स्क्रीन पर लगातार देखेगा तो उनकी आंखों पर इसका बेहद ख़राब असर पड़ सकता है। बच्चों की शिक्षण के प्रति अरुचि भी पैदा हो सकती है।

अब यहां सवाल यह है कि हमारे संविधान के मुताबिक 6-14 वर्ष तक के बच्चों की आरम्भिक शिक्षा को सुनिश्चित करना है, पर ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली में उसका यह अधिकार मिलना मुश्किल है। इसके लिए पूरे शिक्षा तंत्र और समाज को मिलकर कोई तरीका निकालने की जरूरत है जहां कोरोना से बचाव भी सुनिश्चित हो सके और बच्चों की पढ़ाई भी बाधित न हो। ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली को ठीक से लागू किये जाने से पूर्व इसमें आने वाली चुनौतियों और सभी बच्चों तक इसकी पहुंच बनाने का विश्लेषण करना होगा।

साक्षरता की रेस में भारत काफी पीछे

स्तंभकार योगेश कुमार गोयल लिखते हैं, साक्षरता का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना या शिक्षित होना ही नहीं है बल्कि सफलता और जीने के लिए भी साक्षरता बेहद महत्वपूर्ण है। यह लोगों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करते हुए सामाजिक विकास का आधार स्तंभ बन सकती है। भारत हो या दुनिया के अन्य देश, गरीबी मिटाना, बाल मृत्यु दर कम करना, जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करना, लैंगिक समानता प्राप्त करना आदि समस्याओं के समूल विनाश के लिए सभी देशों का पूर्ण साक्षर होना बेहद जरूरी है। साक्षरता में ही वह क्षमता है, जो परिवार और देश की प्रतिष्ठा बढ़ा सकती है। आंकड़े देखें तो दुनिया में 127 देशों में से 101 देश ऐसे हैं, जो पूर्ण साक्षरता हासिल करने के लक्ष्य से अभी दूर हैं। चिंता की बात यह है कि भारत भी इनमें शामिल है।

भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से निरक्षरता समाप्त करना प्रमुख चिंता रहा है। हमारे यहां ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण’ राष्ट्रीय स्तर की शीर्ष एजेंसी है और यह प्राधिकरण वर्ष 1988 से ही लगातार ‘अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मनाता रहा है। हालांकि आजादी के बाद साक्षरता दर देश में काफी तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में करीब 74 फीसदी नागरिक साक्षर हैं जबकि ब्रिटिश शासन के दौरान सिर्फ 12 फीसदी लोग साक्षर थे। केरल में साक्षरता प्रतिशत सर्वाधिक 93.91 फीसदी जबकि बिहार में सबसे कम 63.82 फीसदी है। देश में विद्यालयों की कमी, विद्यालयों में शौचालयों आदि की कमी, निर्धनता, जातिवाद, लड़कियों के साथ छेड़छाड़ या बलात्कार जैसी घटनाओं का डर, जागरूकता की कमी इत्यादि साक्षरता का लक्ष्य हासिल न हो पाने के मुख्य कारण हैं। अतः इनके निदान के लिए गंभीर प्रयास होना नितांत आवश्यक है ताकि भारत एक पूर्ण साक्षर राष्ट्र बनने का गौरव हासिल कर सके।



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