कोलोंबिया एशिया यशवंतपुर ब्रांच की घटना - लापरवाही के भेंट चढ़ते मरीज़- मरीज़ों की जान की कीमत क्या ?

Total Views : 379
Zoom In Zoom Out Read Later Print

- भारत में विदेशी कंपनियां केवल व्यवसाय करती है बेंगलूरु, (परिवर्तन)। विदेशी कंपनी भारत में केवल व्यवसाय के विस्तार के उद्देश्य से ही आती हैं। भारत में मेडिकल के क्षेत्र में जितनी भी विदेशी कंपनियां हैं, उन्हें यहां मरीजों के जान की परवाह नहीं है, उन्हें पीड़ितों के दर्द का एहसास भी नहीं है।

उनका उद्देश्य केवल भारतीय को बरगला कर पैसे कमाना है। अपने पाठकों की शिकायत पर हमने इस मामले को संज्ञान में लिया था। पिछले दिनों ऐसी एक घटना का विस्तार हमें प्राप्त हुआ जो हमने अपने अन्य पाठकों के साथ साझा किया था, कि कैसे प्रसिद्ध कोलोंबिया एशिया अस्पताल द्वारा मरीजों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हुए उनके साथ हुर्व्यवहार किया जा रहा है। इस घटना को लेकर हमने जब अस्पताल प्रशासन से जवाब मांगा तो उन्होंने सीधे तौर पर इंकार कर दिया। इतना ही नहीं जब कोलोंबिया एशिय़ा के विदेशी मालिक डैनियल बैटी से ईमेल के माध्यम से संपर्क करना चाहा और उन्हें भारत में मानव सेवा के नाम पर चलाए जा रहे व्यवसाय को लेकर जवाब मांगा तो उनकी ओर से भी किसी प्रकार का जवाब हमें नहीं मिला। आज इस घटना को गंभीरता से लेने की जरूरत है और केंद्र व राज्य सरकार को इस पर कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है।  



कोलंबिया एशिया के मालिक कौन हैं

डैनियल बैटी, कोलंबिया पैसिफिक मैनेजमेंट, आईएनसी, कोलंबिया पैसिफिक एडवाइजर्स, कोलंबिया पैसिफिक वेल्थ मैनेजमेंट और दुनिया के प्रमुख वरिष्ठ आवास और अंतरराष्ट्रीय अस्पतालों के संस्थापक हैं। उन्होंने एमेरिटस के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया, जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित फ्रीस्टैंडिंग असिस्टेड जीवित समुदायों के सबसे बड़े और सबसे अनुभवी ऑपरेटरों में से एक है, 1993 में इसकी स्थापना के बाद से, जब तक कि कंपनी 2014 में ब्रुकडेल सीनियर लिविंग को बेच दी गई थी। मिस्टर बैटी ने इससे पहले अमेरिका और कनाडा में सेवानिवृत्ति केंद्रों के सबसे बड़े संचालक के रूप में हॉलिडे रिटायरमेंट कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया था, 1987 में इसकी बिक्री 2007 में लगभग 7 बिलियन डॉलर में फोर्ट्रेस इन्वेस्टमेंट ग्रुप को हुई थी। वह सफलतापूर्वक 40 वर्षों से निजी कंपनियों में निवेश और विकास कर रहे हैं।


डैनियल बैटी से परिवर्तन का सात सवाल 

  • क्या आपके पास मरीजों की शिकायतों से निपटने के लिए एक मानक प्रोटोकॉल है और क्या रोगियों को इसके बारे में जानकारी दी गई है?

  • आप यह कैसे सुनिश्चित करते हैं कि भोजन के लिए स्वच्छता मानकों का अनुपालन अस्पतालों द्वारा किया जा रहा है, आपके अस्पताल द्वारा रोगी को परोसे गए फ्राइड राइस में एक मरी मक्खी पाई गई थी?

  • यदि यह घटना संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई होती तो क्या आपका फर्म इसी तरह से कार्य करता, जैसा भारत में प्रतिक्रिया दी जा रही है। क्या आपकी प्रतिक्रिया त्वचा के रंग द्वारा निर्देशित है?

  • क्या इस तरह की शिकायतों से निपटने के लिए कोई लोकपाल है, जो स्थानीय प्रबंधन के असली चेहरे को सामने लाने में मदद करेगा?

  • पिछले तीन वर्षों में आपको भोजन और स्वच्छता के बारे में कितनी शिकायतें मिली हैं?

  • आपने इस घटना के लिए जिम्मेदार अपने कर्मचारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की है?

  • उस समय फ्राइड राइस कितने रोगियों को परोसा गया था, क्या उन सभी को सूचित किया गया था कि एक मरीज़ को मरी हुई मक्खी मिली थी?

