अब परिवारवाद से बाहर आए कांग्रेस ,कांग्रेस को एक नए चेहरे की जरूरत

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

वर्षों पुरानी बात है जब देश की आज़ादी के लिए कांग्रेस पार्टी का गठन किया गया था। उस समय आज़ादी दिलाने की इच्छा रखने वाले अलग-अलग विचारधारा के लोगों ने कांग्रेस पार्टी में एक साथ मिल कर काम किया था। इसमें वामपंथी, दक्षिणपंथी के साथ ही साथ मध्यमार्गी भी एक जुट होकर इस लड़ाई में शामिल हुए थे। और आज भारत के इस प्रभावशाली राजनीतिक दल का हाल ऐसा हो गया है जब न वो कोई आत्ममंथन करने की स्थिति में है और न ही वो कोई पार्टी हित में कोई ठोस फैसला लेने की हालत में नज़र आ रही है। इसका नतीजा यह है कि सीडब्य्लूसी में एक बार पिर सोनिया गांधी को अगले छह महीने के लिए अंतिरिम अध्यक्ष के रूप में चुना गया। 

पिछले कई वर्षों से कांग्रेस में चल रहे परिवारवाद पर सवाल उठाए जा रहे हैं, इसके साथ ही कांग्रेस, नेतृत्व के सवाल पर अंदरूनी खींचतान से रूबरू होती रही है। आज़ादी मिलने के बाद कई दिग्गज नेताओं द्वारा पार्टी के आलाकमान को यह सुझाव दिया गया था कि कांग्रेस को एक सामाजिक संगठन के रूप में समाज में कल्याणकारी कार्यों की दिशा में कार्य करना चाहिए ना कि सत्ता पाने की दिशा में। कांग्रेस पार्टी में कई दिग्गज नेताओं ने पार्टी को राख से शीर्ष पर पहुंचाया है। इन नामों में जवाहरलाल नेहरू, नरसिम्हा राव, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी शामिल हैं। हालांकि आज पार्टी की दुर्दशा यहां आ पहुंची है, जहां नेतृत्व के अभाव में पार्टी जनता का विश्वास खोती जा रही है।   

कांग्रेस पार्टी को करीब से जानने वाले लोग कहते हैं कि शुरू से ही पार्टी में गांधी परिवार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दबदबा बना रहा है। भले ही पार्टी में गांधी परिवार के अलावा भी कई दिग्गज नेताओं को पार्टी के अध्यक्ष के रूप में चुना गया हो लेकिन किसी न किसी रूप में गांधी परिवार का उन पर या तो नियंत्रण रहा है या फिर प्रभाव रहा है। साफ तौर पर कहें तो आज़ादी के बाद से आज तक गांधी परिवार ने संगठन को किसी अंजान नेता के हाथों में सौंपने की हिम्मत नहीं की। 

वर्ष 2017 में सर्वसम्मति से राहुल गांधी अध्यक्ष चुने गए, जिसके बाद कांग्रेस ने तीन राज्यों में जीत हासिल की। फिर जब 2019 के आम चुनावों में राहुल गांधी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा तो उन्होंने पद से हटने की पेशकश की और गांधी परिवार के अलावा किसी अन्य नेता के हाथ में संगठन की कमान सौंपने की सिफ़ारिश की। 

एक ओर जहां भाजपा के पास नरेंद्र मोदी जैसा चेहरा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व तो दूर की बात है, एक मजबूत विपक्ष की भी भूमिका निभाने में अब तक असफल हुई है। 

हालिया समय को देखते हुए ये कह सकते हैं कि कांग्रेस के पास मौजूदा सरकार को घेरने के लिए कई मुद्दे तो हैं, लेकिन कमजोर नेतृत्व के अभाव से ही कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष के रूप में अपनी भूमिका निभाने में असमर्थ हो रही है। टेक्नोलॉजी के युग में कांग्रेस का ज्यादा तर संघर्ष ट्विटर तक ही सीमट कर रह जाता है। सड़कों की बजाय ट्विटर पर चलाए जा रहे अभियानों की खबर देश के करीब 100 करोड़ लोगों को नहीं होती। नतीजतन गिरती अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, और महामारी से निपटने में फेल होती भाजपा को आईना दिखाने में विपक्ष पूरी तरह से असफल साबित हो रही है।

अब समय आ चुका है कि कांग्रेस को गांधी परिवार का मोह छोड़ एक मजबूत संगठन के रूप में खुद को साबित करना होगा। और इसकी शुरुआत परिवारवाद से हट कर किसी अन्य पार्टी नेता को अध्यक्ष चुन कर की जानी चाहिए। जनता के मन में कांग्रेस को अपने लिए एक बार फिर से जगह बनानी होगी वरना कहीं ऐसा न हो कि कांग्रेस में नेतृत्व के अभाव में भाजपा का राज चलता रहे।

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