जहां ढूंढोगे वहीं राम मिलेंगे

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। वो कहते हैं न जब कुछ अच्छा होना होता है तो आरंभ भी अच्छा ही होता है। उसी प्रकार हिन्दू राष्ट्र कहे जाने वाले भारत देश के लिए भी एक ऐतिहासिक फैसला आया 9 नवंबर, 2019 को। जब सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ फैसला सुनाने बैठी तो शुरू में ही इस बात का इशारा हो गया था।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने सबसे पहले यही बताया कि 'ये फैसला सर्व सम्मत है'। मतलब, फैसला जजों के बहुमत की राय का मोहताज नहीं बना। न तीन-दो की नौबत आयी, न चार-एक की - बल्कि पूरे के पूरे पांच-शून्य से फैसला हुआ। वो फैसला था राम जन्मभूमि में राम मंदिर के निर्माण को लेकर पारित किया गया आदेश। अब भला और क्या चाहिये। देश की सर्वोच्च अदालत का सर्व सम्मति से एक सर्वमान्य फैसला। देखा जाये तो अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश के सामाजिक ढांचे की मजबूती के साथ साथ राजनीतिक परिवेश के लिए भी बड़ा संदेश है। 

और अब देशवासियों के लिए वो समय आ गया है जिसका इंतेजार उन्हें करीब दो सदियों से था। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का काम शुरू हो गया है। राम जन्मभूमि परिसर के समतलीकरण का काम चल रहा है। इस दौरान कई पुरातात्विक मूर्तियां, खंभे और शिवलिंग मिलने का दावा किया गया है। श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से मलबा हटाने के दौरान कई मूर्तियां और एक बड़ा शिवलिंग मिला है। राम मंदिर निर्माण के लिए बनाई गई ट्रस्ट श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र द्वारा दिए गए एक बयान में कहा गया कि समतलीकरण के दौरान काफी संख्या में पुरावशेष यथा देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, पुष्प, कलश, आमलक, दोरजाम्ब आदि कलाकृतियां, मेहराब के पत्थर, 7 ब्लैक टच स्टोन के स्तम्भ, 8 रेड सैंड स्टोन के स्तंभ और 5 फिट आकार की नकाशीयुक्त शिवलिंग की आकृति मिली है। राम जन्मभूमि परिसर में 11 मई से समतलीकरण का काम शुरू हुआ है, जो अभी भी जारी है। कोरोना महामारी के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखते हुए जेसीबी, क्रेन, ट्रैक्टर और 10 मजदूरों की टीम समतलीकरण का काम कर रही है।

 

योगी सरकार लें पुरावशेषों को सहेजने की ज़िम्मेदारी

मालूम हो कि राम मंदिर विवाद चलने के दौरान कई हिन्दू संतों व महंतों ने राम मंदिर क्षेत्र में मंदिर होने का दावा किया था, जिसे बार बार कुतर्क देकर दबाने की कोशिशें की गई। लेकिन वो कहते हैं न सत्य अमर होता है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद जब मंदिर परिसर की खुदाई की गई तो वहां राम मंदिर होने के अवशेष मिले। अब सवाल यह उठता है कि राज्य सरकार इस विषय को कितनी गंभीरता से लेगी और इन अवशेषों को कैसे सहेजेगी। बुद्धिजीवियों द्वारा राज्य की योगी सरकार पर भी तेज़ निशाना साधा जा रहा है। उनका कहना है कि राज्य सरकार को इस मामले में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि हिन्दूओं की भावना और आस्था से जुड़े राम मंदिर में जो पुरावशेष मिले हैं उन्हें सहेज कर किसी संग्रहालय में रखा जा सके। 


राम मंदिर - निर्णय से लेकर निर्माण तक 

अयोध्या में राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम फैसला आने तक यह एक विवादास्पद विषय बन गया था। जिसे न केवल धार्मिक तौर पर देखा जा रहा था बल्कि इसके राजनीतिक फायदे भी उठाए जा रहे थे।आइए जानेके हैं इस विवादित की शुरुआत कब, कहां, कैसे और किसने की ? इसे एक घटनाक्रम के रूप में समझते हैं - 

1528 : पहले मुगल बादशाह बाबर ने माना था कि उसने बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था।

1885 : महंत रघुबीर दास बाबरी मस्जिद के आसपास के क्षेत्र में मंदिर निर्माण की अनुमति मांगने के लिए फैजाबाद अदालत गए, जहां उनकी याचिका खारिज कर दी गई है।