परिवर्तन समाचार पत्र ने श्रीमान बैटी से इन सवालों का जवाब मांगा थास लेकिन अफसोस की बात ये है कि खराब प्रबंधन ने इन सवालों को भी अनदेखा कर दिया।


क्या है घटना

सुनीता को किडनी में स्टोन होने की पुष्टी होने के बाद बीते दो मई को सुनीता को अस्पताल में एडमिट होने की सलाह दी गई। अस्पताल में जाने के बाद उसे विभिन्न प्रकार की टेस्ट करवाने का हवाला देकर करीब दो घंटे तक बाहर बैठने को कहा गया। उस वक्त सुनीता को 102 बुखार था, जिसे अस्पताल कर्मियों द्वारा सीधे तौर पर अनदेखा किया गया। टेस्ट कराने और पैसे एंठने के नाम पर सुनीता को दर्द और बुखार से तड़पता छोड़ दिया गया। दर्द से परेशान, बेबस सुनीता करीब दो घंटे तक दर्द से तड़पती रही। उसके पति से प्राप्त जानकारी के अनुसार सुनीता को ऐसे एक जगह पर बैठने के लिए कहा गया जहां एक कुर्सी तक उपलब्ध नहीं थी। तेज़ बुखार और कमजोरी की वजह से सुनीता की हालत काफी खराब हो गई थी। अस्पताल में पैसे जमा कराने के बाद सुनीता के पति ने उसका अस्पताल में दाख़िला कराया। 


घटना यहीं समाप्त नहीं हुई। अस्पताल में भर्ती के बाद डॉक्टरों ने उन्हें कुछ दिनों के लिए अंडर ऑबजर्वेशन रखा और इस बीच ऑपरेशन से पहले होने वाले सभी जांच भी किए गए। इस बीच जब सुनीता को अस्पताल की ओर तरबूज़ का जूस पीने को दिया तो उसमें से अजीब से सड़न की बदबू आ रही थी। उसने अपने पति से इसकी शिकायत की। उन्होंने समझा कि शायद इसमें किसी प्रकार की दवा मिलाई गई है जिसकी वजह से ऐसी स्मेल आ रही है। इस जूस को पीने के बाद सुनीता को करीब पांच बार उल्टियां हुई। जिसके बाद उसे उल्टियां बंद होने के लिए इंजेक्शन दिया गया। अस्पताल स्टाफ ने इस बात की जानकारी सुनीता की जांच कर रहे डॉक्टर को नहीं दी। 


इसके बाद उन्होंने अस्पताल की कैंटीन से वेज फ्राइड राइस ऑर्डर किया। करीब चार - पांच स्पून खाने के बाद सुनीता को उस फ्राइड राइस में से एक मरी हुई मक्खी मिली। उसने जब यह बात अपने पति को बताई तो उन्होंने अस्पताल स्टाफ से इस बात की शिकायत की। उन्होंने कहा कि हम प्लेट बदल देते हैं। मानस ने इसकी शिकायत सुनीता की जांच करने वाले डॉक्टर को भी बतानी चाही लेकिन स्टाफ ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। उन्होंने मानस से कहा कि अगर आपको अस्पताल के खाने से शिकायत है तो आप अपना खाना घर से लेकर आए। मानस ने सुनीता के लिए घर से खाना लाना ही बेहतर समझा। घर से खाना लेकर जब वे लौट रहे थे तो उन्हें अस्पताल के मुख्य द्वार पर ये कहते हुए रोक दिया गया कि अस्पताल में घर से लाया हुआ खाना अलाउड नहीं है। ये बात सुनकर मानस को काफी गुस्सा आया उसने तंग आकर अस्पताल प्रबंधन से इसकी शिकायत करनी चाही लेकिन उन्हें प्रबंधन से मिलने की इजाज़त नहीं दी गई। उन्होंने अस्पताल के स्टाफ द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार की कहानी अस्पताल के फ्लोर मैनेजर को बताई। उन्होंने मानस को बताया कि ड्यूटी कर रहे स्टाफ के शिफ्ट बदलने की वजह से उन्हें गेट पर रोका गया। हालांकि फ्लोर मैनेजर ने भी इस घटना को लेकर किसी प्रकार की लिखित शिकायत लेने से साफ इंकार कर दिया। इतना ही नहीं मानस ने जब इस पूरे घटना की जानकारी हमारे समाचार पत्र ‘परिवर्तन’ को दी तो अस्पताल स्टाफ ने उन्हें सुनीता के ऑपरेशन को क्रिटिकल बताते हुए उन्हें सीधे तौर पर धमकाना शुरु कर दिया। मानस को उन्होंने कहा कि सुनीता की हालत नाज़ुक है और ऑपरेशन के समय कुछ भी हो सकता है। 


