चीन की बौखलाहट का क्या है ठोस कारण - चीन पर है डेटा चोरी का संदेह - भारत में चीन के 59 एप बैन

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

 एक तरफ कोरोना महामारी ने पुरी दुनिया को ठहराव पर ला दिया है। दूसरी तरफ चीन के साथ एलएसी पर झड़प ने अब धीरे धीरे अलग रूप लेने लगा है। दोनों देश की सरकारें अब मामले को सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय ताकत का इस्तेमाल करने पर जोर दे रही है। वहीं चीन अपने औद्योगिक ताकतों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजनाएं बनना रहा है। ऐसी खबरें आ रही हैं कि चीन द्वारा भारत के सरकारी वेबसाइट पर साइबर अटैक करने को लेकर चीन पुरी तरह से तैयार है। इस बीच चीन से सरहद पर तनातनी के बीच बीते सोमवार को भारत सरकार ने 59 ऐप्स बंद करने की घोषणा की है। इन ऐप्स में लोकप्रिय सोशल प्लेटफ़ॉर्म टिकटॉक, वीचैट अलीबाबा ग्रुप का यूसी ब्राउज़र भी शामिल हैं. सवाल ये है कि क्या सरकार ने ये फ़ैसला देरी से लिया?सरकार की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहीं पर भी चीन का ज़िक्र नहीं है, लेकिन जिन ऐप्स को प्रतिबंधित किया गया है, उनमें से कई सारे ऐप्स या तो चीन में बने हैं या उनका स्वामित्व चीनी कंपनियों के पास है। भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि उन्हें कई स्त्रोतों से इन ऐप्स को लेकर शिकायत मिली थी। एंड्रॉयड और आईओएस पर ये ऐप्स लोगों के निजी डेटा में भी सेंध लगा रहे थे। इन ऐप्स पर पाबंदी से भारत के मोबाइल और इंटरनेट उपभोक्ता सुरक्षित होंगे। यह भारत की सुरक्षा, अखंडता और संप्रभुता के लिए ज़रूरी है। सरकार भले ही डेटा सुरक्षा या उपभोक्ताओं के हित की बात करे लेकिन सभी यही कह रहें हैं कि सरकार ने ये फ़ैसला भारत-चीन के बीच मौजूदा सीमा विवाद के मद्देनज़र लिया है।

सोशल मीडिया पर चीन के सामान का बहिष्कार करने के कैंपेन चलाए जा रहे हैं। सरकार पर भी दबाव बढ़ रहा था। भारत अब चीन के साथ आर्थिक संबंधों की समीक्षा कर रहा है और इस बैन को इसी समीक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। डेटा सुरक्षा के जानकार पूछ रहें हैं कि सरकार को अभी ही क्यों डेटा सुरक्षा की फ़िक्र हो रही है, अगर सरकार इस मुद्दे पर वाक़ई गंभीर होती तो या तो इसकी इजाज़त ही नहीं देती या फिर उस पर पहले ही बैन लगा देती। साइबर विशेषज्ञ तो बहुत पहले से सरकार को इस बात के लिए कह रहे थे।

क्या सरकार को है साइबर सुरक्षा का डर ?

भारत के इलेक्ट्रोनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के एक विभाग ने 2018 में एक रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत को साइबर सुरक्षा को सबसे ज़्यादा ख़तरा चीन से है। भारत में 35 फ़ीसद साइबर हमले चीन ने ही किए हैं. ये रिपोर्ट नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट और बाक़ी सुरक्षा एजेंसियों को भेजी गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस साल भी ख़ुफ़िया एजेंसियां चीनी ऐप्स को लेकर भारत सरकार को आगाह कर रही थीं। अमरीका की आर्मी ने भी सरकारी मोबाइल्स पर टिकटॉक बैन कर रखा है और उसके पीछे वजह साइबर सुरक्षा ही बताई गई। सरकार कह रही है कि उन्हें इन ऐप्स को लेकर शिकायत मिली थी और ये ऐप्स यूज़र्स का डेटा ले रहे थे। लेकिन 20 मार्च को ही टिकटॉक को लेकर लोकसभा में एक सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय ने बताया कि उन्हें अमरीका से भी टिकटॉक को नैगेटिव प्रभाव को लेकर कोई जानकारी नहीं मिली है। जवाब में ये भी बताया गया कि सरकार की जानकारी में ऐसा कोई इनपुट नहीं है कि टिकटॉक से कोई काउंटर इंटेलिजेंस का ख़तरा है।

