क्या चीन की वजह से नेपाल के बदले सूर

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। चीन के बाद नेपाल के साथ भी भारत का तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने नेपाली संसद में घोषणा की कि भारत के कब्जे वाले कालापानी क्षेत्र (पिथौरागढ़ जिला) पर नेपाल का 'निर्विवाद रूप से' हक है।

भारत - नेपाल विवाद

नेपाल के पीएम ने कहा कि उनकी सरकार इस क्षेत्र को पाने के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक कदम उठाने जा रही है। ओली की कैबिनेट ने नेपाल का एक नया राजनीतिक मानचित्र पेश किया है, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है। यह नक्शा जारी किया गया। संसद द्वारा नए मैप को जारी करने के बाद नेपाल में उत्सव का माहौल है।

इधर, भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (एमईए) ने इस मामले पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि पिछले साल जारी भारत के राजनीतिक मानचित्र में अपने संप्रभु क्षेत्र को सटीक रूप से दर्शाया गया था। इसमें नेपाल के साथ सीमा को संशोधित नहीं किया गया था। भारत ने पहले नेपाल को आश्वासन दिया था कि, कोरोना संकट से निजात पाने के बाद में सीमाओं के मुद्दे पर बातचीत की जाएगी। उधर, नेपाल का कहना है कि कालापानी सीमा का मुद्दा दशकों से द्विपक्षीय एजेंडे का हिस्सा रहा है। नेपाल बार-बार भारत के नए नक्शे का विरोध करता रहा है।


उधर, लद्दाख से सटी भारत और चीन की सीमा पर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। भारत और चीन ने पूर्वी लद्दाख के पास के कुछ सेक्टरों में सेना की तैनाती बढ़ाई है। पैंगोंग त्सो सेक्टर में 5-6 मई को दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इसके बाद इस इलाके में तनाव बढ़ गया है। यह इलाका पहले भी दोनों देशों बीच संघर्ष और टकराव का केन्द्र रहा है। सूत्रों ने कहा कि डेमचोक, चुमार और दौलत बेग ओल्डी जैसी जगहों पर सेना बढ़ाई गई है। इन जगहों पर मोर्चाबंदी की भी खबरें हैं। चीनी सैनिकों द्वारा एक नदी के पास कुछ टेंट लगाने और निर्माण गतिविधि शुरू करने के बाद गलवान घाटी भी विवाद की जगह बनी है। भारतीय सेना के एक सूत्र ने कहा, "जाहिर है, हमारे सैनिकों द्वारा चीनी सैनिकों को चुनौती दी गई है। गलवान नदी के पास 5-6 मई को पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट पर हुई हिंसक झड़प में दोनों पक्षों के कई सैनिक घायल हो गए थे। इसके बाद से भारत और चीन ने इस क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की है।


क्या है पूरी कहानी

रिपोर्ट के अनुसार नेपाल-चीन कारोबार को बढ़ावा देने के लिए इस सड़क परियोजना को साल 2008 में मंजूरी दी गई थी। एक अख़बार का कहना है कि इस सड़क का तकरीबन 50 किलोमीटर हिस्सा उत्तराखंड से लगने वाली भारत-नेपाल सीमा के समानांतर लगता है। पिछले 12 सालों में इस रोड प्रोजेक्ट में केवल 43 किलीमोटर लंबी सड़क का निर्माण कार्य हो पाया था। अब नेपाल सरकार ने इस परियोजना का काम दोबारा शुरू किया है और ये तय किया है कि सेना बची हुई सड़क का निर्माण कार्य पूरा करेगी।लद्दाख के पूर्वी इलाक़े में पिछले हफ़्ते तीन जगहों पर भारत और चीन के सैनिकों के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी। कोलकाता से छपने वाले अंग्रेज़ी अख़बार टेलीग्राफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ दोनों ही पक्षों ने सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी है। तीन साल पहले हुए डोकलाम विवाद के बाद भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों पर एक बार फिर सैन्य तनाव का माहौल बना हुआ है। अख़बार के मुताबिक़ पाँच मई को लद्दाख में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई। नौ मई को सिक्किम में भी ऐसी ही घटना हुई थी। एक भारतीय सुरक्षा अधिकारी के हवाले से अख़बार ने लिखा है, "लद्दाख में तनाव बढ़ने की वजह ये है कि वहां चीन भारत को सड़क बनाने से रोकना चाहता है जबकि भारतीय सैनिक चीनियों के कब्ज़े वाली एक चौकी खाली कराना चाहते हैं।''


पिछले साल नवंबर में भारत ने जम्मू-कश्मीर का विभाजन कर दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए तो अपना नया नक्शा जारी किया। इस नक्शे में कालापानी भी शामिल था। नेपाल ने इसे लेकर तीखी आपत्ति दर्ज कराई और कहा कि भारत अपना नक्शा बदले क्योंकि कालापानी उसका इलाक़ा है। अब पाँच महीने बाद दोनों देशों के बीच लिपुलेख को लेकर फिर से तनाव पैदा हो गया है। लिपुलेख नेपाल के उत्तर-पश्चिम में है। यह भारत, नेपाल और चीन की सीमा से लगता है। भारत इस इलाक़े को उत्तराखंड का हिस्सा मानता है और नेपाल अपना हिस्सा। नेपाल ने काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास से राजदूत को समन किया और आपत्ति दर्ज कराई।


