दिशाहीन होती कांग्रेस को कौन संभालेगा ?

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

सचिन पायलट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खेमों के बीच लड़ाई करीब एक महीने तक चली और इसकी वजह से दोनों खेमों का बहुत नुकसान हुआ। पायलट को उप-मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के महत्वपूर्ण पदों से हाथ धोना पड़ा और गहलोत की सरकार गिरने के कगार पर पहुंच गई थी।

अब राहुल गांधी से मुलाकात के बाद सचिन पायलट ने एक बार फिर से कांग्रेस में वापसी का फैसला लिया है। पायलट के बगावत के बाद अटकलें लगाई जा रही थी कि मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह पायलट भी कांग्रेस को अलविदा कह सकते हैं, लेकिन पायलट ने पार्टी के प्रति अपनी ईमानदारी और निष्ठा का परिचय देते हुए कहा कि पार्टी छोड़ने का इरादा उनका कभी था ही नहीं। 

इससे दो बातें साबित होती है, पहली बात यह कि पार्टी में आलाकमान और नेताओं की तालमेल में कमी है और दूसरी पार्टी को नए मुखिया की जरूरत है। इस बात पर सहमति जताते हुए पिछले दिनों कांग्रेस के वरीष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने कहा कि कांग्रेस को एक पूर्णकालिक अध्यक्ष की जरूरत है। देखा जाए तो यह सच है कि कांग्रेस को उसके दिशाहीन होने की अवधारणा को तोड़ने के लिए पूर्णकालिक अध्यक्ष खोजने की प्रक्रिया तेज करने की आवश्यकता है। मौजूदा हालातों को देखते हुए, और पार्टी में चल रहे उथल-पुथल को देखते हुए सोनिया गांधी से अनिश्चितकाल के लिए अंतरिम प्रमुख का बोझ उठाने की उम्मीद करना अनुचित है।  

कुछ राजनीतिक जानकार कहते हैं कि राहुल गांधी में वह दम और काबिलियत है कि वह पार्टी का फिर से नेतृत्व कर सकते हैं। हालांकि, अगर राहुल फिर अध्यक्ष नहीं बनना चाहते तो कांग्रेस को नया अध्यक्ष चुनने की कवायद शुरू कर देनी चाहिए। बता दें कि पिछले लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद सोनिया गांधी को अंतरिम कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। 

यह बातें पार्टी के दिग्गज नेताओं की ओर से तब सामने आ रही हैं, जब सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष के रूप में एक साल का कार्यकाल पूरा करने वाली हैं। उन्हें पिछले साल 10 अगस्त को राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कमान सौंपी गई थी। 

पार्टी के राजस्थान में भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि गहलोत और पायलट के बीच की दूरियां कितनी कम हुई हैं। खबरें आ रही थी कि पायलट लंबे समय से गहलोत द्वारा नजरअंदाज किए जाने की शिकायत कर रहे थे और खुद अपने लिए मुख्यमंत्री पद की मांग कर रहे थे। स्पष्ट है कि उनकी यह मांग तो मानी नहीं गई है। दूसरी तरफ गहलोत ने तो सार्वजनिक रूप से पायलट को निकम्मा और षडयंत्रकारी दिमाग वाला तक कह दिया था। इतने वैमनस्य के बाद पार्टी इन दोनों नेताओं के बीच सामंजस्य कैसे बनाएगी? माना जा रहा है कि पायलट को राज्य के बाहर पार्टी में कोई केंद्रीय जिम्मेदारी दी जाएगी ताकि दोनों नेता अलग अलग काम कर सकें और एक दूसरे के रास्ते में नहीं आएं। लेकिन यह व्यवस्था आखिर कब तक सुचारु रूप से चल पाएगी, यह तो भविष्य ही बताएगा।

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