क्या धर्म के नाम पर हम मानवता खो रहे हैं?

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

 पिछले दिनों बेंगलूरु में जो हुआ वो जग जाहिर है। हिंसा का ऐसा रूप शहर ने कभी नहीं देखा। टेक्नोलॉजी हब कहे जाने वाले शहर में ही जब टेक्नोलॉजी का गलत इस्तेमाल किया जाए तो आप इसे क्या कहेंगे? एक फेसबुक पोस्ट की वजह से हिंसा, धार्मिक अशांति, आगजनी आदि, ये संस्कृति कैसे दिन पर दिन पनप रही है? कैसे लोग इस प्रकार से असहिष्णु होते जा रहे हैं। ऐसी घटनाएं केवल बेंगलूरु में ही नहीं बल्कि देश के हर प्रांत के हर कोने से आ रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या लोग धर्म की आड़ में अपनी लगत मंशा को फैलाने और हिंसा भावना को बढ़ाने का काम कर रहे हैं? सवाल ये भी है कि क्या उसी धर्म के नाम पर लोग मानवता खोते जा रहे हैं? बुद्धिजीवियों का कहना है कि भारत जैसे देश में अगर कोई सड़क हादसा होता है तो लोग केवल तमाशबीन बन कर तमाशा देखते है लेकिन एकाएक धर्म के नाम पर हिंसा फैलने के लिए धार्मिक कट्टरपंथी भीड़ इकट्ठा कर लेते हैं। इससे बड़े दुर्भाग्य की बात क्या होगी कि देश में शांति बनाए रखने वालों से ज्यादा उपद्रव और अशांति फैलाने वालों की संख्या ज्यादा है।   

बेंगलूरु को देश के उन चुनिंदा शहरों में गिना जाता है, जहां भारी संख्या में विदेशियों का न केवल आना जाना होता है बल्कि जहां काफी संख्या में विदेशी नागरिक कार्य के सिलसिले में रहते भी हैं। ऐसे में अगर हिंसा की घटनाओं को धार्मिक भावनाओं के साथ जोड़ा जाता है और ऐसी घटनाओं में बढ़ोत्तरी होती है तो शहर के स्वस्थ वातावरण पर एक काला दाग लग सकता है। ऐसे मुद्दों पर केवल राज्य सरकार की ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार को भी हस्तक्षेप करना चाहिए और ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले असामाजिक तत्वों और देश की सौहाद्रता पर दाग लगाने वाले लोगों पर सख़्त से सख़्त कार्रवाई की जानी चाहिए।      

क्यों धर्म के नाम पर लोगों को भड़काना इतना आसान होता है ?

यूं तो भारत को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के नाम से जाना जाता है लेकिन आए दिन यहां अलग अलग प्रांतों से जिस प्रकार की हिंसा की ख़बरें आ रही हैं उसे देख कर इस पर पूर्ण रूप से यकीन कर पाना मुश्किल होता जा रहा है। बुद्धिजीवियों का कहना है इन दिनों देश में हिंसा की घटनाएँ बढ़ रही है। उनका कहना है कि नई तकनीकों का इस्तेमाल कहीं न कहीं गलत दिशा में किया जा रहा है। उनका कहना है कि दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत में लोगों को धर्म के नाम पर भड़काना बहुत आसान है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यहां लोग आस्था को स्वाभिमान के साथ जोड़ लेते हैं, जिसकी वजह से ऐसी घटनाएँ बढ़ती है। राजनीतिक जानकार प्रेम नारायण मिश्र कहते हैं कि भारत में लोगों को धर्म के नाम पर भड़काना बेहद आसान है क्योंकि यहां लोग इंसानियत से ज्यादा आस्था पर विश्वास करते हैं, क्योंकि यहां लोग अपनी बुद्धि की जगह कट्टरपंथियों के बहकावे पर आ जाते हैं। वे कहते हैं कि जब तक लोग ऐसी चीजों पर अपना विश्वास बनाए रखेंगे तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। 

सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि आज आधुनिक राजनीति ने धर्मों को राष्ट्रों तक सीमित कर दिया है और धार्मिक पहचान के प्रश्न को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ दिया है। आज हम अपनी आंखों से देख रहे हैं कि कैसे राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिक गोलबंदी की जा रही है।

धार्मिक हिंसा क्या इतिहास से जुड़ा है

लेखिका इतिहासकार और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज़ में प्रोफेसर प्रथमा बनर्जी लिखती हैं, कई उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी भारतीय इस बात पर जोर देते हैं कि ब्रिटिश राज से पहले भारत की एक सामंजस्यपूर्ण संस्कृति थी। जबकि दक्षिणपंथी हिंदू अपने पसंदीदा द्विराष्ट्र सिद्धांत के हवाले से यह दलील देते हैं कि सांप्रदायिकता हमेशा से भारतीय इतिहास की विशेषता रही है, भारत एक हिंदू राष्ट्र रहा है और या तो विदेशी या धर्मांतरित हिंदू होने के कारण मुसलमान अपनी मूल नियति से भटक गए हैं।

आज हमें सांप्रदायिकता के रूप में जो दिख रहा है, वह निर्विवाद रूप से एक हालिया घटना है। इसका मतलब ये नहीं है कि अतीत में भारत में संघर्ष नहीं होते थे। जिस प्रकार भारतीय इतिहास में हिंदू और मुस्लिम शासकों द्वारा एक-दूसरे की धार्मिक परंपराओं के संरक्षण के और आम लोगों की मिश्रित हिंदू-मुस्लिम पहचान के असंख्य उदाहरण हैं, उसी तरह हिंदुओं और बौद्धों, शियाओं और सुन्नियों, मुगलों और सतनामियों, ब्राह्मणों और नाथपंथियों आदि के बीच धार्मिक विवादों के भी कई उदाहरण हैं। उस समय विवादों ने सांप्रदायिकता का रूप नहीं लिया था।

क्या भारत में विरोध जताने की परंपरा हिंसा में बदल गई है

भारत की आईटी राजधानी बेंगलूरु के कुछ इलाकों में बीते दिनों एक छोटी-सी बात को लेकर जिस तरह से सांप्रदायिक हिंसा को भड़काया गया, उसके दोषी बच के न निकल सकें, यह राज्य सरकार को सख्ती से सुनिश्चित करना होगा। उनपर कठोरतम एक्शन हो ताकि आगे से ऐसा दंगा-फसाद करने के संबंध में कोई सोचे भी नहीं। बेंगलूरु की हिंसा में कुछ मासूमों की जानें भी गई, तमाम निर्दोष लोग घायल हुए और सरकारी व निजी संपत्ति को भारी नुकसान हुआ। सबसे अहम बात यह है कि सारी दुनिया में इस हिंसा का बेहद गलत संदेश गया। 

बेंगलूरु जैसे आधुनिक महानगर में उपद्रवियों ने जगह-जगह गाड़ियों को आग लगाई और एटीएम तक में तोड़फोड़ की गई। उन्होंने कांग्रेस के विधायक के घर पर हमला किया। दरअसल बेंगलूरु में कांग्रेस विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के एक कथित रिश्तेदार ने पैगंबर मोहम्मद को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ अपमानजनक पोस्ट किया था, जिसकी प्रतिक्रिया में ही यह सुनियोजित हिंसा हुई। सवाल यह है कि क्या अब भारत में किसी भी मसले पर विरोध जताने के लिए हिंसा का ही सहारा लिया जाएगा? उपर्युक्त पोस्ट को लेकर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ उचित पुलिस एक्शन हो सकता था। आखिर किसी को भी कानून को अपने हाथ में लेने का अधिकार हरगिज़ नहीं है। इससे साफ है कि देश में धार्मिक हिंसा ने बहुत गंभीर रूप ले लिया है। 