भारत ने लिपुलेख में क़रीब 5,200 मीटर रोड का उद्घाटन किया है और इसे लेकर नेपाल के लोग ग़ुस्से में हैं। सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा है कि लिपुलेख में भारत का सड़क बनाना उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है। नेपाल की तरफ़ से जारी इस बयान पर प्रधानमंत्री खड़गा प्रसाद शर्मा ओली के हस्ताक्षर हैं। भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुए पीस एंड फ्रेंडशिप संधि को लेकर भी नेपाली पीएम केपी ओली सख़्त रहे हैं। उनका कहना है कि संधि नेपाल के हक़ में नहीं है। इस संधि के ख़िलाफ़ ओली नेपाल के चुनावी अभियानों में भी बोल चुके हैं। ओली चाहते हैं कि भारत के साथ यह संधि ख़त्म हो।


दोनों देशों के बीच सीमा विवाद भी एक बड़ा मुद्दा है। सुस्ता और कालापानी इलाक़े को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद है। चार साल पहले दोनों देशों के बीच सुस्ता और कालापानी को लेकर विदेश सचिव के स्तर की बातचीत को लेकर सहमति बनी थी, लेकिन अभी तक एक भी बैठक नहीं हुई है। ओली जब भारत आते हैं तो उन पर दबाव होता है कि इन दोनों मुद्दों पर बातचीत करें, लेकिन द्विपक्षीय वार्ताओं में इनका ज़िक्र नहीं होता है।


नेपाल का डिप्लोमेटिक नोट

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भी एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर लिपुलेख में भारत के सड़क उद्घाटन पर आपत्ति जताई है। नेपाल लिपुलेख पर अपना दावा कर रहा है और भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना है कि 'ये सड़क कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए पहले से बनी सड़क के दायरे में है।' इस मसले पर नेपाल की केपी शर्मा ओली सरकार की आलोचना भी हो रही है। आलोचकों का कहना है कि नेपाल ने कालापनी मुद्दे को भारत के साथ ठीक से नहीं सुलझाया और लिपुलेख में रोड का उद्घाटन नेपाल की सरकार की इसी निष्क्रियता का नतीजा है। नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ने काठमांडू में भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा को अपने दफ़्तर बुलाकर लिपुलेख मसले पर नाराज़गी ज़ाहिर की और साथ ही एक डिप्लोमैटिक नोट भी थमाया। नेपाली विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किए गए एक संक्षिप्त बयान के अनुसार, "विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ज्ञवाली ने विदेश मंत्रालय में हुई एक बैठक में भारतीय राजदूत को सीमा से जुड़े मसले पर नेपाल के रुख़ के बारे में जानकारी दी और इस सिलसिले में एक डिप्लोमैटिक नोट सौंपा।" इसी तरह नई दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास ने भी भारतीय विदेश मंत्रालय को उस डिप्लोमैटिक नोट की एक प्रति सौंपी है। विशेषज्ञों के अनुसार नेपाल ने भारत को जो नोट सौंपा है वो न तो औपचारिक कूटनीतिक संदेश है और न ही अनौपचारिक नोट। ये नोट इन दोनों के बीच कहीं आता है। इस तरह के नोट में किसी का हस्ताक्षर नहीं होता और आम तौर पर एक संस्थान दूसरे संस्थान को ऐसे नोट सौंपते हैं। नेपाली अख़बार काठमांडू पोस्ट के अनुसार दो नेपाली अधिकारियों का कहना है कि विदेश मंत्री ज्ञवाली ने भारतीय राजदूत को जो नोट सौंपा वो सीमा विवाद पर नेपाल का रुख़ स्पष्ट करने के लिए था।


नेपाली विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकार ने काठमांडू पोस्ट से नाम ज़ाहिर न किए जाने की शर्त पर बताया कि इस नोट में नेपाल और भारत के सकारात्मक सम्बन्धों का ज़िक्र किया गया है। उन्होंने कहा, "नेपाल ने बताया है कि वो भारत के साथ अपने सम्बन्धों को ख़ास अहमियत देता है। इसके साथ ही नेपाल ने नवंबर 2015 से लेकर अब तक हुई अप्रत्याशित घटनाओं पर नाराज़गी भी जताई है। इस नोट में नेपाल ने भारत से लिपुलेख सड़क का निर्माण रोकने की अपील की है।" अधिकारी के मुताबिक़ नोट में सीमा विवाद के ऐतिहासिक संदर्भ और सुगौली संधि का ज़िक्र किया गया है। नोट में कहा गया है कि कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा पर नेपाल का हक़ है। विदेश मंत्रालय ने इस पूरे विवाद को सुलझाने के लिए भारत के समक्ष जल्द से जल्द बातचीत का प्रस्ताव भी रखा है।

लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को लेकर काफ़ी पहले से विवाद रहा है लेकिन नेपाल ने साल 2015 में पहली बार इस मुद्दे को भारत और चीन के सामने उठाया जब दोनों देश लिपुलेख दर्रे से एक व्यापारिक मार्ग खोलने को लेकर सहमत हुए थे। लिपुलेख नेपाल के उत्तर-पश्चिम में ज़मीन का एक टुकड़ा है जो नेपाल, भारत और तिब्बत के बीच में स्थित है।

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