तो कैसे भरेगा सरकारी खजाना !

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)

केंद्र की भाजपा सरकार को कई कार्यों के लिए सराहना भी मिलती है तो कई कार्यों के लिए निंदा का भी सामना करना पड़ता है। केंद्र सरकार पिछले कुछ वर्षों में सरकारी खजाने को भरने में विपरीत दिशा में कार्य किया है। दरअसल हम बात कर रहे हैं, देश के टेलीकॉम कंपनियों से वसूले जाने वाले रकम की, जो यूं तो राजस्व का एक बड़ा हिस्सा है, लेकिन इस पर सरकार का ध्यान थोड़ा ढीला है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भारत की टेलीकॉम कंपनियों पर कड़ा रूख इख़्तियार करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले के तहत गुप्त रूप से व्यवसाय कर रही टेलीकॉम कंपनियों को टेलीकॉम्युनिकेशन विभाग को करीब आठ प्रतिशत सूद के साथ करीब 1 लाख 47 हजार करोड़ का भुगतान करने को कहा गया। वर्ष 1999 में कंपनी ने भुगतान करने में असमर्थता का हवाला देते हुए केवल तय लाइसेंस फीस देने का निर्णय लिया था और अब 21 वर्षों बाद कंपनी राजस्व साझाकरण करने को तैयार हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने अजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू मामले की सुनवाई करते हुए आदित्य बिड़ला ग्रुप की टेलिकॉम कंपनी वोडाफोन आइडिया को सख्त चेतावनी दी और यहां तक कहा कि अब वो कंपनी के अधिकारी को जेल भेज देगा। उधर, कंपनी की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को बताया कि वोडाफोन आइडिया ने पिछले 15 वर्षों में जितना रेवेन्यू हासिल किया वो सब खत्म हो चुका है। ऐसे में एजीआर की रकम तुरंत चुकाना उसके बूते के बाहर की बात है। टेलिकॉम डिपार्टमेंट वोडाफोन आइडिया पर करीब 58 हजार करोड़ रुपये के बकाया का दावा कर रहा है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना आदेश 10 अगस्त तक के लिए टाल दिया है।

मालूम हो कि वर्ष 1999 में इस स्विच ओवर के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने कंपनी पर करीब 42 हजार करोड़ का जुर्माना लगाया था। टेलीकॉम कंपनियां सरकार के साथ राजस्व साझा करने के लिए तैयार थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने इसे 21 साल तक टाला। 

1999 की एनटीपी नीति के अनुसार शर्तों को पूरी तरह से स्वीकार किया जाना है, और लाइसेंस समझौते से संबंधित किसी भी विवाद को किसी भी भविष्य की तारीख में नहीं उठाया जाना था। पैकेज की स्वीकृति को पूर्ण और अंतिम निपटान माना जाना था। और इसके बाद लाइसेंस समझौते में संशोधन को टेलीकॉस्ट द्वारा हस्ताक्षरित करना पड़ा।

टेलीकॉम क्षेत्र के दिग्गजों द्वारा सकल राजस्व की वैधता के संबंध में जो आपत्तियां पूरी तरह से अपरिहार्य थीं और उसके सीधे तौर पर अस्वीकार किए जाने के लिए उत्तरदायी थे,अंत में अस्वीकार कर दिया गया था। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2011 में ही, इसके दस साल और सेलुलर ऑपरेटर अभी भी विवादित करार दिया था। एयरटेल, वोडाफोन - आइडिय़ा को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद भुगतान के लिए प्रावधान करना चाहिए था। हालांकि, उन्होंने कभी भी खातों की किताबों में इसके लिए भुगतान या प्रावधान नहीं किया।

यहां समझने वाली बात यह है कि जिस केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल के दामों को लगातार बढ़ाकर देश की जनता को परेशान किया जा रहा है, उसी सरकरार द्वारा इन टेलीकॉफ माफिया को क्यों बचाया जा रहा है। जो पैसे सरकारी राजस्व में एकत्रित होते हैं, उनका इस्तेमाल जनता के हित में किया जाता है, लेकिन अगर सरकार इन  माफिया को देश में फलने फूलने देगी तो कहीं ऐसा न हो कि एक दिन ऐसा आए जब देश का खजाना इनके तिजोरी में जमा हो। हो न हो इसके पीछे सरकार के कुछ निजी कारण ही होंगे, जिसका सीधा फायदा हमें चुनावों में देखने को मिले।

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