लेखक आरके सिन्हा लिखते हैं, खाए-पिए-अघाए लिबरलों की जमात अब यह तो बताए कि उन्होंने चुप्पी क्यों साध ली है? इन तथाकथित वामपंथियो के चलते उन समस्त लोगों को शर्मिंदा होना पड़ता है जो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक फिरकापरस्तों और उनकी साम्प्रदायिक सोच से लड़ते हैं। यह वर्ग उन करोड़ों अल्पसंख्यकों के सामने कांटा बिछाता है जो अपने बीच के उन्मादियों और जाहिलों से लड़ रहे हैं। बेशर्म हैं ये। याद रख लें तुष्टिकरण की राजनीति जल्द खत्म नहीं होगी क्योंकि कुछ स्वार्थी राजनेताओं को इसी में अपना भला नजर आता है। जबतक कोई कड़ा कानून नहीं आएगा और तुष्टीकरण के खिलाफ सारी विपक्षी पार्टियाँ मुंह नहीं खोलेंगी तब तक बेंगलूरु जैसी हिंसक वारदातें होती रहेंगी।

देश में मुसलमानों का एक वर्ग अब लगभग तालिबानी सोच रखने लगा है। पिछले दिनों राम मंदिर के शिलान्यास के अवसर पर ये खुलकर कह रहे थे कि हम समय आने पर वहां फिर मस्जिद बना लेंगे। जरा गौर करें कि राम मंदिर बना नहीं है और उससे पहले ये मंदिर को तोड़ने और बम से उड़ाने की धमकियां देने लगे। क्या यही लोकतंत्र है? तथाकथित लुटियन गैंग अब क्यों नहीं बोलता? अब लेखक वापस क्यों नहीं करते अपने पुरस्कार या अब कैंडल मार्च क्यों नहीं निकालते? ये बेशर्म बुद्धिजीवी देश को सिर्फ अपमानित करने के काम में ही लगे रहते हैं? जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो। आखिर कबतक?

सांप्रदायिक हिंसा के मामले में भारत का स्थान

अमेरिका ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में जो कुछ भी हो रहा है, उस पर गहरी चिंता जताई है। धार्मिक स्वतंत्रता मामलों के अमेरिका के राजदूत सेमुअल ब्राउनबैक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी 2019 की रिपोर्ट जारी किए जाने के अवसर पर भारत के बारे में यह टिप्पणी की। अमेरिकी कांग्रेस के निर्देश पर तैयार की जाने वाली इस रिपोर्ट में पूरी दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी हिंसा के मामलों को दर्ज किया जाता है। 

भारत ने पहले भी धार्मिक स्वतंत्रता पर आई इसी तरह की अमेरिकी रिपोर्ट को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि संविधान से संरक्षण प्राप्त भारतीय नागरिकों की स्थिति के बारे में किसी भी विदेशी सरकार को टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। ब्राउनबैक ने टेलीफोन पर विदेश के पत्रकारों को बताया कि भारत एक ऐसा देश है, जहां से चार प्रमुख धर्म विकसित हुए। ऐतिहासिक दृष्टि से भारत सभी धर्मों के लिए अत्यंत सहनशील और सम्मान करने वाला देश रहा है। लेकिन वहां जो कुछ भी हो रहा है, उससे हमें भारी चिंता होती है। भारत में नए बदलावों से समस्या बढ़ रही है। यह ऐसा धार्मिक उप महाद्वीप है कि जहां भारी सांप्रदायिक हिंसा हुई है।

