सालाना बाढ़ : त्रासदी या अवसर

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

आज हम देश में आए बाढ़ की विभीषिका पर बात करेंगे। लेकिन आप सोचेंगे भारी बारिश की वजह से बाढ़ तो हर साल ही आता है, इस पर फिर से चर्चा की क्या जरूरत। तो आपको बता दें कि जरूरत है। जरूरत, बाढ़ से संबंधित जानकारी को जानने का है। आपको ये पता होना चाहिए कि सालाना बाढ़ को आज एक त्रासदी के रूप में देखा जा रहा है या फिर अवसर के रूप में? आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि सालाना बाढ़ को अब देश के नेताओं ने सालाना धन बटौरने के एक बेहतरीन अवसर के रूप में देखना शुरू कर दिया है। एक ओर परियोजनाएं ठप पड़ी है, लाखों लोगों के घर उजड़ रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर नेताओं के जेब और अधिक गर्म हो रहे हैं। इसके बाद आपके जहन में कुछ सवाल आएंगे। क्या हर वर्ष बाढ़ के पहले जरूरी तैयारियाँ नहीं की जा सकती? क्या लाखों लोगों को बाढ़ के प्रकोप से बचाया नहीं जा सकता? क्या बाढ़ में प्रभावित होने वालों को आवंटित राशि प्रत्यक्ष रूप से मिल पाती है? आज के लेख में हम अपने पाठकों को बताएंगे कि कैसे नेता बाढ़ तो एक त्रासदी के रूप में नहीं बल्कि एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। आने वाले दिनों में बिहार में चुनाव होने हैं, ऐसे में बिहार बाढ़, बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को कैसे बदल देगा यह देखना काफी दिलचस्प होगा। 

क्या होता है बाढ़ का मुख्य कारण, क्या लगा नहीं सकते पूर्वानुमान

देश में बाढ़ से हर साल तबाही होती है और इस बाढ़ से जानमाल का भी बहुत नुकसान होता है। देश में कम से कम दस ऐसे क्षेत्र हैं, जहां प्रतिवर्ष बाढ़ का आना लगभग तय माना जाता है लेकिन अगर बाढ़ के कारण सारे देश में हाहाकार मचा हो तो इन क्षेत्रों में मौसमी विनाश की कल्पना कर पाना भी संभव नहीं है। पिछले कुछ दशकों के दौरान उत्तर और मध्य भारत जैसे क्षेत्र में भी लोग मूसलाधार बारिश और एकाएक बड़ी मात्रा में बारिश होने, बादल फटने की घटनाओं से सामना करने लगे हैं। देश में ज्यादातर नदी के किनारों और नदियों के डेल्टाओं में बाढ़ भारी कहर बरपाती है। खबरों के मुताबिक, इस वर्ष असम और बिहार में आई बाढ़ से करीब सैंकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। भारत तीन ओर से समुद्रों (अरब सागर, हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी) से घिरा है। भारत के ज्योलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया का कहना है कि इस कारण यह देश बाढ़ की विभीषिका को लेकर संवेदनशील है और समूचे देश में ऐसे इलाके हैं, जो कि हर वर्ष बाढ़ का सामना करते हैं। देश में ऐसे कुल इलाकों की संख्या 12.5 प्रतिशत है।

भारतीय मौसम विभाग से जुड़े वैज्ञानिक डॉक्टर मृत्युंजय मोहापात्रा कहते हैं, बाढ़ के लिए कई कारक ज़िम्मेदार होते हैं। इनमें जलाशयों की संचयन क्षमता, ज़मीन में नमी की मात्रा, नदी में अलग-अलग जगहों पर पानी का स्तर, नदी रोकने के लिए बनाए गए बांधों की मज़बूती और नदी के तंत्र में आने वाली कृत्रिम रुकावटें शामिल हैं। मौसम का पूर्वानुमान करने के मामले में भारत की क्षमता अपने पड़ोसी देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा है। भारतीय मौसम विभाग अपने उपग्रहों और रडार स्टेशनों की मदद से आगामी पांच दिनों तक के मौसम का पूर्वानुमान करने में सक्षम है। इसके साथ ही बारिश की मात्रा से जुड़े आंकड़े भी हासिल हो जाते हैं। सरकार के पूर्वानुमान और निगरानी विभाग के अंतर्गत 226 फील्ड स्टेशन हैं, जो बड़ी-बड़ी नदियों के जल स्तर पर नज़र रखते हैं। लेकिन इन विभागों का ज़्यादातर काम 19 बड़ी नदी घाटियों पर केंद्रित है।

सरकारी विभागों में भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ती परियोजनाएं 

