कोझिकोड़ एयर इंडिया एक्सप्रेस विमान हादसा : हादसों से सीखेंगे नहीं तो जाती रहेंगी जानें

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

बारिश ने भीषण तबाही मचा रखी है, देश के अलग अलग प्रांतों में बारिश की वजह से बाढ़, भूस्खलन जैसी आपदाएं बढ़ रही है। विभिन्न राज्यों के लोग इससे जूझ ही रहे थे कि केरल के कोझिकोड़ से एक हृदय विदारक घटना सामने आई। भारी बारिश की वजह से कोझिकोड़ एयरपोर्ट पर एयर इंडिया एक्सप्रेस के भीषण विमान हादसे को देख लोगों की रूह कांप उठी। प्रसारित तस्वीरों की मानें तो विमान के दो हिस्सों को देख कर सांसे थम सी गई। खबरें तो कई आई, घटना पर सियासत भी तेज़ है। लेकिन इस बीच विमान के मुख्य पायलट दीपक साठे ने अपनी समझदारी और साहस का परिचय देते हुए न केवल विमान को आग लगने से बचाया बल्कि उन्होंने इस दर्दनाक हादसे में अपनी जान तक गवां दी। मालूम हो कि कोरोना वायरस की वजह से साठे भी दुबई में फंस गए थे और  लंबे समय के बाद अपने वतन लौटने को लेकर वह बहुत खुश थे। साठे एयर फोर्स के टेस्ट पायलट रह चुके थे। एयर फोर्स के टेस्ट पायलट बहुत सारे एयरक्राफ्ट पर टेस्ट करते हैं। पायलट ने अपनी जान गंवाते हुए  अधिकांश यात्रियों की जान बचा ली।

पायलट कैप्टन की सुझबूझ से टला बड़ा हादसा 

एयर इंडिया एक्सप्रेस विमान के पायलट कैप्टन दीपक वसंत साठे और को पायलट कैप्टन अखिलेश कुमार थे। कैप्टन दीपक फाइटर पायलट थे और राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के पूर्व छात्र थे। वायु सेना अकादमी से स्वॉर्ड ऑफ ऑनर प्राप्त कैप्टन दीपक ने मिग विमानों को सबसे ज्यादा उड़ाया था। इन दोनों पायलटों ने अपनी जान देकर कई यात्रियों की जान बचा ली। कैप्टन साठे (58) पवई स्थित जलवायु बिल्डिग के निवासी थे। स्थानीय निवासियों के अनुसार, उनके परिवार में दो पुत्र हैं। एक पुत्र बेंगलूरु में रहता है, जबकि दूसरा अमेरिका में रहता है। वे जल्द ही केरल पहुंचने वाले हैं। वायुसेना के पुरस्कार विजेता एक पूर्व अधिकारी कैप्टन साठे का 30 सालों का लंबा और दुर्घटनामुक्त उड़ान रिकॉर्ड रहा है, जिसमें से लगभग 18 साल उन्होंने एयर इंडिया को दिए थे। कैप्टन साठे बेहद ही अनुभवी पायलट थे और वे वायु सेना अकादमी द्वारा स्वॉर्ड ऑफ ऑनर से भी सम्मानित किए गए थे।

दीपक के चचेरे भाई नीलेश साठे ने अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखा, प्लेन के लैंडिंग गियर्स ने काम करना बंद कर दिया था। दीपक ने एयरपोर्ट के तीन चक्कर लगाए, ताकि फ्यूल खत्म हो जाए। तीन राउंड के बाद प्लेन लैंड करवा दिया। उसका राइट विंग टूट गया था। प्लेन क्रैश होने से ठीक पहले इंजन बंद कर दिया। इसलिए एयरक्राफ्ट में आग नहीं लगी। दीपक को 36 साल का अनुभव था। वे एनडीए पास आउट और स्वॉर्ड ऑफ ऑनर अवॉर्डी थे। 2005 में एयर इंडिया ज्वाइन करने से पहले 21 साल तक एयरफोर्स में रहे थे।