अमेरिकी राजदूत ने कहा कि हमें कई समस्या दिख रही है। उनका मानना है कि भारत को इसके लिए कदम उठाने होंगे। उम्मीद है कि भारत विभिन्न धर्मों के बीच संवाद बढ़ाएगा ताकि आपसी समझ विकसित हो सके। इसके अलावा विशिष्ट मुद्दे सुलझाने के लिए भी प्रयास किए जाएंगे। अगर भारत ने इस तरह के प्रयास नहीं किए तो हिंसा की घटनाएं बढ़ सकती हैं और समाज में समस्याएं और गंभीर हो सकती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी भी भेदभाव की आलोचना करते हुए कहा था कि महामारी सभी को समान तरीके से परेशान कर रही है। कोविड-19 जाति, धर्म, भाषा, सीमा, वर्ग आदि के बीच कोई अंतर नहीं कर रहा है। इस महामारी से लड़ने के लिए हमारे प्रयास एकजुटता भरे होने चाहिए। भारतीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2008 से 2017 के बीच देश में 7,484 सांप्रदायिक घटनाएं हुईं। इनमें 1,100 लोगों की जान चली गई। इस बीच, फेडरेशन ऑफ इंडियन क्रिश्चियन ऑर्गनाइजेशन ने अमेरिकी धार्मिक रिपोर्ट का स्वागत किया है।

क्यों नहीं सीखें पहले की घटनाओं से

ऐसा नहीं है कि बेंगलूरु में जो हुआ वो देश की पहली ऐसी सांप्रदायिक हिंसक झड़प थी, बल्कि इससे पहले भी कई बार धर्म के नाम पर ऐसी घटनाओं को कट्टरपंथियों द्वारा अंजाम दिया जाता रहा है। हाल के घटनाओं में महाराष्ट्र के पालघर में दो हिन्दू साधुओं पर भीड़ ने हमला कर दिया। आज के ज़माने में जहां दिन प्रतिदिन नई तकनीकों के आविष्कार से देश एक कदम आगे बढ़ रहा है, वहीं ऐसी घटनाएँ देश को दो कदम पीछे की ओर धकेल रही है। नई तकनीकों का सही दिशा में इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह पता चला है कि भारत में लोग सोशल मीडिया प्लैटफॉर्मों का इस्तेमाल धार्मिक हिंसा और सांप्रदायिक सौहाद्रता को नष्ट करने में करते हैं। लगातार हो रही इन घटनाओं का नतीजा ये होता है कि सैंकड़ों की संख्या में लोग आहत होते हैं और कुछ मासूम लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। हालांकि ताज्जुब की बात तो यह है कि पहले हुई ऐसी घटनाओं से न तो देश की सरकारों ने कुछ सीखा और न ही देश की जनता ने। एक हिंसा भड़काने में व्यस्त है तो दूसरा हिंसा की आग फैलाने में। केंद्र सरकार को इन मामलों में संज्ञान लेनी चाहिए।     

ऐसे मामलों में नेता क्यों हो जाते हैं गूंगे

देश में बढ़ते सांप्रदायिक दंगों के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसी घटनाएँ केवल एक राज्य या एक प्रांत तक सीमित नहीं है बल्कि देश भर के अलग अलग हिस्सों में अंजाम दिए जा रहे हैं। ज्यादातर मामलों में महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं। ऐसे मामलों में अक्सर राज्य में सत्ताधारी पार्टी के विपक्षी बोल उठते हैं लेकिन सत्ताधीन सरकारें इन मामलों में कुछ भी टिप्पणी करने से इंकार कर देती हैं। हालांकि ये अक्सर उत्तर प्रदेश में देखा जाता है जब नेता कुछ बोलने से बचते हैं लेकिन बेंगलूरु में हुई घटना पर राज्य के मुख्यमंत्री ने कड़ी निंदा व्यक्त की और कहा कि जितने भी लोग इसमें दोषी पाए गए हैं वे हिंसा के दौरान हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति करेंगे। अगर राज्य में जहां भी ऐसी घटनाएं होती हैं वहीं सरकारें सख्ती से पेश आए तो शायद आने वाले दिनों में ऐसी घटनाएं कम हों। 

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