दिल्ली दंगा पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित उत्तर पूर्वी दिल्ली में इस साल फरवरी में हुए दंगों पर अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट जारी की है। अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट में एमनेस्टी ने गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए। रिपोर्ट में पुलिस द्वारा फोन पर मदद मांगने वालों को इनकार करना, दंगे ना रोकने और उसमें शामिल होना, पीड़ितों को अस्पताल पहुंचने से रोकने और मुस्लिम समुदाय से मारपीट के आरोप लगाए गए हैं। एमनेस्टी के कार्यकारी निदेशक अविनाश कुमार ने कहा कि सरकार की ओर से मिले संरक्षण से सिर्फ यही संदेश गया कि कानून लागू करवाने वाले अधिकारी बिना किसी जवाबदेही के ह्यमून राइट्स का वायलेशन कर सकते हैं। मतलब वह खुद अपना कानून चला सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसे जारी करने से पहले संगठन ने दिल्ली पुलिस के जवाब का इंतजार किया लेकिन 1 हफ्ते तक कोई जवाब नहीं मिला। 

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दिल्ली गंगों की में 50 दंगा पीड़ित, मौके पर मौजूद लोग, वकील, डॉक्टर, ह्यूमन राइट वर्कर्स, रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों से बातचीत और लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो के आधार पर रिपोर्ट तैयार की। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि कई दंगा पीड़ितों ने अपने में दावा किया कि जब दिल्ली पुलिस के इमरजेंसी नंबर पर फोन किया गया तो अव्वल किसी ने फोन नहीं उठाया और अगर उठाया तो कहा कि आजादी चाहिए थी ना, अब ले लो आजादी।

एमनेस्टी की रिपोर्ट में पुलिस द्वारा पांच नौजवानों को जूतों से मारने का वीडियो और उनमें से एक की मां की बातचीच शामिल है। युवक की मां ने दावा किया कि उनके बेटेको 36 घंटे तक जेल में रखा गया। जहां से लौट कर आने के बाद युवक की मौत हो गई। मां ने दावा किया कि उनके बेटे की हिरासत से जुड़े कोई डाक्यूमेंट नहीं दिए गए और ना ही हिरासत में लिए जाने के बाद युवक को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।

एक न्यूज वेबसाइट भारतनामा के अनुसार, एनजीओ की रिपोर्ट में  दिल्ली दंगे की भयावहता का जिक्र करते हुए मौके पर पुलिस द्वारा कार्रवाई ना करने, कुछ मामलों में पत्थरबाजी तक में शामिल होने और पीड़ितों को अस्पताल तक पहुंचने से रोकने की जानकारी भी शामिल है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने एक दंगा पीड़ित के भाई से भी बातचीत की जिसने पुलिस द्वारा कथित रूप से गोलीबारी की अपनी दोनों आँखें खो दीं। रिपोर्ट के अनुसार उसके भाई ने कहा कि मैं तुरंत उसे अस्पताल ले गया जहाँ डॉक्टर ने हमें बताया कि उसकी दोनों आँखें बुरी तरह डैमेड थीं। मैं तब पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराने गया था कि हमें सरकार से कुछ मुआवजा मिल सकता है। मुझे यह कहने में डर था कि पुलिस ने मेरे भाई पर गोली चलाई थी, इसलिए मैंने उनसे कहा कि मुझे नहीं पता कि यह किसने किया था लेकिन मेरे भाई ने अपनी दोनों आँखें खो दी हैं। तब पुलिस ने कहा कि उनके पास मेरे भाई पर पथराव करने का वीडियो है और उन्होंने उसे गिरफ्तार कर लिया। अदालत में पेश किए जाने के बाद उन्हें जमानत मिल गई और अब वह हमारे साथ घर पर हैं। उन्होंने हमें बताया कि पुलिस ने उन्हें हिरासत में टार्चर किया थी। हम पुलिस के खिलाफ किसी भी जांच को आगे नहीं बढ़ाना चाहते हैं। वैसे भी क्या होगा?

रिपोर्ट के अनुसार नाम न छापने की शर्त पर एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया से बात करने वाले एक वकील ने कहा, हमने पुलिस से कुछ वीडियो शेयर किये हैं, जिसमें दंगाइयों को आसानी से पहचाना जा सकता है। लेकिन पुलिस कुछ नहीं कर रही है। यह स्पष्ट है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने वालों में से अधिकांश मुस्लिम हैं। जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनके परिवार हमें मदद के लिए बुलाते हैं लेकिन हम क्या कर सकते हैं? उनका कहना है कि वे पीड़ित हैं लेकिन पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर रही है। हम वकील के तौर पर असहाय हैं। जब पुलिस इस तरह एक समुदाय को निशाना बनाती है तो समुदायों के बीच का आपसी विश्वास टूट जाता है।

रिपोर्ट में गृह मंत्रालय से करीब 8 सिफारिशें भी की गई हैं। मंत्रालय से दंगों की निष्पक्ष जांच, पुलिस के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के मामले दर्ज करना, दोषी अफसरों को निलंबित करना और पूरे पुलिसिया ढांचे में बदलाव की बात की गई है।

न्यूज एजेंसी डीडब्ल्यू के अनुसार, रिपोर्ट की पृष्ठभूमि में एमनेस्टी ने अनुशंसा की है कि पुलिस के खिलाफ इन आरोपों की तुरंत, विस्तृत, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। संस्था ने यह भी मांग की है कि पीड़ितों द्वारा पहचाने गए पुलिसकर्मियों को जांच के नतीजे आने तक निलंबित कर देना चाहिए और भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए पुलिसकर्मियों को नफरत संबंधी जुर्म, सामुदायिक हिंसा, पीड़ितों की जरूरतें और भेदभाव से लोगों को बचाने में पुलिस की भूमिका के बारे में प्रशिक्षण देना चाहिए।

संस्था की अन्य मांगों में शामिल हैं- केंद्र सरकार यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन टॉर्चर को तुरंत मंजूर करें, संसद पुलिस को जांच करने, हिरासत में लेने और गिरफ्तार करने की शक्तियां देने वाले सभी कानूनों को और सख्त करे और राज्यों और शहरों के पुलिस मुख्यालयों में मानवाधिकार सेल स्थापित करने की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिश को लागू किया जाए।

दिल्ली पुलिस ने अभी तक एमनेस्टी की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों पर टिप्पणी नहीं की है। इसी तरह के आरोप इससे पहले दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की भी एक जांच-रिपोर्ट ने लगाए थे। तब दिल्ली पुलिस के जन संपर्क अधिकारी अनिल मित्तल ने मीडिया को दिए एक बयान में कहा था कि दिल्ली दंगों के सभी मामलों की जांच न्यायपूर्वक और पेशेवर ढंग से हुई है।

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