महंगे अस्पतालों में केवल मंत्री जी करवाएंगे इलाज

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश का हाल बेहाल है, नेता जी खुशहाल हैं। ये बात कुछ सोच समझ कर ही यहां कही जा रही है। कही इसीलिए गई है क्योंकि देश के कोने कोने से ख़बरें ही ऐसी आ रही है कि लोगों की रूह कांप जाए लेकिन नेता जी का हाल दुरुस्त है। कहने का तात्पर्य ये है कि देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां कोरोना महामारी से जूझते लोगों की भयावह तस्वीरें सामने आ रही है। ज्यादातर लोगों की परेशानी एक ही है - उन्हें एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकना पड़ रहा है। वो इसीलिए क्योंकि अस्पतालों में बेड खाली नहीं है। तेजी से फैलते कोरोना वायरस की वजह से स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में कोरोना के मरीज़ भर चुके हैं, जिसकी वजह से लोगों को अस्पतालों बेड मिल नहीं पा रहा है। इसी गंभीर परिस्थिति की वजह से अब तक कई लोगों ने अपनी जान तक गवा दी है। 

हालांकि इस परिस्थिति की दूसरी छवि देख कर ही मैं ऊपर की पंक्तियां कहने को विवश हो गया। देश के कई राज्यों एवं केंद्र के नेताओं के भी कोरोना संक्रमण की बातें सामने आ रही है, लेकिन उनके लिए कोरोना महामारी से लड़ना इतना मुश्किल नहीं है, जितना एक आम आदमी के लिए है। क्योंकि आम आदमी को या तो एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, या फिर निजी अस्पतालों द्वारा भारी भरकम बिल थमाए जाने की चिंता से उनकी परेशानियां दोगुनी हुए जा रही है। बीते दिनों तमाम सुरक्षा होते हुए भी कई बड़े नेताओं को कोरोना महामारी ने जकड़ लिया। इनमें मुख्य रूप से केंद्रीय मंत्रियों समेत मध्य प्रदेश, कर्नाटक, असम, यूपी, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों के मंत्री कोरोना संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन नेताओं को कोरोना संक्रमण का पता चलते ही निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया और इलाज में तत्परता होने की वजह से कई नेताओं को स्वस्थ होने के बाद घर भेज दिया गया। समझ ये नहीं आया जब सरकार द्वारा क्षेत्रीय विकास के मुद्दे पर सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता की कहानी कही जाती है, तो बीमार होने पर उन्होंने सरकारी अस्पतालों को छोड़ कर निजी अस्पतालों का रूख क्यों किया। क्या इसे उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं देखा जा सकता। या फिर इसका मतलब ये है कि नेताओं को खुद यकीन नहीं है कि जिस प्रकार की सुविधा उन्हें चाहिए वो सरकारी अस्पतालों में मिल भी पाएगी या नहीं। 

महंगे या निजी अस्पतालों में नेताओं के जाने पर प्रश्न केवल इसीलिए उठाया जा रहा है क्योंकि सरकारी अस्पतालों को इतनी महत्ता नहीं दी जा रही, जितनी इस कोरोना काल में दी जानी चाहिए। देश का हर आम आदमी परेशान है। इस महामारी से लड़ने के लिए एकजुट होने की कहानी कह कर नहीं बल्कि एक लाइन में खड़े होकर लड़नी होगी। जिस प्रकार नेताओं को जनता ने चुन कर सत्ता की कुर्सी पर बैठाया है उसी प्रकार से मंत्री जी को भी जनता के हित के बारे में सोचते हुए सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था को भी दुरुस्त करना चाहिए, ताकि आने वाले दिनों में कोरोना महामारी से लड़ने के लिए देश का हर आम आदमी खुद को सक्षम समझ सकें।

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