22-23 दिसंबर, 1949 : भगवान राम की मूर्तियों को रहस्यमय तरीके से मस्जिद के अंदर पाया गया।

1950 : गोपाल विशारद और रामचंद्र दास मूर्तियों की पूजा करने की अनुमति के लिए फैजाबाद अदालत गए।

1959 : निर्मोही अखाड़ा ने विवादित भूमि पर कब्जे की याचिका दायर की।

1961 : केंद्रीय सुन्नी वक्फ बोर्ड, यूपी ने मस्जिद के अंदर विवादित भूमि के शीर्षक की घोषणा और मूर्तियों को हटाने के लिए अदालत का रुख किया।

फरवरी 1986 : फैजाबाद अदालत ने हिंदुओं को मूर्तियों की पूजा करने की अनुमति दी।

अगस्त 1989 : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवाद पर हस्तक्षेप किया। नवंबर 1989 : राजीव गांधी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) को विवादित स्थल के पास पूजा करने की अनुमति दी।

सितंबर 1990 : भाजपा नेता एल.के. आडवाणी ने रथयात्रा शुरू की।

दिसंबर 1992 : कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया। जांच के लिए जस्टिस लिब्रहान आयोग नियुक्त किया गया।

1993 : पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने विवादित स्थल से सटे 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया। सुप्रीम कोर्ट ने डॉ इस्माइल फारुकी फैसले में अधिग्रहण को समाप्त कर दिया।

अप्रैल 2002 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टाइटल सूट की सुनवाई शुरू की।

मार्च 2003 : सुप्रीम कोर्ट नेअधिग्रहित भूमि में धार्मिक गतिविधि पर प्रतिबंध लगा दिया। 

2009 : लिब्रहान कमेटी ने जांच रिपोर्ट सौंपी।

30 सितंबर, 2010 : हाई कोर्ट ने हिंदुओं, मुसलमानों और निर्मोही अखाड़ा के बीच विवादित संपत्ति के तीन-तरफ़ा विभाजन के लिए बहुमत का फैसला सुनाया।

मई 2011 : सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों द्वारा दायर क्रॉस-अपीलों पर उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा।

अगस्त 2017 : जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने अपील पर सुनवाई शुरू की। मुख्य शीर्षक मुद्दा साइड-ट्रैक है। मुस्लिम पक्ष फ़ारुक़ी फैसले में किए गए एक विवादास्पद अवलोकन का संदर्भ चाहते हैं कि मस्जिदों में पूजा करना इस्लाम के लिए संविधान पीठ के लिए अभिन्न अंग नहीं है। बहुमत के फैसले को प्रार्थना में कमी के रूप में सुनाया जाता है।

जनवरी 2019 : भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई में पांच न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ ने अपील की सुनवाई शुरू की लेकिन मध्यस्थता का सुझाव दिया।

6 अगस्त, 2019 : मध्यस्थता समिति के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एफ.एम.आई. कलीफुल्ला एक सर्वसम्मति और अदालत की सुनवाई शुरू करने में विफल रहें।

16 अक्टूबर, 2019 : 40 दिनों की सुनवाई के बाद, संविधान पीठ ने फैसला सुनाया।

9 नवंबर, 2019 : संविधान पीठ ने विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया। यह सरकार को अयोध्या में एक प्रमुख स्थान पर मुसलमानों को पांच एकड़ भूमि प्रदान करने का आदेश दिया गया।


जब मिले राम के पुरावशेष

राम जन्मभूमि में जब-जब खुदाई हुई है तो उसमें मिले पुरावशेष वहां वर्षों पहले किसी प्राचीन मंदिर के होने के ही संकेत देते हैं। पहली बार राम जन्मभूमि में राम चबूतरा के निर्माण के लिए अधिग्रहीत परिसर में कारसेवा के दौरान की गई खुदाई में डेढ़ सौ से अधिक पुरावशेष मिले थे जो अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय में रखकर संरक्षित हैं। इन पुरावशेषों में उमा माहेश्वर की पाषाण प्रतिमा, विष्णु की पाषाण प्रतिमा, नंदी व कुबेर की पाषाण प्रतिमा के अलावा आमलक, कई प्रस्तर खंड मिले थे। दूसरी बार हाईकोर्ट के निर्देश पर एएसआई ने उस समय के विवादित स्थल की खुदाई तथ्यों को जानने के लिए की थी। जिसमें मिले पुरावशेष भी यही बता रहे थे कि कि यहां वर्षों पुराना अति प्राचीन मंदिर था जिसे विहिप के साथ सभी रामभक्त राम जन्मभूमि मंदिर बताते हैं।जेसीबी से हो रही खुदाई में मंदिर के आमलक मूर्ति युक्त पाषाण के खंभे, प्राचीन कुंआ, मंदिर के चौखट मिले हैं।


