टीआरपी के खेल में मीडिया और राजनेता सबसे आगे

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

भारत में कोरोना वायरस के बढ़ते मामले। चीन और भारत के बीच तनाव भरा माहौल। भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का असंवेदनशील न्यूज़ कवरेज। और नेता का एक दूसरे पर कीचड़ उछाला जाना। इन सभी बातों से एक आम नागरिक परेशानी और गंभीर चिंताओं के बीचो बीच फंसा हुआ है। एक समय था जब किसी भी देश में मीडिया की भूमिका को श्रेष्ठ माना जाता था, क्योंकि उस समय तक मीडिया द्वारा देश हित में कई जानकारियां प्रसारित की जाती थी। लेकिन समय बदला और उसके साथ ही मीडिया की भूमिका भी बदल गई। आज मीडिया का खेल केवल टीआरपी पर निर्भर करता है। ब्रेकिंग न्यूज़ की दौड़ में मीडिया देश सुरक्षा की अनदेखी करते हुए अपने दायित्वों को भूलती जा रही है।

चीन के साथ हुए झड़प के बाद भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा जिस प्रकार से अंसेवनशीलता का प्रदर्शन करते हुए घटना के आंकलन को खुलेआम टीवी पर प्रसारित किया जा रहा है, इससे निश्चित रूप से देश की सुरक्षा पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही पार्टियों के नेताओं द्वारा दिए जा रहे बयानों की बात करें तो वे अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने और आरोप प्रत्यारोप के खेल में जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। मौजूदा हालातों को देखते हुए संवेदनशीलता दिखाना हर भारतीय का कर्तव्य होना चाहिए, लेकिन अगर लोकतंत्र के स्तम्भ माने जाने वाले प्रतिनिधियों द्वारा इस प्रकार का व्यवहार किया जाएगा तो इसका असर आम जन मानस पर क्या पड़ेगा ? क्या जनता के मन में डर का माहौल पैदा करने के लिए ऐसा किया जा रहा है? क्या टीआरपी (टेलिविज़न रेटिंग प्वाइंट) के लिए ये सभी खेल खेले जाते हैं? निश्चित रूप से इन सवालों के जवाब मिल पाना मुश्किल है।  

टीआरपी का खेल तेज़

आज चारों ओर से भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका पर सवाल खडे़ किए जा रहे हैं। चीन के साथ हुए भारत की झड़प को जिस प्रकार से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा बढ़ चढ़ कर दिखाया जा रहा उससे यही साबित होता है कि ये सब टीआरपी के लिए किया जा रहा है। हालांकि इन न्यूज़ चैनलों की असंवेदनशील कवरेज को देख कर जनता क्या सोच रही है, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। मीडिया में लगातार चीन और भारत के शक्ति प्रदर्शन की तुलना की जा रही है। रक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि नेशनल मीडिया में ये बता कर देश की सुरक्षा नीतियों को कमज़ोर किया जा रहा है। मीडिया द्वारा लगातार चीन और भारत के युद्ध की बातें कही जा रही है, जबकि ये केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय का आंतरिक मामला है और इन मुद्दों को भारतीय मीडिया में दिखाए जाने को लेकर सख्त प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि मीडिया में बॉर्डर पर तनाव का मंजर दिखाया जाना कतई उचित नहीं है। साथ ही सैटेलाइट छवियों का मीडिया में प्रसार किया जाना किसी दिन देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। रक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि सरकार को ऐसे सभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कवरेज पर अंकुश लगाना चाहिए जिससे देश की सुरक्षा में सेंध मारी का आभास हो और जिसे केवल टीआरपी के खेल में शीर्ष पर रहने के लिए खेला जा रहा हो। 

क्या 26/11 से भी नहीं सिखा ?

आपको याद होगा 26/11 का वो भयावह मंजर, जब मुंबई के होटल ताज, नरिमन प्वाइंट और सीएसटी रेलवे स्टेशन पर आतंकी हमला हुआ था। उस समय भारतीय मीडिया के रोल पर काफी बहस भी चली थी। भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उस वक्त असंवंदनशीलता और लापरवाही का परिचय देते हुए, आंतकी हमले का सीधा प्रसारण अपने न्यूज चैनलों के माध्यम से ज़ोर शोर से किया। इस लाइव रिपोर्टिंग को पाकिस्तान में बैठे आतंकी संगठन द्वारा मॉनिटर किया जा रहा था, और आतंक का खुनी खेल खेल रहे आतंकियों को आगे की रणनीति के बारे बताया जा रहा है। इस घटना के बाद भारतीय मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऐसे संवेदनशील घटनाओं की कवरेज पर रोक लगाने से संबंधित कई आदेश भी पारित किए गए, लेकिन ज़मीनी हकीकत ये है कि आज जब चीन और भारत के बीच बॉर्डर पर झड़प हुई तो एक बार फिर भारतीय मीडिया द्वारा लापरवाही का परिचय देते हुए इस संवेदनशील घटना पर कवरेज किया जा रहा है।   

