बिहार चुनाव : लोगों को आकर्षित करने के पैंतरे हजार

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

बिहार में बाढ़ आया, हर साल की तरह। लाखों लोगों बेघर हो गए हर बार की तरह। लोगों को बचाने और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम चल रहा लेकिन धीमी गति में। इन सबके बीच कोरोना महामारी ने भी बिहार के लोगों को जकड़ रखा है। हजारों की तादाद में लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हुए हैं। हालांकि इससे परे राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों में सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या और हत्या की गुत्थी से जुड़ा मामला छाया हुआ है। दिन रात प्रत्येक न्यूज़ चैनलों में सुशांत की मौत से जुड़े नए नए तत्थों को पेश किया जा रहा है। 

उधर दूसरी ओर पहले तो बिहार सरकार ने सुशांत की मौत की छानबीन बिहार पुलिस को सौंपी, लेकिन महाराष्ट्र पुलिस से सहयोग न मिलने पर बिहार सरकार ने मामले की सीबीआई जांच की मांग कर डाली। आश्चर्य होने की ही बात है कि इस पर बिना समय गवाए केंद्र सरकार ने भी हामी भर दी। इतना ही नहीं जब मामला सुप्रीम कोर्ट के पास पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी। इन घटनाक्रमों को देखकर क्या आपके मन में कोई सवाल उठ रहा है। जी हां, यह सब केवल चुनाव के मद्देनज़र किया जा रहा षड़यंत्र है। हो न हो बिहार में चुनाव आने वाले हैं जिसके मद्देनज़र सुशांत सिंह राजपूत की मौत को इतना तुल दिया जा रहा है, ताकि बिहार सरकार और भाजपा दोनों को इसका लाभ चुनाव में मिल सके।

चुनाव इस बार कई मायनों में खास और अलग होने वाला है। कोरोना काल में पहला ऐसा चुनाव होगा जैसा देश में पहले कभी नहीं हुआ। ऐसा नहीं कि इस बार के चुनाव में कोई मुद्दा न हो या फिर कोई समीकरण न बने। बिहार चुनाव में हर बार कोई न कोई मुद्दा होता है और समीकरण भी, यह बात और है कि चुनाव करीब आते कई बार यह बदल भी जाता है। इस बार चुनाव में सुशांत के मौत पर चर्चाएं चलेंगी। 

बिहार में कुछ महीने बाद चुनाव होना है। सुशांत सिंह राजपूत मामले को लेकर पूरे बिहार में जैसा माहौल है, उसको देखकर ये कहा जा सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत मुद्दा बिहार विधानसभा चुनाव में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने जा रहा है। सुशांत सिंह राजपूत के मौत के बाद से ही बिहार मे उनके फैन्स आक्रामक रवैया अपनाए हुए है और उन फैन्स के निशाने में लगातार बॉलीवुड के खेमेबाज एक्टर और फिल्मकार हैं। जनता की इस गुस्से को समझते हुए बिहार की सभी राजनीतिक पार्टीयां इस मसले को अपने अपने तरीके से जोर शोर से उठा रही है। आरजेडी, बीजेपी, जेडीयू , पप्पू यादव की पार्टी ने अपने तरीके से इस मसले को उठाया है। सबसे पहले बात करते है आरजेडी की। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इस मसले पर सीबीआई जांच की मांग की है। बाकायदा तेजस्‍वी यादव, तेज प्रताप यादव और आरजेडी प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह खुद सुशांत सिंह राजपूत के घर भी गए और ये भी मांग की है कि बिहार में बनने वाली फ़िल्म सिटी का नाम सुशांत सिंह राजपूत के नाम पर हो। आरजेडी ही नही बीजेपी के बड़े नेता रवि शंकर प्रसाद, मनोज तिवारी, खेसारी लाल यादव और पवन सिंह भी उनके घर पहुचे और मामले पर गंभीर जांच की मांग की। पप्पू यादव भी सुशांत सिंह राजपूत राजपूत के मसले को जोर-शोर से उठा रहे है और सीबीआई जांच की मांग कर रहे है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है।