अमरीका ने चीन की मोबाइल कंपनी हुआवे को भी बैन किया हुआ है। 28 जनवरी 2019 को अमरीका के डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस ने हुआवे पर बैंक फ़्राड और ट्रेड सीक्रेट चुराने का आरोप लगाया। रॉयटर्स समाचार एजेंसी की 9 सितंबर 2019 की ख़बर के मुताबिक़ ऑस्ट्रेलिया के सरकारी अधिकारियों ने भारत को भी सलाह दी थी कि वो ख़्वावे को बैन करे। लेकिन भारत सरकार ने 5G नेटवर्क के ट्रायल के लिए हुआवे को इजाज़त दे दी थी। अब भारत सरकार ने सरकारी टेलिकॉम से कहा है कि वो ख़्वावे के उपकरणों का इस्तेमाल ना करे। डेटा और साइबर सुरक्षा के कई पहलू हैं। रॉयटर्स की एक ख़बर के मुताबिक़ 2018 में फ़ेसबुक ने माना था कि वो यूज़र्स का डेटा चार चीनी कंपनियों के साथ साझा करता है जिसमें ख़्वावे, लिनोवो और ओप्पो शामिल हैं।

साइबर ख़तरों पर काम करने वाली एजेंसी साइफिरमा की 24 जून की रिपोर्ट बताती है कि पिछले कई दिनों से भारत की साइबर सुरक्षा पर ख़तरा बढ़ गया है। चीन के हैकर ग्रुप्स भारत के बड़े संस्थानों को टारगेट कर रहे हैं। ख़ुद सूचना और प्रसारण मंत्री 2015 में भी राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बता चुके हैं कि जिन देशों से भारत की साइबर सिक्योरिटी को ख़तरा है उसमें चीन टॉप देशों में हैं।तो चीन से साइबर अटैक और डेटा चोरी का ख़तरा नई बात नहीं है।

भारत में ऐप बैन को लेकर चीन का रवैय्या

चीन ने भारत सरकार के इस फ़ैसले पर चिंता जताई है। आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में टिकटॉक और म्यूजिकली के तक़रीबन 30 करोड़, लाइकी के तक़रीबन 18 करोड़, हेलो के 13 करोड़, शेयर-इट, यूसी ब्राउज़र के 12 करोड़ के आसपास यूज़र्स हैं. ये आँकड़े 2019 के हैं। इंडियन थिंक टैंक गेटवे हाउस के निदेशक ब्लाइस फ़र्नांडीज ने भारत सरकार के इस फ़ैसले पर जापानी मैगज़ीन एशियन निक्केई रिव्यू से कहा है कि इस पाबंदी से टिकटॉक की पैरंट कंपनी बाइटडांस प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि अलीबाबा और टेनसेंट चीन के डिजुटल सिल्क रूट के हिस्सा हैं। इस पाबंदी से इन ऐप्स की रेटिंग निगेटिव होगी और इसके प्रमोटरों पर भी असर पड़ेगा। चीन ने ख़ुद अपने यहां भी तो कितनी सारी कंपनी, सोशल मीडिया साइट्स बैन की हुई हैं। जैसे फ़ेसबुक, यूट्यूब, गूगल, स्पोटिफ़ीई, स्नैपचैट, ट्विटर वग़ैरह। चीन ने बहुत सारी जानी-मानी ग्लोबल न्यूज़ एजेंसियों को भी सेंसर किया है।