परिसर में बनेगा संग्रहालय

ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय राम जन्मभूमि परिसर को बहुत बेहतर, संरक्षित और सुरक्षित ढंग से समतलीकरण कराने में लगे हुए हैं। इस दौरान मंदिर के मिले पुरावशेष से वह भी काफी प्रसन्न हैं। उनका कहना है कि अभी समतलीकरण के दौरान और भी पुरावशेष मिलेंगे जिसे जिलाधिकारी और पुरातत्व विभाग की देखरेख में संरक्षित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि राम जन्मभूमि परिसर में ही एक संग्रहालय बनाने की योजना पर विचार किया जा रहा है। इस विषय का सभी ट्रस्ट सदस्यों के सम्मुख विचार के लिए रखा जाएगा। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की देखरेख में विगत 11 मई से रामलला के गर्भ गृह का समतलीकरण के कार्य किया जा रहा है जिसमें प्राचीन मंदिर के अवशेष प्राप्त हो रहे हैं। इसको लेकर रामनगरी के संत, धर्माचार्यों के साथ राम भक्त भी आह्लादित हैं।


राम चबूतरे की खुदाई में मिले थे पुरावशेष 

अंतर्राष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय में राम जन्मभूमि में राम चबूतरा के निर्माण के लिए 22 जुलाई 1992 से तत्कालीन केंद्र व प्रदेश सरकारों के सहयोग से विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की ओर से अधिग्रहीत परिसर में कारसेवा की गई थी। कारसेवकों ने राम जन्मभूमि पर राम चबूतरा बनाने के लिए 12 फिट खुदाई की थी जिसमें उमा माहेश्वर की पाषाण प्रतिमा, विष्णु की पाषाण प्रतिमा, नंदी व कुबेर की पाषाण प्रतिमा के अलावा आमलक, कई प्रस्तर खंड सहित डेढ़ सौ से अधिक पुरावशेष मिले थे। यह सभी पुरावशेष रामनगरी में स्थित अंतरराष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय एवं आर्ट गैलरी में संरक्षित हैं। संस्कृत विभाग के संग्रहालय के उपनिदेशक योगेश कुमार ने बताया कि राम जन्मभूमि की पुरातत्व विभाग की ओर से हुई खुदाई में मिले सभी प्रमाण यहां पर भली भांति संरक्षित है। अनुमति पर कभी भी कोई राम भक्त आकर दर्शन कर सकता है।


सुप्रीम कोर्ट का वो ऐतिहासिक फैसला

अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर सालों से कोर्ट में मामला चल रहा था। 9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन को राम जन्मभूमि मानते हुए मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार को सौंपने और उसी के लिए एक ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया था। इसी तरह शीर्ष अदालत ने सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए अन्य जगह पर पांच एकड़ जमीन देने का आदेश दिए था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों के आधार पर होते हैं और अयोध्या मामले में भी देश की सबसे बड़ी अदालत ने वैसा ही किया है। जैसा कि पहले से ही माना जा रहा था और आगे भी माना जाएगा कि ये ऐतिहासिक फैसलों में भी ऐतिहासिक निर्णय है। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या केस में जो फैसला सुनाया है उसे बड़े लंबे अरसे तक 'न भूतो न भविष्यति' कैटेगरी में रखा जाएगा। अयोध्या केस में फैसला सुनाने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने वे सारे तौर तरीके अख्तियार किये जो संभव रहे। मध्यस्थता की आखिरी कोशिश में भी कभी दखल नहीं दिया, बल्कि सुनवाई के साथ साथ जारी रखने की पूरी छूट दी। अयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए कानूनी प्रक्रिया के समानांतर राजनीतिक और गैर राजनीतिक प्रयास भी कम नहीं हुए, लेकिन कभी बात नहीं बन पायी। जब हर उपाय नाकाम नजर आया तो सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही फैसला सुनाने का फैसला किया - बहरहाल, अंत भला तो सब भला।