बिहार से सुशांत सिंह राजपूत का रिश्ता

सुशांत सिंह राजपूत मूल रूप से पूर्णिया के बड़हरा कोठी के मलडीहा के रहने वाले थे। बिहार की राजनीति से सुशांत सिंह राजपूत का एक खास कनेक्शन था। सुशांत सिंह राजपूत सुपौल के छातापुर से बीजेपी विधायक नीरज कुमार बबलू के चचेरे भाई थे। उनकी भाभी नूतन सिंह एलजेपी से बिहार विधान परिषद की सदस्य हैं। बिहार के युवा लोगो मे सुशांत सिंह राजपूत का गहरा प्रभाव रहा है, बिहार में फिलहाल सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या का मुद्दा युवाओं में काफी गहरे से छाया हुआ है, हर तरफ आत्महत्या के जिम्मेदार लोगों पर करवाई की आवाज़ बुलंद हो रही है। बॉलीवुड के परिवारवाद और कैम्प के खिलाफ विरोध शुरू हो गया है।

चुनाव में खास होगा सोशल मीडिया का योगदान

कोरोना के इस दौर में जहां घरों से बाहर निकलने पर खतरा नजर आता है, उस वक्त यदि चुनाव होंगे तो यकीनन नजारा देखने में बेहद अलग होगा। वोटरों तक सीधे पहुंचना किसी भी नेता के लिए टेढ़ी खीर साबित होगी। वर्चुअल रैलियों की शुरुआत बिहार में हो चुकी है। हालांकि अभी बाढ़ से उत्पन्न ताज़ा हालातों की वजह से इस पर ब्रेक लगा हुआ है। चुनाव में वक्त कम है ऐसे में अब राजनीतिक दलों और नेताओं की निर्भरता बहुत हद तक सोशल मीडिया पर बढ़ गई है। ऐसा नहीं कि पहले के चुनावों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल न हुआ हो लेकिन इस बार के बिहार चुनाव में सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों की निर्भरता काफी बढ़ गई है। बिहार के वैसे दल भी जो अब तक इसका सीमित इस्तेमाल करते थे वो भी इस बार इसको लेकर आक्रामक रणनीति बना रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक दल और नेता अपनी बात पहुंचाने में जुट गए हैं। अपनी बात कहने के साथ ही साथ राजनीतिक दलों की नजर सोशल मीडिया पर चलने वाले मुद्दे पर भी है। इस वक्त सोशल मीडिया का जो सबसे बड़ा मुद्दा है वह है सुशांत सिंह राजपूत। सुशांत के दुनिया छोड़कर जाने से सीबीआई जांच तक यह मामला सोशल मीडिया पर छाया है।

विभिन्न पार्टियों में सुशांत के चर्चे 

सुशांत सिंह राजपूत को दुनिया छोड़कर गए लगभग दो महीने से ज्यादा समय बीत चुका है। सुशांत सिंह राजपूत ने सुसाइड किया है ऐसा कई लोगों को नहीं लगता और किया भी है तो इसके पीछे की वजह क्या। यही वो बात है कि सुशांत को इंसाफ दिलाने की मांग जोर पकड़ने लगी। सबसे अधिक यह मांग बिहार से उठने लगी। सीबीआई जांच की मांग होने लगी। अब इस मामले की जांच सीबीआई करेगी लेकिन इसके बाद भी यह मामला शांत होता नहीं दिख रहा। सुशांत से जुड़ी खबरों को लोग खूब देख और पढ़ रहे हैं साथ ही वो क्या सोच रहे हैं उसे भी व्यक्त कर रहे हैं। सुशांत को इंसाफ दिलाने वाले पोस्ट अधिक से अधिक शेयर किए जा रहे हैं।

बिहार की आम जनता ही नहीं राजनीतिक दलों की ओर से भी सुशांत को इंसाफ दिलाने की मांग उठने लगी। सुशांत केस की सीबीआई जांच होगी इस फैसले के बाद बिहार के राजनीतिक दलों के जो बयान आए उससे इसको आसानी से समझा जा सकता है। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव का सुशांत मामले पर कहना है कि आरजेडी पहली पार्टी थी जो लगातार इस मामले में सीबीआई जांच की मांग करती रही।

लोक जनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान भी लगातार इस मसले को उठा रहे थे। बिहार सरकार ने जब इस मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश की उस वक्त चिराग पासवान ने कहा देर आए दुरूस्त आए। केंद्रीय मंत्री आरके सिंह ने भी सीबीआई जांच की मांग को जायज ठहराया था।