क्यों तोड़ रहे हैं सेना का मनोबल

यूं तो किसी भी देश में मीडिया की भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, और मीडिया को लोकतंत्र के चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है। लेकिन इन दिनों मीडिया के बिकाऊ रवैये की वजह से उसकी भूमिका पर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। आपको याद होगा जब उरी में हुए आतंकी हमले का बदला भारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक कर लिया गया तो इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया गया। आपको ये भी याद होगा जब बालाकोट में हमला हुआ तो भारत ने जवाबी कार्रवाई में एयर स्ट्राइक किया, और एक बार फिर भारतीय मीडिया ने बढ़ चढ़ कर इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही दिया। ये कुछ हद तक सच भी है कि प्रधानमंत्री के दिशा निर्देश पर ही जवाबी कार्रवाई को अंजाम दिया गया। लेकिन क्या ये सच नहीं है कि सेना ने इस दौरान अपनी अहम भूमिका निभाते हुए देश के प्रति अपने समर्पण और देश भक्ति का भी परिचय दिया है। भारत और चीन के बीच तनाव पर मीडिया द्वारा किए गए कवरेजों को देख कर लगता है मानो सेना के पराक्रम को निम्न कर आंका जा रहा है और कुछ मीडिया समुहों द्वारा इस झड़प के लिए दोनों पक्षों को गलत बताया जा रहा है। सेना के एक पूर्व अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह सच है कि सरकार के आदेश पर ही इन जवाबी कार्रवाई को अंजाम दिया गया लेकिन सेना की भूमिका को जिस पर भारतीय मीडिया द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, उससे सेना का मनोबल टूटता है। उन्होंने बताया कि सेना को देश की ताकत के रूप प्रदर्शित किया जाना चाहिए। सेना का हर जवान बॉर्डर पर बलिदान देने के लिए खड़ा है। इस पर मीडिया और राजनेता किसी को भी राजनीति करने का अधिकार कतई नहीं है। उन्होंने कहा सेना की बहादूरी को छोटा आंकना बंद करें। कम से कम मीडिया को अपने हद में रहना चाहिए और सेना के कार्यों का आंकलन कर उस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा ऐसे कभी मीडिया समूह जो सेना के पराक्रम पर सवाल खड़े करते हैं, उन पर केंद्र सरकार की ओर से सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

बड़बोले नेताओं के बोल

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भारत-चीन सैन्य झड़प को लेकर लगातार केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे हैं और सरकार से सोशल मीडिया के माध्यम से सवाल पूछ रहे हैं। इतना ही नहीं राहुल गांधी ने कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी सीधे निशाना साधा है और कुछ निर्णयों के नतीजे का ठिकरा उनके सिर फोड़ा है। हालांकि कई मौकों पर जवाबी पलटवार करते हुए भाजपा नेताओं द्वारा भी बड़बोली की जाती है और राहुल गांधी द्वारा किए गए टिप्पणियों का विरोध किया जाता है। हालांकि कई बार नेता अपनी भाषाई मर्यादा का ख्याल भी नहीं रख पाते हैं और सीमा से पार जाकर गलत बयानबाजी कर बैठते हैं। भाजपा नेताओं द्वारा अक्सर कांग्रेस में परिवारवाद को बीच में लाकर अपशब्दों का प्रयोग किया जाता है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर जब कभी राहुल गांधी ने केंद्र सरकार, खास कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सवाल किया तो भाजपा नेता उनके पिता राजीव गांधी, दादी इंदिरा गांधी और परदाता पंडित जवाहर लाल नेहरू को खींच लाते हैं। हालांकि इस बात से हम मुकर नहीं सकते हैं कि गांधी और  नेहरू परिवार से देश को तीन प्रधानमंत्री मिले है। उधर दूसरी ओर देखा जाए तो राहुल गांधी या अन्य कांग्रेसी नेताओं द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार पर सवाल किया जाना भी उचित नहीं है। प्रधानमंत्री पद की गरिमा का ख्याल रखते हुए और सरकारी नियमों का पालन करते हुए विपक्ष को या तो पत्राचार के माध्यम से सरकार से जवाब मांगना चाहिए या फिर संसद में सरकार पर सवाल किए जाने चाहिए। सोशल मीडिया में अपनी और देश की फजीहत करने का लाभ क्या है।   


विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील मुद्दों पर गलत बयानबानबाजी कर भाजपा और कांग्रेस मिल कर देश के माहौल को खराब कर रहे हैं। दोनों ही पार्टी के नेताओं को अपने पदों की गरिमा का ख्याल रखते हुए मर्यादा में रह कर बात करनी चाहिए। देश के हालात को देखते हुए दोनों पार्टी के नेताओं को समझ से काम लेनी चाहिए। देश के माहौल को सुखद और शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए दोनों ही पार्टी को अपनी गलती सुधारनी चाहिए और उल्टे-सीधे बयानबाजी से बचना चाहिए। कांग्रेस जिस प्रकार से सोशल मीडिया पर सवाल कर रही है इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। उन्हें प्रधानमंत्री ऑफिस में पत्राचार कर मुद्दों पर जवाब मांगना चाहिए। सोशल मीडिया वो प्लैटफॉर्म नहीं है जहां सवाल किया जाए या फिर उसका जवाब दिया जाए। हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता अक्सर इस प्रकार का गैर जिम्मेदाराना हरकत कर बैठते हैं।

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