राजनीति की आग में झुलस रहे देश के मज़दूर

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। भारत की पृष्ठभूमि पर गरीब और असहाय हमेशा कठोर राजनीति के अधीन रहे हैं। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, "गरीब अपनी गरीबी के लिए कभी जिम्मेदार नहीं होते हैं, लेकिन वे समाज में व्याप्त असमानताओं और अवसरों की कमी के शिकार होते हैं।" वर्तमान स्थिति बिल्कुल एक समान है।

पहले उन्हें लॉकडाउन नियमों का पालन करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, उन्हें अपने देश में प्रवासी मजदूर कहा जा रहा है, सुविधाओं के वितरण करते समय उनसे भेदभाव किया जा रहा है क्योंकि वे एक अलग राज्य के मतदाता होते हैं और अपने स्वयं के गांवों में भी राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं। क्या उनके साथ मानवीय व्यवहार नहीं करना चाहिए और क्या उन्हें अपने गांवों में वापस लौट जाने के लिए मदद नहीं करनी चाहिए,  क्या श्रमिक ट्रेनों पर वापस जाते समय भूख और अत्यधिक गर्मी से मर रहे श्रमिकों की मदद नहीं करनी चाहिए, क्या उनके साथ आवारा पशुओं की तरह व्यवहार करना चाहिए और क्या सरकारी संगरोध केंद्रों में संक्रमित लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जाना चाहिए, क्या उन्हें अखबारों पर भोजन परोसा जाना चाहिए (जैसा कि छत्तीसगढ़ से मिले एक वायरल वीडियो में दिखाई दे रहा है)। मजदूर, श्रमिक गरीब और असहाय लोग देश के उतने ही नागरिक हैं, जितना कि हम और आप हैं। वे बेहतर व्यवहार के हकदार हैं, लेकिन उन्हें गरीब होने की एकमात्र गलती की सजा दी जा रही है। जानकार कहते हैं कि वे देश में पनप रही घिनौनी राजनीति की आग में झूलस रहे हैं। राजनेताओं को उनकी याद केवल चुनाव के दौरान आती है बाकि समय मजदूरों को केवल संख्या में गिन लिया जाता है।

ट्रेनों में क्यों हो रही मजदूरों की मौत

इंडियन रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स (आरपीएफ़) की शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार नौ मई से 27 मई के बीच श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में सफ़र के दौरान कम से कम 80 लोगों की मौत हुई है। रिपोर्ट में इन मौतों के पीछे कैंसर, गंभीर बीमारी, लिवर की समस्या और कोविड-19 संक्रमण जैसी वजहें बताई हैं। हालांकि कोरोना वायरस संक्रमण को सिर्फ़ एक व्यक्ति की मौत का कारण बताया गया है। आरपीएफ़ की इस रिपोर्ट की पड़ताल करने पर पाया है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में यात्रा के दौरान जान गंवाने वालों में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की संख्या सबसे ज़्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक़ कुल 80 मृतकों में से 32 लोग उत्तर प्रदेश और 25 लोग बिहार से ताल्लुक़ रखते थे। श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में मरने वालों के ये आंकड़े किसी ग़ैर-सरकारी संस्था ने नहीं बल्कि ख़ुद इंडियन रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स ने जारी किए हैं। ये आंकड़े रेलमंत्री के ‘सब ठीक है’ के दावों के ठीक उलट कहानी बयां करते हैं। अगर सिर्फ़ पिछले हफ़्ते के रिकॉर्ड पर नज़र डालें तो सात दिनों के भीतर कम से कम नौ लोगों की मौत श्रमिक ट्रेनों में यात्रा के दौरान हुई है। इन मरने वालों में बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर की वो महिला भी हैं जिनकी वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुई थी। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि महिला मृत अवस्था में प्लेटफ़ॉर्म पर पड़ी है और उनका बच्चा मौत से पूरी तरह अनजान उनके साथ खेल रहा है। 

हालांकि सरकार ने महिला को ‘पहले से बीमार’ बताकर उनकी मौत से पल्ला झाड़ लिया था। भारत सरकार की सूचना एजेंसी ‘प्रेस इंफ़ॉर्मेशन ब्यूरो’ ने भी श्रमिक ट्रेन में महिला की मौत को ‘फ़ेक न्यूज़’ बताया था। ये वीडियो सामने आने के बाद पीयूष गोयल ने ट्वीट करके कहा था, “मेरी सभी नागरिकों से अपील है कि गंभीर रोग से ग्रस्त, गर्भवती महिलाएं, व 65 से अधिक व 10 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में बहुत आवश्यक होने पर ही यात्रा करें।” हालांकि रेलमंत्री ने ये नहीं बताया कि ‘बहुत आवश्यक’ का पैमाना क्या होगा। रोज़ी-रोटी छिनने और राशन ख़रीदने के पैसे न बचने को ‘बहुत आवश्यक’ माना जाएगा या नहीं? मकान का किराया न चुका पाने पर बेघर कर दिए जाने को ‘बहुत आवश्यक’ माना जाएगा या नहीं? ज़ाहिर है, कोरोना संक्रमण के ख़तरे के बीच श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में अमूमन वही लोग यात्रा कर रहे हैं जिनके पास कोई और विकल्प नहीं बचा है। अगर ये ‘बहुत आवश्यक’ नहीं है तो फिर क्या है? रेलमंत्री ने इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में सुविधाओं की बात करें तो मुंबई से झारखंड लौटे एक मोहम्मद बदरुद्दीन अंसारी ने बीबीसी को बताया था कि 48 घंटे की यात्रा में उन्हें सिर्फ़ दो बार खाना और तीन बार पानी मिला था। सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो देखने को मिले हैं जिनमें ट्रेन रुकते ही लोग स्टेशन पर पानी की बोतलों और बिस्किट के पैकेटों पर टूट पड़ते नज़र आते हैं। 