उत्खनन पर इतिहासोंकारों की राय

स्वतंत्र लेखक प्रदीप भार्गव लिखते हैं इसमें कोई दो राय नहीं कि सत्य के उद्घाटन के अतिरिक्त इतिहास की कोई वैचारिक अथवा सांस्कृतिक प्रतिबद्धता नहीं होनी चाहिए। इतिहास में धर्मनिरपेक्ष सोच अथवा पंथनिरपेक्ष मूल्यों का भी समावेश नहीं होना चाहिए क्योंकि तटस्थ दृष्टिकोण से लिखा इतिहास तो होता ही धर्म अथवा पंथ निरपेक्ष है। इतिहास आस्था का आधार अथवा विश्वास का प्रतीक भी नहीं होना चाहिए क्योंकि आस्थाएं विवेक और तर्क का शमन करती हैं। इतिहास बौद्धिक कट्टरता का निष्ठावान अनुयायी भी नहीं होना चाहिए क्योंकि इतिहास से संबद्ध सांस्कृतिक संकीर्णताएं सांप्रदायिकता से कम खतरनाक नहीं है। इसलिए जब किसी प्रकरण से जुड़े नए साक्ष्य और प्रमाण उपलब्ध हुए हों तो उनकी प्रामाणिकता सत्यापित होने पर इतिहास दृष्टि बदलना जरूरी हो जाता है। दरअसल कालांतर में इतिहास की वही लिपिबद्धता सार्थक और शाश्वत होगी जो अतीत को वर्तमान साक्ष्यों और प्रमाणों के आधार पर यथावत प्रस्तुत करेगी। इस दृष्टि से हमारे तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवी अयोध्या विवाद से जुड़े मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की उस रिपोर्ट को सर्वथा नकारते रहे हैं, जो मंदिर मुद्दे को सुलझाने में प्रमुख आधार बनी थी। 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा विवादित स्थल पर कराए उत्खनन रिपोर्ट को इन इतिहासकारों ने सर्वथा नकार दिया था।


अयोध्या विवाद के सिलसिले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खण्डपीठ लखनऊ के फैसले का जनता-जर्नादन ने सम्मान किया था। मुद्दे से जुड़े प्रमुख पक्षकारों ने भी मर्यादित बयान देकर संयम व विवेक की परिपक्वता दर्शाई थी। लेकिन तब संकट उन छद्म वामपंथी इतिहासकार और बुद्धिजीवियों की ज्ञान दक्षता ने खड़ा किया, जो बाबरी विवाद में मुस्लिम पक्ष को हर तरह का गोला-बारूद मुहैया कराने में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। चुनौती व दिक्कत उन राजनीतिज्ञों की भी रही जो इस विवाद को भुनाते हुए अपनी राजनीति चमकाने में लगे रहे हैं। इसलिए आहत बुद्धिजीवी कह रहे थे कि इस फैसले में इतिहास, साक्ष्य, तार्किकता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को नजरअंदाज कर धार्मिक आस्था और दिव्यता को मान्यता दी गई है। जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले का आधार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के 574 पृष्ठीय प्रतिवेदन को बनाया था। दरअसल तत्कालीन एएसआई के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक केके मोहम्मद ने सर्वेक्षण में पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर यह माना था कि अयोध्या में विवादित स्थल पर मस्जिद से पहले मंदिर था। तब मस्जिद का जो कथित ढांचा था उसकी दीवारों में मंदिर के स्तंभ थे। स्तंभ के निचले भाग में 11वीं और 12वीं सदी में निर्मित मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बने हुए थे। इसमें विष्णु हरिशिला पटल मिला था। इस पर नागरी लिपि संस्कृत भाषा में लिखा है कि यह मंदिर रावण को मारने वाले भगवान को समर्पित है। केके मोहम्मद ने कहा था कि इस खुदाई को निष्पक्ष रखने के लिए 137 श्रमिकों में से 52 मुस्लिम थे। खुदाई में जो 263 अवशेष मिले थे, उनसे यह प्रमाणित हुआ कि मस्जिद से पहले मंदिर था।


जब-जब इतिहास को किसी भी शासन या व्यक्तियों के प्रति समर्पित किया गया है, उसकी सच्चाई संदेह के दायरों में रही है। कमोबेश भारत के इतिहास का भी यही हश्र हुआ है। अफ्रीका के प्रसिद्ध कवि बोल सोयंको ने 13 नवंबर 1988 को नेहरू व्याख्यानमाला में कहा था, भारत के इतिहास ग्रंथों में जो कुछ लिखा है उसमें हर जगह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। सोयंको का मानना था कि भारत का इतिहास यूरोप के हितों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। दरअसल 10वीं शताब्दी में फारसी लेखक अलवेरूनी ने भारत को गलत तरीके से दुनिया में पेश करने की शुरुआत की थी। इसने लिखा था कि भारतीय लोगों में इतिहास की समझ नहीं है। इसे ही कालांतर में पाश्चात्य अंग्रेज और मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े भारतीय इतिहासकारों ने अपने-अपने ढंग से आगे बढ़ाया। यूरोपियन इतिहासकारों ने लिखा कि भारतीय केवल धर्म और परंपराओं में डूबे रहते हैं, उन्हें बुनियादी चीजों से कोई लेना-देना नहीं है। अंग्रेज जब भारत की सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक और वैज्ञानिक विरासत को देखकर आश्चर्यचकित रह गए तो उन्होंने भारतीय इतिहास की गलत व्याख्या करनी शुरू कर दी। जिसे ढोने की परंपरा आज भी चली आ रही है।


