सेवा को व्यवसाय बनाते निजी अस्पताल

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- कोलंबिया एशिया अस्पताल की घटना - मरीजों के साथ किया जा रहा दुर्व्यवहार - अस्पताल के सीओओ जसदीप सिंह ने कहा - कोई एक्शन नहीं लिया जाएगा, जो करना है कर लीजिए


बेंगलूरु, (परिवर्तन)। यूं तो भारत में व्यवसाय के लिए कई विदेशी कंपनियों को अनुमति दी जाती है। हालांकि यहां व्यवसाय करने वाली ज्यादातर विदेशी कंपनियों का मकसद या तो अपने व्यवसाय का विस्तार करना होता है या फिर केवल लाभ कमाना। हम बात कर रहे हैं भारत में व्यवसाय कर रहे मेडिकल संस्थानों की, जो मरीजों की सेवा और विभिन्न तकनीकी सुविधानों को लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से भारत आते तो हैं लेकिन यहां पैर जमाने के बाद वे केवल व्यवसाय करने पर ही अपना पूरा ध्यान लगाते हैं। ऐसा कहने को हम इसीलिए भी मजबूर हैं क्योंकि पिछले दिनों बेंगलूरु के एक प्रसिद्ध विदेशी अस्पताल द्वारा अपने मरीज़ों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार करने की कई घटनाएं प्रकाश में आई हैं। अस्पताल द्वारा खराब खाना दिया जाना, अस्पताल में सुविधाओं का अभाव और अस्पताल प्रबंधन के खराब रवैय्ये की शिकायत कई मरीज़ों ने की है। 



इस घटना को लेकर समाचार परिवर्तन ने पहले भी अपने सामाजिक दायित्वों का पालन करते हुए अपने समाचार पत्र में प्रकाशित किया था। इतना ही नहीं जब कोलंबिया एशिय़ा के विदेशी मालिक डैनियल बैटी से ईमेल के माध्यम से संपर्क करना चाहा और उन्हें भारत में मानव सेवा के नाम पर चलाए जा रहे व्यवसाय को लेकर जवाब मांगा तो उनकी ओर से भी किसी प्रकार का जवाब हमें नहीं मिला। ऐसी घटनाओं को केवल राज्य ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार को भी गंभीरता से लेनी चाहिए और केवल व्यवसाय के उद्देश्य से भारत में आने वाले ऐसे संस्थानों पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए।  


क्या है घटना

सुनीता को किडनी में स्टोन होने की पुष्टी होने के बाद बीते दो मई को सुनीता को अस्पताल में एडमिट होने की सलाह दी गई। अस्पताल में जाने के बाद उसे विभिन्न प्रकार की टेस्ट करवाने का हवाला देकर करीब दो घंटे तक बाहर बैठने को कहा गया। उस वक्त सुनीता को 102 बुखार था, जिसे अस्पताल कर्मियों द्वारा सीधे तौर पर अनदेखा किया गया। टेस्ट कराने और पैसे एंठने के नाम पर सुनीता को दर्द और बुखार से तड़पता छोड़ दिया गया। दर्द से परेशान, बेबस सुनीता करीब दो घंटे तक दर्द से तड़पती रही। उसके पति से प्राप्त जानकारी के अनुसार सुनीता को ऐसे एक जगह पर बैठने के लिए कहा गया जहां एक कुर्सी तक उपलब्ध नहीं थी। तेज़ बुखार और कमजोरी की वजह से सुनीता की हालत काफी खराब हो गई थी। अस्पताल में पैसे जमा कराने के बाद सुनीता के पति ने उसका अस्पताल में दाख़िला कराया। 