क्या हुआ था हादसे से पहले

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पायलट ने लैंडिंग से पहले आसमान में कई चक्कर लगाए। पायलट ने विमान को बचाने की पूरी कोशिश की, मगर आखिरी वक्त में उतारना ही पड़ा। भारी जमा पानी व विमान के फिसलने से हादसा टाला नहीं जा सका। एक विमान यात्री रियास ने कहा कि लैंड करने से पहले पायलट ने दो चक्कर लगाए थे। रियास ने कहा, मैं पिछली सीट पर था। अचानक बहुत तेज शोर हुआ और उसके बाद क्या हुआ मुझे नहीं पता। एक अन्य यात्री फातिमा ने कहा कि विमान बेहद तेजी से जमीन से टकरा कर बहुत तेजी से दौड़ता चला गया। बताया जा रहा है कि हादसे के वक्त विमान में 10 बच्चे, दो पायलट और कैबिन क्रू के पांच सदस्यों समेत कुल 191 लोग सवार थे और लैंडिंग के समय भारी बारिश भी हो रही थी। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय के अनुसार, एयर इंडिया एक्सप्रेस एएक्सबी1344 एक बी737 विमान था, जिसमें क्रू मेंबर समेत 191 लोग सवार थे। स्थानीय विधायक टी. वी. इब्राहिम ने कहा कि वह हवाईअड्डे के पास स्थानीय अस्पताल में हैं, जहां उन्होंने दो शव देखे हैं, जबकि लगभग 50 घायलों को अस्पताल लाया गया है।

क्यों खतरनाक होता है टेबल टॉप रनवे

टेबल टॉप रनवे आमतौर पर पहाड़ी और पठारी इलाकों में बनाए जाते हैं। दरअसल, पहाड़ों में समतल जगह की कमी होती है। इसलिए थोड़ी ही जगह में ऐसे रनवे बना दिए जाते हैं और इनके आसपास बहुत जगह भी नहीं होती। कई जगहों पर इनके दोनों तरफ या एक तरफ खाई या ढलान होती है। यह रनवे खत्म होते ही खाई आ जाती है ऐसे में इससे उड़ान भरते या उतरते समय बेहद सावधानी बरतनी पड़ती है।अगर इसके नाम से इसका मतलब समझने की कोशिश करें तो टेबल के ऊपरी हिस्से के चारों तरफ नीची जगह होती है, वैसे ही इन रनवे के आसपास या सामने खाई या ढलान हो सकती है। ऐसे में अगर कोई विमान रूक नहीं पाता है या उसके ब्रेक नहीं लगते हैं तो हादसा होने का खतरा बढ़ जाता है। इसकी तुलना अगर आम रनवे से करें तो अगर विमान फिसलता भी है तो वह आसपास या सामने जाकर रूक जाएगा।

हवाई सुरक्षा को लेकर काम करने वाले वकील और कार्यकर्ता यशवंत शेनॉय बीबीसी से कहा इस हादसे पर आश्चर्य नहीं हो रहा है। यहां ऐसी दुर्घटना होने की आशंका हमेशा बनी हुई थी। उन्होंने कहा कि किसी भी एयरपोर्ट के लिए रनवे के दोनों तरफ कम से कम 150 मीटर का छोर होना चाहिए, लेकिन जिस जगह यह हादसा हुआ है, वहां ऐसा नहीं है। कोझिकोड का हवाई अड्डा बड़े विमानों के लिए बेहद खतरनाक है। एक और हवाई सुरक्षा विशेषज्ञ कैप्टन मोहन रंगनाथन ने कहा कि उन्होंने नौ साल पहले रिपोर्ट में कहा था कि कोझिकोड एयरपोर्ट लैंडिंग के लिए सुरक्षित नहीं है। केरल स्थित चार एयरपोर्ट्स में से कोझिकोड में सबसे छोटा रनवे है। साथ ही बीते बारिश के कारण भी इसे नुकसान पहुंचा है। कैप्टन रंगनाथन ने कहा कि रनवे के बाद तीखी ढलान है और कोई सेफ्टी एरिया नहीं है। अधिकारियों को नौ साल पहले इसके सबूत दिए गए थे।