बुद्धिजीवीयों ने की अवशेषों को झूठलाने की कोशिश

विवादित स्थल से पुरातत्वीय उत्खनन में मिले अवशेष और अभिलेख इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों की आंख खोलने वाले प्रमाण साबित होने चाहिए थे लेकिन इन्होंने उत्खनित तथ्यों को झुठलाने का हठ किया। क्योंकि ये अवघारणाएं इनकी सोच और गढ़ी हुई विचारधारा के विपरीत जा रही थीं। जबकि एएसआई द्वारा उत्सर्जित नवीन स्रोतों को शोध का नया आधार बनाकर इतिहास दृष्टि में परिवर्तन लाने की जरूरत थी। इतिहास संबद्ध इन इतिहासकारों की तार्किक विशेषज्ञता कितनी उथली और थोथी थी इसका उल्लेख उच्च न्यायालय के फैसले में माननीय न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल ने करते हुए लिखा था कि तथ्यों के बारे में विशेषज्ञ शुतुरमुर्ग जैसा रुख अपना रहे थे। मुकदमे में ये बुद्धिजीवी सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से स्वतंत्र विषय विशेषज्ञ, इतिहासकार और पुरातत्वेत्ता के रूप में पेश हुए थे। इनके बयान कितने सतही व हास्यास्पद हैं, बतौर बानगी देखिए- सुविरा जायसवाल ने कहा था कि विवादित स्थल के बारे में उन्हें जो भी जानकारी मिली है वे समाचार पत्रों में छपी रपटों और दूसरों की बताई गई जानकारी पर आधारित है। इन्होंने मध्यकाल के इतिहास विशेषज्ञों द्वारा दी राय के आधार पर इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपना बयान अदालत में दर्ज कराया था। प्रकरण में गवाह के रूप में न्यायालय में पेश हुई सुप्रिया वर्मा ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उत्खनन को चुनौती दी थी। लेकिन उनका शर्मनाक पहलू यह रहा था कि उन्होंने एएसआई द्वारा तैयार ग्राउंड पेनिट्रेशन राडार सर्वे रिपोर्ट ही नहीं पढ़ी थी। खुदाई में इस आधुनिक तकनीक का उपयोग न्यायालय के आदेश से हुआ था। सुप्रिया वर्मा और जया मेनन ने एएसआई पर आरोप लगाया था कि आधार स्तंभ खुदाई स्थल पर प्रायोजित ढंग से आरोपित किए गए हैं। लेकिन अदालत ने पाया उत्खनन के दौरान वे स्थल पर मौजूद नहीं थीं। इसी तरह एक अन्य पुरातत्वविद् शिरिन भटनागर ने जिरह के बीच स्वीकारा कि उन्हें मैदान में काम करने का कोई अनुभव नहीं है। कुछ इतिहास पुस्तकों की उन्होंने भूमिकाएं जरूर लिखी हैं।


न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल ने इन विशेषज्ञों के ज्ञान के संदर्भ में तल्ख टिप्पणी करते हुए लिखा, मौलिक शोध अनुसंधान और जरूरी अध्ययन किए बगैर विशेषज्ञों ने अपनी राय दी। इस कारण सद्भाव स्थापित होने की बजाय ये जटिलताएं, वैमनस्य और विवाद पैदा करने में सहायक बने। देश में जब-जब कोई विचारक, चिंतक, लेखक अथवा इतिहासकार, वेद उपनिषद् पुराण या अन्य प्राचीन ग्रंथ और आध्यात्मिक ज्ञान की नई देनों के साथ आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करता है तो वामपंथियों का उसका उपहास करना एक स्थायी स्वभाव बन गया है। परंतु राममंदिर के सिलसिले में जो नित नए साक्ष्य सामने आ रहे हैं, उनसे उनकी बोलती बंद है।

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