चीन के साथ क्या है कारोबार

ऐसी चर्चा चल रही है कि क्या दूसरे चीनी उत्पादों पर भी बैन लगाया जा सकता है। व्यवसाय और उद्योग जगत में इस बात को लेकर बहस जारी है कि ऐप पर प्रतिबंध से आगे बात कहां तक जाएगी? कहा जा रहा है कि जब बड़ी मशीनों के पार्ट से लेकर, होली के गुलाल और दवाइयों तक को तैयार करने के लिए कच्चा माल चीन से आयात हो रहा है तो इसे अचानक से ख़त्म करना कैसे संभव होगा। भारत और चीन के बीच कुल सालाना व्यापार करीब 90 अरब डॉलर का है जिसमें भुगतान संतुलन चीन के पक्ष में है, इस व्यापार में भारत करीब 70 अरब डॉलर का माल चीन से मंगाता है। इस बीच ख़बरें आ रही हैं कि सरकार एयर कंडीशनर और टीवी में इस्तेमाल होने वाले पुर्ज़ों समेत कम-से-कम 10-12 तरह के प्रोडक्ट्स पर लाइसेंसिंग सिस्टम लागू करने जा रही है ताकि उनके आयात पर रोक लगाई जा सके। कहा जा रहा है कि ये क़दम भी चीन को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। 

चीन और भारत के बीच जून महीने के शुरु में गलवान घाटी में हुई भिडंत के बाद तनाव बढ़ता जा रहा है और देश में चीन विरोधी माहौल दिख रहा है। इस घटना के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने चीन से होने वाले निवेश के नियमों में बदलाव कर दिया है, साथ ही ऑनलाइन कंपनियों से कहा गया है कि वो किसी भी प्रोडक्ट के बारे में ग्राहकों को साफ़ बताएँ कि वह कहाँ का बना है। ख़बर थी कि सरकारी टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल से कहा गया है कि वो भविष्य में चीनी माल का इस्तेमाल न करे। मगर टेलीकॉम कंपनियों के संगठन सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (सीओएआइ) ने बयान जारी किया है कि सामरिक मामलों और कॉर्पोरेट जगत से जुड़े फ़ैसलों का घालमेल न किया जाना चाहिए। एयरटेल और वोडाफ़ोन जैसी कंपनियां सीओएआइ की सदस्य हैं। 

हालांकि ऐसा नहीं है कि सरकार उद्योग और व्यवसाय जगत के नज़रिए को जानने की कोशिश नहीं कर रही है और वाणिज्य मंत्रालय ने इस बाबत इंडस्ट्री एसोसिएशनों से संपर्क भी किया है जहां इन बातों पर गर्मागर्म बहस जारी है।

डेटा चुराते चीनी एप

दर्जनों मामले हैं, जहां पर सीधे तौर से चीनी कंपनियां का हस्तक्षेप रहा है। यूसी ब्राउजर हमेशा से ही शक के दायरे में रहा है। 2017 में रक्षा मंत्रालय ने एक एडवायजरी जारी की गई थी, जिसमें लिखा था कि सेना में चीनी एप्स का इस्तेमाल बिल्कुल बंद कर दिया जाए। जवानों से कहा गया कि वे अपना मोबाइल फोन फॉर्मेट कर लें। बतौर मिश्रा, मुंबई अटैक में हेडली ने जो भूमिका निभाई थी, चीनी एप भी कुछ वैसा ही कर रहे हैं। जब ये पकड़े जाते हैं तो इनके बड़े पदाधिकारी कानून के सामने नहीं आते। एक ऐसे ही केस में यूसी ब्राउसर के इंडिया एवं इंडोनेशिया हेड डेमोन सी के खिलाफ पांच गैर जमानती वारंट जारी हुए, लेकिन वे अदालत में पेश नहीं हुए। एसबीआई और एलआईसी के लिंक यूसी ब्राउजर पर चल रहे थे। केंद्र सरकार में सिक्योरिटी एजेंसी से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि खुफिया एजेंसियां अब पूरी तैयारी के साथ इन एप की जांच में जुट गई हैं। सभी मंत्रालय कम से कम दो तीन साल पहले तक का अपना डाटा चेक करेंगे। सैन्य प्रतिष्ठान भी अपनी आईटी पॉलिसी में बदलाव ला रहे हैं। देश में मौजूद चीनी कंपनियों के अधिकारियों से डाटा चोरी को लेकर जल्द पूछताछ शुरू हो सकती है।

इन एप्स में मुख्य रूप से यूसी ब्राउजर, टिकटॉक, म्यूजिकली, ट्रूकॉलर, शेयर इट, शेयर चैट, शीन, क्लब फैक्टरी आदि मुख्य हैं।  

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