होगी विमान हादसे की जांच

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक एयर इंडिया एक्सप्रेस ने ताज़ा बयान जारी कर कहा है कि यात्रियों और उनके परिजनों की मदद के लिए दिल्ली और मुंबई से दो विशेष विमानों की व्यवस्था की गई है। बयान में कहा गया है कि एयर इंडिया के चेयरमैन और एयर इंडिया एक्सप्रेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच चुके हैं। हादसे के कारणों की जांच के लिए नागर विमानन मंत्रालय, डीजीसीए और फ्लाइट सेफ्टी विभाग के अधिकारी भी कोझिकोड पहुंच चुके हैं। वहीं केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन और राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान भी शनिवार सवेरे कोझिकोड पहुंचने वाले हैं। नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ट्वीट कर जानकारी दी कि हादसे की जांच के लिए दो टीमों का गठन किया गया है। एक टीम एयर इंडिया की होगी और दूसरी एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया की। हरदीप सिंह पुरी ने जानकारी दी है कि रेस्क्यू पूरा कर लिया गया है। उन्होंने जानकारी दी है कि विमान का डिजिटल फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर मिल गया है।

कब सिखेंगे पुराने हादसों से

स्वतंत्र टिप्पणीकार डॉ रमेश ठाकुर लिखते हैं, कोझिकोड एयरपोर्ट का रनवे दिल्ली एयरपोर्ट के रनवे से छोटा है। कोझिकोड का रनवे 8800 फुट लंबा है, जबकि दिल्ली का 11000 फुट लंबा रनवे है। छोटे रनवों पर बारिश में प्लेनों की लैंडिंग कराना किसी बड़े खतरे से कम नहीं होता। रनवे जब भीग जाता है तो प्लेनों के फिसलने की आशंका बढ़ जाती है। दस वर्ष पहले मंगलुरू एयरपोर्ट पर भी कुछ ऐसा ही हादसा हुआ था। संयोग देखिए तब भी प्लेन दुबई से आया था। 22 मई 2010 को एयर इंडिया का विमान दुबई से आते वक्त रनवे को पार करते हुए पास की पहाड़ियों में जा गिरा था, जिसमें 158 लोगों की मौत हुई थी। उस हादसे से भी एयरपोर्ट अथाॅरिटी ने कोई सबक नहीं सीखा। दोनों हादसे कमोबेश एक जैसे ही हैं।

मंगलुरू और कोझिकोड के दोनों हादसों के बाद भी अगर कोई सतर्कता नहीं दिखाई तो ऐसे दर्दनाक हादसों की पुनरावृत्ति होती रहेगी और हवाई यात्री असमय मौत मुंह में समाते जाएंगे। कुछ वर्ष पूर्व केंद्र सरकार ने देशभर के एयरपोर्ट की सुरक्षा-समीक्षा की थी। रिपोर्ट में सामने आया था कि कई ऐसे रनवे हैं जो बोइंग विमानों का भार झेलने के लायक नहीं हैं। बोइंग विमानों का वजन लगभग 70 से 100 टन के आसपास होता है। लैंडिंग के वक्त एकदम तेजी से इतना भार जमीन पर पड़ता है तो कम दूरी के रनवे मुकाबला नहीं कर पाते। बारिश में छोटे रनवे की हालत और भी ज्यादा खराब हो जाती है। खराब मौसम में जब ये विमान लैंड करते हैं तो रनवे पर उनके टायरों की रबड़ उतर जाती हैं, जिससे ब्रेक लगाने के वक्त प्लेनों के फिसलने की आशंका बढ़ जाती है। उसी स्थित में अगर रनवे लंबे हों तो पायलट नियंत्रण कर लेता है लेकिन छोटे रनवे पर दुर्घटनाएं हो जाती हैं।

कोझिकोड के जिस एयरपोर्ट पर हादसा हुआ है उसके आसपास बहुत ज्यादा हरियाली है इसलिए वहां दूसरे एयपोर्टस् के मुकाबले विजिबिलिटी हमेशा कम रहती है। इसलिए उस रनवे पर हादसे की आशंका हमेशा बनी रहती हैं। इतना सबकुछ जानने के बाद भी एयरपोर्ट प्रशासन आंखें मूंदकर बैठा रहता है, अगले हादसे का इंतजार करता रहता है और देखते-देखते हादसा हो भी जाता है। दस साल पहले जो हादसा हुआ था उसमें भी विमान दो हिस्सों में ऐसे ही टूट गया था। हादसे का तरीका मौजूदा हादसे जैसा ही था। तेज बारिश में प्लेन की लैंडिंग कराना कोझिकोड रनवे पर खतरे से कम नहीं होता, फिर क्यों विमान को उतारने की इजाजत दी। मौजूदा विमान हादसे की जिम्मेदारी सीधे स्थानीय अथाॅरिटी, प्रशासन और एयरपोर्ट अथाॅरिटी ऑफ इंडिया की बनती है। जिम्मेदार टाॅप अधिकारियों पर केस दर्ज होना चाहिए, हादसे में हताहत बेकसूर हवाई यात्रियों की हत्या का मुकदमा होना चाहिए। मृतकों में मुआवजा राशि बांटकर घोर लापरवाही और मुंह खोले खड़ी कमियों पर पर्दा नहीं डालना चाहिए।