बिहार कांग्रेस की ओर से भी सीबीआई जांच की सिफारिश के फैसले का स्वागत किया था। जीतन राम मांझी ने भी फैसले का स्वागत किया। जन अधिकार पार्टी लोकतांत्रिक के प्रमुख और पूर्व सांसद पप्पू यादव ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पहले ही सीबीआई जांच की मांग की थी। इस पूरे मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि सुशांत सिंह राजपूत के पिता यदि सीबीआई जांच की मांग करते हैं तो केस सीबीआी को दिया जा सकता है। पिता की मांग के बाद बिहार सरकार ने भी सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी। इसके पहले बिहार पुलिस की टीम भी मुंबई पहुंची जिसको लेकर काफी हंगामा भी मचा।

इस पूरे मामले की जांच सीबीआई करेगी बावजूद इसके यह मामला अब भी सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। सोशल मीडिया पर सबसे अधिक एक्टिव युवा हैं. और आने वाले बिहार चुनाव में युवा वोटर्स निर्णायक भूमिका में हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा सोशल मीडिया और सुशांत के जरिए राजनीतिक दलों की नजर युवाओं पर भी है।

युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश

कोरोना काल में वोटरों का रुझान क्या होगा यह कह पाना मुश्किल है। हालांकि चुनाव से पहले सुशांत का मुद्दा बिहार में भावनात्मक लगाव का मुद्दा बन गया है। सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा एक्टिव युवा ही हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में युवा वोटर निर्णायक भूमिका अदा करने वाले हैं। बिहार में वोटरों की कुल संख्या 7 करोड़ 18 लाख के आस पास है जिसमें 20 से 39 वर्ष के वोटरों की संख्या को देखा जाए तो यह तकरीबन यह तरकीब 3 करोड़ 59 लाख के आसपास है। इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस आयु वर्ग के वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। इतना ही नहीं इस आयु वर्ग वाले सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव हैं। ऐसे में तमाम राजनीतिक दल सुशांत के मुद्दे पर उनके साथ खड़े दिखना चाहते हैं। पहले भले ही यह मुद्दा राजनीतिक न रहा हो लेकिन धीरे- धीरे मुद्दा राजनीतिक हो गया है। सोशल मीडिया, सुशांत और युथ का समीकरण बिहार चुनाव में बनता दिख रहा है, ऐसे में अधिकांश राजनीतिक दलों की नजर इस समीकरण पर है।

क्या होने चाहिए चुनाव के मुद्दे

देश में समस्याओं की कमी नहीं है। और अब हम बात देश के उस राज्य की कर रहे हैं, जहां समस्याओं का अंत नहीं है। बिहार की परेशानियों में बेरोज़गारी अहम है। बिहार की छवि देश दुनिया में इसीलिए श्रेष्ठ नहीं है क्योंकि राज्य सरकार इतने सालों में बिहार के लोगों को रोज़गार दिलाने की दिशा में असफल रही। आज भी बिहार से लाखों लोग रोज़गार की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर व एक राज्य से दूसरे राज्य घूमते हैं। बिहार चुनाव के असली मुद्दों गिरती अर्थव्यवस्था की मार, बेरोज़गारी, कोरोना महामारी से जूझती जनता, किसानों की दुर्दशा, भूखे मर रहे लोग आदि मुख्य हैं। चुनावों में लोग इसीलिए वोट देते हैं ताकि सरकार उनके लिए कुछ कर सकें लेकर चुनाव जीतने के बाद लगभग हर पार्टी के नेता अपनी जिम्मेदारियों को भूल जाते हैं। 

क्या कहते हैं आंकड़ें

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो में जारी आंकड़ों की माने तो देश में हर घंटे में एक छात्र आत्महत्या करता है। वहीं हर 24 घंटे में लगभग 28 लोग आत्महत्या करते हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि 2018 में 10,159 छात्रों, 2017 में 9,905 और 2016 में 9,478 छात्रों ने आत्महत्या की है।

दुनिया भर में हर साल लगभग 8,00,000 लोग आत्महत्या करके मरते हैं, इन 1,35,000 यानि 17 प्रतिशत लोग भारत के निवासी हैं। वर्ष 1987 और 2007 के बीच, भारत के दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में आत्महत्या की दर 7.9 से बढ़कर 10.3 प्रति 1,00,000 हो गई। वर्ष 2012 में, तमिलनाडु (सभी आत्महत्याओं का 12.5%), महाराष्ट्र (11.9%) और पश्चिम बंगाल (11.0%) में आत्महत्याओं का उच्चतम अनुपात था। बड़ी आबादी वाले राज्यों में, तमिलनाडु और केरल में 2012 में प्रति 100,000 लोगों की आत्महत्या की दर सबसे अधिक थी। पुरुष से महिला आत्महत्या का अनुपात लगभग 2:1 रहा है। 


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