क्यों भटक रही है ट्रेनें 

पीयूष गोयल ने कहा कि सभी ट्रेनें गंतव्य पर पहुंची हैं और भीड़ की वजह से कुछ को थोड़ी देरी हुई है। मगर उन्होंने नहीं बताया कि ‘थोड़ी देर’ असल में कितनी ‘देर’ होता है। एक अंग्रेजी अखबार ने कई स्रोतों से श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के टाइम टेबल का विश्लेषण किया है और पाया है कि एक मई से शुरू हुई 3,740 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में से 40 फ़ीसदी अपने गंतव्य स्थान पर देरी से पहुंचीं और ये देरी औसतन आठ घंटे की रही। अब औसतन आठ घंटे की देरी ‘थोड़ा लेट’ है या ‘ज़्यादा लेट’ इसका सही जवाब तो उन ट्रेनों से सफ़र करने वाले वो लोग ही दे सकते हैं जो किसी तरह बस जल्द से जल्द अपने घर पहुंच जाना चाहते थे।

महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के लिए निकली श्रमिक स्पेशल ट्रेन गोरखपुर के बजाय ओडिशा के राउरकेला पहुंच गई। सवाल उठने पर रेलवे ने कहा कि इस ट्रेन का रास्ता बदला जाना ‘पूर्व नियोजित’ था। इसी तरह बेंगलुरु से उत्तर प्रदेश के बस्ती के लिए निकली ट्रेन एनसीआर में ग़ाज़ियाबाद पहुंच गई। यह श्रमिक स्पेशल ट्रेन अपने गंतव्य तक 20 घंटे से ज़्यादा की देरी से पहुंची। क्या रेलमंत्री के दावों के अनुसार इस 20 घंटे की देरी को ‘थोड़ी देर’ माना जाए? रेल मंत्रालय बार-बार यह दुहरा रहा है कि चूंकि ज़्यादातर श्रमिक ट्रेनें प्रवासी मज़दूरों को लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार जा रही हैं, इसलिए इन रास्तों पर भीड़भाड़ से बचने के लिए ट्रेनों को डायवर्ट करना पड़ रहा है। अब सवाल ये है कि अगर ये सब ‘पूर्व निर्धारित’ था तो क्या रेलवे ने लोगों को पहले से बताया था कि स्पेशल श्रमिक ट्रेनों को गंतव्य तक पहुंचने में इतनी देर लगेगी? या ट्रेनों का रास्ता इस तरह बदला जाएगा? और अगर बताया गया था तो क्या सफ़र में देरी को देखते हुए लोगों को रास्ते के लिए खाना-पानी और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं? बीबीसी समेत कई मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट में इन श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से सफ़र करने वालों ने बताया है कि उन्हें इस तरह रास्ता बदले जाने या यात्रा में देरी के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई थी। लोगों ने ये भी कहा है कि ट्रेनों में देरी की वजह से उन्हें कई घंटे भूखे-प्यासे रहना पड़ा। 

ये स्थिति उन श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की है, जिनमें ज़्यादातर ग़रीब प्रवासी मज़दूर और मजबूर लोग सफ़र कर रहे हैं। ये स्थिति उन श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की है जिनमें सफ़र कर लोगों के पास पहले से ही खाने-पीने की चीज़ों और पैसों की भारी कमी है। इन सारी आलोचनाओं के बीच रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष वीके यादव ने कहा कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनें, सामान्य ट्रेनें नहीं हैं और उन्हें ‘प्रवासी मज़दूरों के हितों का ध्यान रखते हुए’ डायवर्ट किया जा सकता है। रेल मंत्रालय और रेल मंत्री पीयूष गोयल लगातार लेट होती और रास्ता भटकती ट्रेनों को लेकर सफ़ाई दे रहे हैं। पीयूष गोयल ट्रेनों के रास्ता भटकने की ख़बरों को फ़ेक न्यूज़ बता रहे हैं और कह रहे हैं ट्रेनें पूर्व निर्धारित तरीके से डायवर्ट की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि 4,040 में से सिर्फ़ 71 ट्रेनें (1.75%) ट्रेनें डायवर्ट की गईं. 1.75% सुनने में छोटा सा प्रतिशत लगता है लेकिन 71 ट्रेनों में लाखों लोगों की परेशानियां भी क्या इतनी ही छोटी होंगी?

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