कोसी परियोजना शुरू में 100 करोड़ रुपए की परियोजना थी। जिसे 10 सालों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। जानकार कहते हैं, कोसी परियोजना को लेकर जो भी असल में काम हुआ था, इन्हीं 10 सालों के दौरान हुआ। चाहे वह कोसी के दो तरफ़ तटबंध बनाकर पानी को मोड़ना हो, पूर्वी और पश्चिमी कैनाल बनाकर सिंचाई की व्यवस्था करनी हो, या फिर कटैया में पनबिजली घर का निर्माण। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि, उसके बाद के सालों में मरम्मत, नए निर्माण, बाढ़ राहत और बचाव के नाम पर जम कर पैसे का बंदरबांट हुआ। लगभग हर साल इस मद में फंड पास होता है, एस्टिमेट बनता है, लेकिन काम क्या होता है? ये किसी को नहीं पता। क्योंकि सरकार के कई विभागों में पारदर्शिता न होने की वजह से परियोजनाएं कहां तक पहुंची और उनका स्टेटस अभी क्या है इसका पता लगाना बेहद मुश्किल है। राजनीतिक बुद्धिजीवियों का कहना है कि परियोजनाओं को धरातल पर लाने का कार्य सरकारी तंत्र का होता है लेकिन समस्या यह है कि इन मामलों में न तो केंद्र सरकार स्पष्ट रूप से सवाल करती है और न ही राज्य सरकार स्पष्ट उत्तर देते हैं। वैसे भी सरकारी विभागों में पल बढ़ रहे भ्रष्ट तंत्र की वजह से ऐसे कई परियोजनाएं केवल कागजों में ही सिमट कर रह गया है।  

जानकार बताते हैं कि यदि तटबंधों का मरम्मत और बाढ़ से निपटने की तैयारियां पहले कर ली जाए तो फिर वे टूटेंगे कैसे? सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार अगर पिछले कुछ सालों के दौरान कोसी परियोजना के अंतर्गत बड़े कामों का ज़िक्र करें तो दो योजनाएं बनायी गईं। पहली योजना बाढ़ राहत और पुनर्वास की थी। जिसके तहत विश्व बैंक से 2004 में ही 220 मिलियन अमरीकी डॉलर का फंड मिला था। उससे तटबंधों के किनारे रहने वाले बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए पक्का घर बनाए जाने थे और ज़मीन देनी थी। कुल दो लाख 76 हज़ार लोगों को चिह्नित किया गया था जिनके मकान बनने थे। बिहार सरकार के योजना विकास विभाग ने इस काम को करने का लक्ष्य 2012 रखा। पहले चरण में कुल 1 लाख 36 हज़ार मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया। लेकिन 2008 में कुसहा के समीप तटबंध टूटने से त्रासदी आ गई। पहले चरण का काम 2012 तक भी पूरा नहीं हो पाया। पिछले साल यानी 2018 तक काम चलता रहा। लेकिन मकाम बन पाए मात्र 66 हज़ार के क़रीब। पहले चरण के बाद अब उस योजना को बंद कर दिया गया है। बाक़ी का पैसा क्या हुआ? बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, किसी को नहीं पता क्या हुआ पैसा? हां, 2008 की त्रासदी के बाद वीरपुर में कौशिकी भवन का निर्माण किया गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस आलीशान भवन से उद्घाटन के समय कहा था कि यहीं से पूरे कोसी क्षेत्र के बाढ़ पर नज़र रखी जाएगी, लेकिन आप जा कर देखिए कौशिकी भवन में तो आपको समझ में नहीं आएगा कि आख़िर इतनी बड़ी इमारत किसके लिए बनायी गई थी। कोई काम करने वाला ही नहीं है उधर।

जब कौशिकी भवन पहुंचे तो सच में हमें वहां कोई अधिकारी नहीं मिला। इक्के-दुक्के कर्मचारी थे जो इधर-उधर घूम रहे थे। पूछने पर पता चला कि साहेब लोग साइट पर गए हैं। कोसी नवनिर्माण मंच के संस्थापक महेंद्र यादव कहते हैं कि, वास्तव में कौशिकी भवन 2008 की कुसहा त्रासदी के बाद मरे हुए लोगों के लिए बनाया गया एक स्मारक है। जो बनाया तो गया था बाढ़ रोकने के लिए और पुनर्वास सुचारू करने के लिए, मगर अब केवल नाम के लिए रह गया है। वर्ल्ड बैंक की वेबसाइट से पता चला कि अभी भी कोसी क्षेत्र में बिहार कोसी बेसिन डेवलेपमेंट प्रोजेक्ट नाम से एक योजना चालू है। 2015 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य 2023 रखा गया है। यह कुल 376 मिलियन अमरीकी डॉलर का प्रोजेक्ट है। इसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ के संभावित ख़तरे से निपटना है तथा जल का वितरण कर कोसी क्षेत्र के किसानों के लिए सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करानी है। रिपोर्टिंग के दौरान कई जगहों पर तटबंधों की मरम्मती होती दिखी। स्थानीय इंजीनियरों ने बताया कि यह काम इसी योजना के अंतर्गत चल रहा है। ऐसे में जब कोसी का पानी तटबंधों को तोड़ने लग गया हो, सभी जगह तटबंधों के पानी ने छू लिया है, तब मरम्मत का काम करने का मतलब क्या है?