अस्पताल प्रबंधन, स्टाफ की इस लापरवाही की वजह से सुनीता और मानस को काफी मानसिक व शारीरिक तनाव का सामना करना पड़ा। सुनीता और उसके परिवार के साथ हुए इस अमानवीय व्यवहार के लिए अस्पताल स्टाफ को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। इस घटना के संबंध में शिकायत मिलने पर कोलोंबिया एशिया अस्पताल द्वारा सुनीता और उसके परिवार के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार को लेकर जब हमारे समाचार पत्र ‘परिवर्तन’ के प्रतिनिधि ने अस्पताल प्रबंधन से बात करनी चाही तो उन्होंने सीधे तौर पर बात करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ये अस्पताल का निजी मामला है और इस पर कोई दख़लअंदाज़ी न किया जाए। उन्होंने बताया कि अस्पताल इसे अपने तरीके से संभालने की कोशिश करेगा। 


अस्पताल में सेनिटाइज़र तक नहीं

यशवंतपुर स्थित कोलोंबिया एशिया अस्पताल में जब समाचार ‘परिवर्तन’ के प्रतिनिधि इस घटना की जानकारी लेने पहुंचे तो उन्होंने देखा कि अस्पताल के रिसेप्शन में सेनिटाइरज तक नहीं रखा गया है। मालूम हो कि कोरोना वायरस महामारी से लड़ने के लिए सरकार द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों में ये स्पष्ट रूप से कहा गया है कि समय समय पर अपने हाथों को सेनिटाइज करते रहना चाहिए। इससे कोरोना वायरस से लड़ा जा सकता है। कहा गया है कि अस्पताल जैसी जगहों में जहां रोज़ाना सैंकड़ों मरीज़ जांच के लिए आते हैं वहां सभी को सेनिटाइज़र का इस्तेमाल करना अनिवार्य हैं। लेकिन कोलोंबिया एशिया अस्पताल में सरकार द्वारा दिए गए इन नियमों की धजिया उड़ाई जा रही है। जब हमारे प्रतिनिधि ने स्टाफ से सेनिटाइजर की मांग की तो उन्होंने कहा कि ये केवल अस्पताल स्टाफ के लिए है और नर्स के पास उपलब्ध है। 


अस्पताल के खिलाफ सरकार लें कोई ठोस कदम

कोलोंबिया एशिया जैसे इतने बड़े और निजी अस्पताल द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। शहर में न जाने हर रोज़ कितने ही ऐसे केसेस सामने आ रहे हैं। राज्य सरकार को निजी अस्पतालों द्वारा किए जा रहे इस प्रकार की मनमानी को रोका जाना चाहिए। एवं उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। मालूम हो कि कोलोंबिया एशिया देश के उन चुनिंदा निजी अस्पतालों में से एक है जहां इलाज न केवल महंगा होता है बल्कि यहां आसानी से भर्ती पाना भी संभव नहीं हो पाता है। आपको बता दें कि ये कोई पहली घटना नहीं है जब कोलोंबिया एशिया अस्पताल के खिलाफ किसी पीड़ित ने आवाज़ उठाई है। इससे पहले भी कई बार कोलोंबिया एशिया में मरीज़ों के साथ किए जा रहे अमानवीय व्यवहारों की घटनाएँ सामने आती रही है। लेकिन अक्सर ऐसे निजी अस्पताल अपने बल और धन का प्रयोग कर ऐसी घटनाओं को दबा देते हैं। हालांकि कई मामलों के बावजूद न तो राज्य सरकार ने और न ही केंद्र सरकार ने इन घटनाओं को महत्ता दी और न ही इन निजी अस्पतालों की खिलाफ कोई कार्रवाई की गई। केंद्र और राज्य सरकार को मानव सुरक्षा हेतु ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए और मानव सेवा के नाम पर व्यवसाय चलाने वाले एवं मनमानी कर रहे सभी निजी अस्पतालों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाने चाहिए। 


नोट - हमारे सभी पाठकों को ये सूचित किया जाता है कि शहर के किसी भी निजी अस्पताल द्वारा अगर आपके साथ कभी भी ऐसा कोई अमानवीय व्यवहार किया गया है, या फिर आपको भी अस्पताल के डॉक्टरों, प्रबंधन या स्टाफ के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा है तो आप हमारे अख़बार के माध्यम से अपनी कहानी लोगो तक पहुंचा सकते हैं। क्या पता आपकी इस छोटी सी कोशिश से आने वाले दिनों में अन्य लोगों को ऐसे अस्पतालों के गोरखधंधे की जानकारी मिले, जिसे वे अक्सर मनावसेवा की आड़ में चलते है। अपनी कहानी हमसे बेझिक साझा करे, और भरोसा रखें आपकी लड़ाई में समाचार परिवर्तन आपके साथ सदैव खड़ा रहेगा। आपकी पहचान को गोपनीय रखा जाएगा। हमसे संपर्क करें - editor@thearyavarthexpress.com

See More

Latest Photos