कब तक चलेगी जुमलों पर सरकार !

Total Views : 363
Zoom In Zoom Out Read Later Print

बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

जुमलों की बिसात पर सरकारें नहीं चलती, यह अब आम जनता को भी समझ में आ चुका है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा वर्ष 2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान किये गए चुनावी वादों या यूँ कहें कि जुमलों का फर्दाफाश पहले ही हो चूका है। लेकिन पार्टी के कई नेताओं को आज भी इस बात को समझने में दिक्कतें हो रही है कि जनता को बेवकूफ बनाना अब उन्हें महंगा पड़ सकता है। 

जुमले का संदर्भ इसीलिए उठ कर सामने आया है क्योंकि बीते दिनों देश की वित्त मंत्री ने ऐसी एक बात कह दी, जिसे लेकर फिर से भाजपा की किरकिरी शुरू हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि वित्त मंत्री ने केंद्र सरकार की छह वर्षों की नाकामी को छुपाने के लिए एक्ट ऑफ गॉड का नया जुमला शुरू किया है। इस पर विपक्ष के नेता और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था मूल रूप से तीन कारणों की वजह से आज इस हालत में खड़ी है, वो कारण नोटबंदी, जीएसटी और लॉकडाउन हैं। इसके अलावा पार्टी के नेताओं द्वारा जो भी बयान दिए जा रहे हैं, सब झूठ हैं और लोगों को गुमराह करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। ताकि लोगों का ध्यान अर्थव्यव्यवस्था, जीडीपी, बेरोजगारी और बाढ़ जैसे गंभीर मुद्दों से हटाया जा सके। 

अर्थशास्त्री कहते हैं जीएसटी में राज्यों के कर राजस्व का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा है, और राज्यों के कुल राजस्व का लगभग 60 फीसदी जीएसटी से आता है। इस लिहाज से यह अलार्मिंग सिग्नल था लेकिन किसी ने परवाह नहीं की। दरअसल जीएसटी के बाद राज्य टैक्स संग्रह के मामले में केंद्र पर पूरी तरह निर्भर है। भारत में राज्यों के विभाजन के तौर पर उनके पास पेट्रोलियम, शराब और स्टाम्प ड्यूटी को छोड़कर कोई और कर संग्रह का अधिकार नहीं रह गया है। इन तीनों को छोड़ बाकी कर अब जीएसटी में शामिल किए जा चुके हैं। जीएसटी के लागू होने से वैट, एंटरटेनमेंट टैक्स, चुंगी, पर्चेज टैक्स आदि सभी खत्म हो गए हैं। इससे राज्य सरकार को अपने खर्च चलाने का राजस्व मिल जाया करता था। इसकी पूर्ति के लिए केंद्र सरकार ने जीएसटी लागू करते वक्त राजस्व में 14 फीसदी के इजाफे की गारंटी दी।इसलिए राज्यों ने स्वीकार कर लिया केंद्र ने इसके लिए कम्पेनसेशन सेस की व्यवस्था की। हालांकि कम्पेनसेशन सेस बाजार में उपलब्ध हरेक उत्पाद के लिए नहीं लगाया जा सकता और यह केवल कुछेक लग्जरी वस्तुओं पर ही लागू किया गया है। यह तो जग जाहिर है कि नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद से ही देश की आर्थिक रफ्तार धीमी हो गई है। 

एक बात बिल्कुल साफ है कि देश में पैदा हो रही आर्थिक मंदी जिसे भाजपा सरकार हर बार नकारती रही है, इस बर्बादी के लिए वही जिम्मेदार है। जैसा कि राहुल गांधी ने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी की दोषपूर्ण व्यवस्था ही इस आर्थिक मंदी का एक बड़ा कारण है। और अब असफल लॉकडाउन ने आर्थिक संकट को और भी ज्यादा गहरा कर दिया। 

अब इन सबके बीच अगर देश की वित्त मंत्री इतनी लापरवाही और दायित्वहीन बात कहेंगी तो जनता पर इसका क्या असर होगा। हालांकि मंत्रियों और नेताओं को एक बात याद रखने की जरूरत है कि केंद्र सरकार के कार्यों का हिसाब जनता रख रही है और इसका असर आगामी वर्षों में देखने को जरूर मिलेगा। 


See More

Latest Photos