बाढ़ आया यानि सरकारी खजाने की लूट

देश के कई राज्य हैं जहां बाढ़ की विभीषिका स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इन राज्यों में बिहार और असम प्रमुख हैं। बाढ़ की विभीषिका को नियंत्रित करने के लिए सरकार हर साल सरकारी खज़ाने के हजारों करोड़ों रुपए को बाढ़ पीड़ितों को आवंटित करती है और इस दौरान एक बड़ी राशि की निकासी की जाती है। विभिन्न आपदाओं में अगर केवल बाढ़ की बात करें तो केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा फंड एकत्रित किया जाता है। कहीं प्रधानमंत्री राहत कोष के नाम से तो कहीं मुख्यमंत्री राहत कोष के नाम पर। हालांकि ये पैसे लोगों तक कितना पहुंच पाता है इसकी कोई ठोस जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है। जानकारी मांगे जाने पर एक विभाग से दूसरे विभाग के केवल चक्कर कटवाए जाते हैं। इस फंड को मॉनिटॉरिंग करने के लिए एक समीति का निर्माण किया जाना चाहिए जहां, लोग बाढ़ पीड़ियों को आवंटित राशि की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सके।

कहीं बाढ़ न बहा ले जाए नीतिश सरकार को 

राजनीति में कई प्रकार के गणित एक साथ कार्य करते हैं। ऐसे में कोरोना वायरस महामारी के दौरान भी प्रधानमंत्री राहत कोष के नाम पर भारी संख्या में फंड इकट्ठा किया जा चुका है। वहीं बाढ़ के बाद से विभिन्न मोबाइल भुगतान गेटवे पर भी बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत कोष संबंधी अकाउंट खोले जा चुके हैं। यहां गौर करने वाली बात ये है कि क्योंकि इससे एकत्रित राशि को कभी सार्वजनिक नहीं किया जाता है, इसी वजह से ये पता लगाना भी मुश्किल है कि इतनी बड़ी राशि का इस्तेमाल कहां किया जाता है। मालूम हो कि आने वाले दिनों में बिहार में चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में खबरें आती है कि पार्टियों द्वारा बड़ी मात्रा में पैसों का इस्तेमाल भी किया जाता, लेकिन ये पैसे आते कहां से हैं इसका कोई अंदाजा नहीं है। बिहार में बाढ़ और रोजगार को गंभीर राजनीतिक मुद्दें के रूप में अंकित किया जाता है। ऐसे में पिछले 15 वर्षों से बिहार की जनता नीतिश कुमार के शासन को परख रही है। कहीं ऐसा न हो कि हर साल आता बाढ़ इस बार नीतिश सरकार को ही बहा ले जाए।

जनता के पैसों का हिसाब नहीं जनता को

इसी पोर्टल के मुताबिक 2006 में नितीश कुमार के नेतृत्व में गठित बिहार सरकार ने इतना काम जरूर किया कि जमींदारी और महाराजी तटबन्धों के रख-रखाव का काम औपचारिक रूप से जल संसाधन विभाग को सौंप दिया। इस पहल का परिणाम का परिणाम क्या निकला, ये आज जग ज़ाहिर है। जब जमींदारी खत्म कर दी गई तो उसकी सारी सम्पत्ति और जिम्मेवारी सरकार की हो गई फिर जिम्मेवारी से इतने वर्षो तक आँखें क्यों मोड़ी गई और अगर यह तटबन्ध रेवेन्यू विभाग के थे तो क्यों नहीं यह बात बरसात के पहले बताई जाती थी और क्यों जनता को यह नहीं बताया जाता था कि बाढ़ की स्थिति में अमुक-अमुक अफसर से सम्पर्क किया जाना चाहिए जो रेवेन्यू विभाग का है, यह जिम्मेवारी उसी की है। क्या कभी बिहार सरकार यह भी बतायेगी कि बिहार की कुल 68.8 लाख हेक्टेयर जमीन में से 29 लाख हेक्टेयर की बाढ़ से सुरक्षा की जिम्मेवारी उसकी है मगर क्या बाकी 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्रा पर बसे लोगों से यह कहा जाए कि अब बाढ़ से आप खुद निपट लीजिए, हमारी कोई जिम्मेवारी नहीं है और क्या वह उन इलाकों को चिन्हित करेगी जहाँ वह यह जिम्मेवारी लेने से मना करती है। इसके साथ ही अगर उस 29 लाख हेक्टेयर क्षेत्रा पर, जिसे सरकार अपनी तरफ से बाढ़ से सुरक्षित मानती है, बाढ़ से जान-माल का कोई नुकसान होता है तो क्या सरकार इसकी क्षतिपूर्ति करेगी।