घटना यहीं समाप्त नहीं हुई। अस्पताल में भर्ती के बाद डॉक्टरों ने उन्हें कुछ दिनों के लिए अंडर ऑबजर्वेशन रखा और इस बीच ऑपरेशन से पहले होने वाले सभी जांच भी किए गए। इस बीच जब सुनीता को अस्पताल की ओर तरबूज़ का जूस पीने को दिया तो उसमें से अजीब से सड़न की बदबू आ रही थी। उसने अपने पति से इसकी शिकायत की। उन्होंने समझा कि शायद इसमें किसी प्रकार की दवा मिलाई गई है जिसकी वजह से ऐसी स्मेल आ रही है। इस जूस को पीने के बाद सुनीता को करीब पांच बार उल्टियां हुई। जिसके बाद उसे उल्टियां बंद होने के लिए इंजेक्शन दिया गया। अस्पताल स्टाफ ने इस बात की जानकारी सुनीता की जांच कर रहे डॉक्टर को नहीं दी। 


इसके बाद उन्होंने अस्पताल की कैंटीन से वेज फ्राइड राइस ऑर्डर किया। करीब चार - पांच स्पून खाने के बाद सुनीता को उस फ्राइड राइस में से एक मरी हुई मक्खी मिली। उसने जब यह बात अपने पति को बताई तो उन्होंने अस्पताल स्टाफ से इस बात की शिकायत की। उन्होंने कहा कि हम प्लेट बदल देते हैं। मानस ने इसकी शिकायत सुनीता की जांच करने वाले डॉक्टर को भी बतानी चाही लेकिन स्टाफ ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। उन्होंने मानस से कहा कि अगर आपको अस्पताल के खाने से शिकायत है तो आप अपना खाना घर से लेकर आए। मानस ने सुनीता के लिए घर से खाना लाना ही बेहतर समझा। घर से खाना लेकर जब वे लौट रहे थे तो उन्हें अस्पताल के मुख्य द्वार पर ये कहते हुए रोक दिया गया कि अस्पताल में घर से लाया हुआ खाना अलाउड नहीं है। ये बात सुनकर मानस को काफी गुस्सा आया उसने तंग आकर अस्पताल प्रबंधन से इसकी शिकायत करनी चाही लेकिन उन्हें प्रबंधन से मिलने की इजाज़त नहीं दी गई। उन्होंने अस्पताल के स्टाफ द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार की कहानी अस्पताल के फ्लोर मैनेजर को बताई। उन्होंने मानस को बताया कि ड्यूटी कर रहे स्टाफ के शिफ्ट बदलने की वजह से उन्हें गेट पर रोका गया। हालांकि फ्लोर मैनेजर ने भी इस घटना को लेकर किसी प्रकार की लिखित शिकायत लेने से साफ इंकार कर दिया। इतना ही नहीं मानस ने जब इस पूरे घटना की जानकारी हमारे समाचार पत्र ‘परिवर्तन’ को दी तो अस्पताल स्टाफ ने उन्हें सुनीता के ऑपरेशन को क्रिटिकल बताते हुए उन्हें सीधे तौर पर धमकाना शुरु कर दिया। मानस को उन्होंने कहा कि सुनीता की हालत नाज़ुक है और ऑपरेशन के समय कुछ भी हो सकता है। 

अस्पताल प्रबंधन, स्टाफ की इस लापरवाही की वजह से सुनीता और मानस को काफी मानसिक व शारीरिक तनाव का सामना करना पड़ा। सुनीता और उसके परिवार के साथ हुए इस अमानवीय व्यवहार के लिए अस्पताल स्टाफ को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। 


इस घटना के संबंध में शिकायत मिलने पर कोलोंबिया एशिया अस्पताल द्वारा सुनीता और उसके परिवार के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार को लेकर जब हमारे समाचार पत्र ‘परिवर्तन’ के प्रतिनिधि ने अस्पताल प्रबंधन से बात करनी चाही तो उन्होंने सीधे तौर पर बात करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ये अस्पताल का निजी मामला है और इस पर कोई दख़लअंदाज़ी न किया जाए। उन्होंने बताया कि अस्पताल इसे अपने तरीके से संभालने की कोशिश करेगा। 


... आपको जो करना है कर लीजिए : जसदीप सिंह

इस घटना को लेकर बीते दिनों हमारे अखबार के संपादक ने जब बेंगलूरु स्थित कोलंबिया एशिया के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर यानी सीओ जसदीप सिंह से बात करनी चाही, तो वे काफी अभ्रद्रता से पेश आएं। 