कुछ भी हो, कोझिकोड विमान हादसे ने हवाई यात्राओं की सुरक्षाओं की विश्वसनीयता खतरे में जरूर डाल दिया है। देश हो या विदेश हर जगह से समस-समय पर विमान दुर्घाटनाओं की खबरें आती रहती हैं। हवाई हादसे अब रेल हादसों की तरह आम होते जा रहे हैं। कोझिकोड हादसे के पूर्व की ज्यादातर घटनाओं में भी मानवीय व तकनीकी चूक सामने आई है। इसलिए अब हवाई सफर पूरी तरह रामभरोसे हो गया है। विमान घटनाओं के बाद जब जिम्मेवारी लेने की बात आती है तो सरकारें ये कहकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं कि इसमें निजी विमान कंपनियों की हिमाकत है। सीधे तौर पर सरकारें घटना की जिम्मेदारी अपने सिर नहीं लेती।

हवाई यात्रियों के जेहन से किसी एक घटना का डर निकल भी नहीं पाता, दूसरी घटना हो जाती है। काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भी कोझिकोड की तरह लैंड करते वक्त बांग्लादेश का विमान फिसला था जिसमें 58 यात्री मरे थे। संसार भर में खतरों की समीक्षा पर आधारित सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो सुरक्षा पद्धतियों को लगातार रूप से उन्नत तथा पुनः परिभाषित करते रहते हैं, पर नतीजा वही ठाक के पात। अल्जीरिया विमान हादसे के बाद भारतीय विमानन कंपनियों ने कुछ सकर्तता दिखाई थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, सतर्कता भी फुस्स हो गई।

एविएशन क्षेत्र में भारत आज भी दूसरे देशों से काफी पीछे है। नए विमानन नियम, नई सहूलियतें, आधुनिक तामझाम, यात्रा में सुगमता की गारंटी और भी कई तमाम हवाई कागजी बातें उस समय धरी रह जाती हैं, जब बड़े प्लेन हादसों की खबरें आ जाती हैं। पिछले वर्ष इन्हीं दिनों में दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रनवे पर भी आमने-सामने एक साथ दो विमानों के आने से बड़ा हादसा होते-होते बचा था। इसे एटीएस का गलती कहें या विमानन कंपनियों की तकनीकी नाकामी, या फिर पायलटों की लापरवाही? कुछ भी हो इन हिमाकतों के बाद यात्रियों की जिंदगी दांव पर जरूर लग जाती हैं? हरियाणा के चरखी विमान हादसे को शायद ही कोई भूल पाए, याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस हादसे को भारत में अबतक का सबसे बड़े हवाई हादसे में गिना जाता है। घटना 12 नवंबर, 1996 में घटी थी, जब दो विमानों में मिड एयर कॉलिजन हुआ, एक विमान सऊदी अरब का था, तो दूसरा कजाखिस्तान का। उस हादसे में दोनों विमानों में सवार सभी 349 यात्रियों में से कोई जिंदा नहीं बचा।

कोझिकोड़ एयरपोर्ट एक नज़र में

  • कोझिकोड़ एयरपोर्ट 13 अप्रैल 1988 को खोला गया था।

  • टेबल टॉप एयरपोर्ट में इसका नाम उल्लेखित है।

  • एयरपोर्ट के दोनों तरफ तीस फीट की गहरी खाई है और अन्य एयरपोर्ट्स की तुलना में रनवे काफी छोटा है।

  • फरवरी 2006 में इसे अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का टैग हासिल हुआ।

  • कोझिकोड़ एयरपोर्ट को केरल का तीसरा एवं भारत का 11वां सबसे व्यस्ततम एयरपोर्ट माना जाता है।

  • 2017 में रनवे की लंबाई को 240 मीटर तक बढ़ाया गया था। 

  • रनवे छोटा होने के कारण यहां बड़े विमानों का परिचालन नहीं किया जाता है। 

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