बाढ़ के पहले क्या होनी चाहिए तैयारी

बाढ़ प्राकृतिक आपदा हो सकती है। विकास प्रक्रिया के कतिपय दोषों के कारण इसका स्वरूप विकराल भी हो सकता है, लेकिन इस पर नियंत्रण करने का कार्य कठिन होते हुए भी, असंभव नहीं है। सुव्यवस्थित आयोजन एवं कार्यनीति को अपना कर ऐसी परिस्थितियां पैदा की जा सकती हैं कि बाढ़ एवं जल आप्लावन की स्थिति उत्पन्न ही न हो। अब तो ऐसी टेक्नोलाॅजी का विकास हो गया है जिसका प्रयोग करके दो या तीन दिन पूर्व ही अधिकाधिक वर्षा होने या बाढ़ आने की चेतावनी देकर लोगों को बाढ़ के खतरों से बचाया जा सकता है तथा बहुत बड़ी सीमा तक बाढ़ से होने वाली क्षति को न्यूनतम किया जा सकता है। लेकिन देश की सरकार और राज्य सरकारों द्वारा बाढ़ पर काबू करने संबंधी एहतियात केवल योजनाओं का रूप लेकर ठप हो जाती है। प्रत्येक वर्ष बजट के वक्त बाढ़ नियंत्रण और उस पर काहबू पाने संबंधी योजनाओं उल्लेख किया जाता है लेकिन इनमें से ज्यादातर योजनाएं कागजों पर भी रह जाती है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग हर वर्ष बाढ़ की वजह से हजारों लोगों की मौत हो जाती है। बाढ़ की चपेट में आकर मरने वालों के लिए केंद्र व राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बस इतनी है कि मृतकों के परिवार वालों को मुआवज़ा दे दिया जाता है। 

क्या कहते हैं दुनिया के वैज्ञानिक?

आंकड़ों को हासिल करने की क्षमताएं हर देश में अलग-अलग होती हैं और कुछ देश सामान्य नियमों का पालन भी नहीं करते हैं। इसके साथ ही कुछ देशों के पास ऊंची क्षमता वाले कंप्यूटर भी नहीं होते हैं, जिससे वह ठीक-ठीक पूर्वानुमान लगा सकें। हालांकि, वैज्ञानिकों के मुताबिक़, ज़्यादातर देशों के पास मौसम, हाइड्रोलॉजी और इंसानी गतिविधियों के प्रभाव से जुड़ी जानकारी होती है लेकिन वे हमेशा इन सभी पहलुओं को मिलाकर एक बड़ी तस्वीर नहीं देखते हैं।

सयुंक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 1995 से 2015 तक प्राकृतिक आपदाओं से मारे गए 1,57,000 लोगों में से आधे लोगों की मौत के लिए बाढ़ ज़िम्मेदार थी। ऐसे में बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठोस क़दम उठाए जा रहे हैं, जिससे बाढ़ प्रभावित देशों की मदद की जा सके। विश्व मौसम विभाग इस समय 60 देशों के साथ मिलकर बाढ़ पूर्वानुमान क्षमताओं का विकास करने के काम पर लगा हुआ है। हर साल बाढ़ की वजह से पांच हज़ार लोगों की जान जाती है। विश्व मौसम विभाग की हाइड्रोलॉजिकल फोरकास्टिंग एंड रिसोर्स डिविज़न के प्रमुख अधिकारी पॉल पिलन कहते हैं, हम कई उपग्रहों से बारिश के आंकड़े और मौसम का पूर्वानुमान देंगे और हमारी इस परियोजना से जुड़े सदस्य देश इस जानकारी को स्थानीय स्तर पर हासिल किए गए आंकड़ों से मिला सकते हैं, ताकि ठीक आकलन किया जा सके। हाई रिजोल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरें स्थानीय प्रशासन को नदी के रास्ते में हो रहे परिवर्तन की जानकारी देंगी। इस परियोजना का उद्देश्य बारिश, तापमान, जल के बहाव, मिट्टी में नमी के स्तर और दूसरे कारकों से जुड़े आंकड़े देना और सदस्य देशों से ट्रांसनेशनल नदियों से जुड़ी जानकारी साझा करना है। इस परियोजना पर अभी काम चल रहे है और ये छह महीने में शुरू होगी।

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