संपादक ने उनसे एक फोन कॉल के माध्यम से पूछा कि पिछले दिनों अस्पताल में हुए मरीजों के साथ दुर्व्यवहार की घटना पर क्या कोई ठोस कदम उठाया है।  

जसदीप सिंह - हमने उस घटना पर किसी प्रकार का कोई एक्शन न लिया है और न ही उस पर कोई विचार किया जाएगा। आपको जो करना है कर लीजिए। 

किसी भी संस्थान के शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्ति का दायित्व होता है कि वे संस्थान पर लगे दागों को अनदेखा न करें और अपने ग्राहकों (यहां मरीजों) की सेवा में तत्पर रहें। हालांकि शहर में ज्यादातर अस्पताल केवल व्यवसाय को ही अपनी पहली और आख़िरी प्राथमिकता समझते हैं। यही वजह है कि कोलोंबिया एशिया के सीटीओ ने इस घटना पर कुछ कहने और कुछ करने से सीधे तौर पर इंकार कर दिया।  


क्या हमारा स्वास्थ्य मंत्रालय कमज़ोर है?

आए दिन हमें देश के कोने कोने से निजी अस्पतालों द्वारा मरीज़ों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार की घटना की खबर मिलती रहती है। कभी कहीं मरीज़ का गलत इलाज कर दिया जाता है तो कभी कहीं सामान्य सी समस्या के लिए लाखों रूपए का बिल थमा दिया जाता है। इन सबको लेकर जब पीड़ित कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाता है तब कहीं जाकर 100 में से 10 लोगों को इंसाफ मिल पाता है, बाकि कई मामलों को या तो पैसे की लालच में या फिर राजनीतिक प्रभावों से दबा दिया जाता है। ऐसे बहुत मामले हैं जो प्रकाश में तक नहीं आते। क्या इसके लिए भारत सरकार की स्वास्थ्य मंत्रालय की नीतियों को गलत ठहराया जा सकता है। क्या सरकार ने कभी भी ऐसे मामलों को संगीनता से लेते हुए उस पर कार्रवाही की है। कमजोर नीतियों और नियमों की वजह से ही आज देश में अस्पतालों में सेवा कम और व्यवसाय ज्यादा चलाया जा रहा है।   


कोलंबिया एशिया के खिलाफ़ दर्ज करवाई गई एफआईआर

समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए समाचार परिवर्तन ने स्थानीय सुब्रमण्यमनगर पुलिस थाने में पेटिशन नंबर PO1361200600147 से एक प्राथमिकी दर्ज करवाई गई है। अस्पताल द्वारा दिखाए जा रहे अपने उदासीन व्यवहार की वजह से यह कंप्लेंट दर्ज की गई है। इस मामले को लेकर स्थानीय बीबीएमपी कार्यालय के स्वास्थ्य विभाग में भी एक शिकायत की गई है। अब देखना यह है कि इस पर पुलिस और बीबीएमपी द्वारा क्या ठोस एक्शन लिया जाता है।  


नोट - हमारे सभी पाठकों को ये सूचित किया जाता है कि शहर के किसी भी निजी अस्पताल द्वारा अगर आपके साथ कभी भी ऐसा कोई अमानवीय व्यवहार किया गया है, या फिर आपको भी अस्पताल के डॉक्टरों, प्रबंधन या स्टाफ के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा है तो आप हमारे अख़बार के माध्यम से अपनी कहानी लोगो तक पहुंचा सकते हैं। क्या पता आपकी इस छोटी सी कोशिश से आने वाले दिनों में अन्य लोगों को ऐसे अस्पतालों के गोरखधंधे की जानकारी मिले, जिसे वे अक्सर मनावसेवा की आड़ में चलते है। अपनी कहानी हमसे बेझिक साझा करे, और भरोसा रखें आपकी लड़ाई में समाचार परिवर्तन आपके साथ सदैव खड़ा रहेगा। आपकी पहचान को गोपनीय रखा जाएगा। हमसे संपर्क करें - editor@thearyavarthexpress.com

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