बिहार की दुर्दशा का ठिकरा किसके सिर फोड़ें ?

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। देश में कोरोना का कहर दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। ऐसे में देश के अलग अलग हिस्सों में फंसे मज़दूरों की हालत सबसे ज्यादा खस्ता हुई है। देश में पिछले डेढ़ महीने से लॉकडाउन घोषित किया गया है, और इस लॉकडाउन में सबसे ज्यादा ये मज़दूर ही पीस रहे हैं।

एक आंकड़ा बताता है कि देश के अलग अलग हिस्सों में काम की तलाश में जाने वाले कुल श्रमिकों या मज़दूरों की संख्या करीब दो करोड़ से भी ज्यादा है और एक अकेले बिहार से ही तकरीबन 19 लाख मजदूर अपने राज्य को छोड़ अच्छी नौकरी की तलाश में दर-ब-दर भटक रहे हैं। अब कोरोना वायरस महामारी के फैलते ही बिहार के श्रमिकों को विभिन्न राज्यों से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि ये लाचार और मजबूर श्रमिक जाएंगे कहां। डेढ़ महीने से ये मज़दूर विभिन्न राज्यों से पैदल ही अपने गृह राज्य के लिए निकले हैं। कुछ ने रास्ते में ही अपना दम तक तोड़ दिया। लेकिन फिर भी बिहार सरकार ने इन मज़दूरों और श्रमिकों के लिए मदद का हाथ आगे नहीं बढ़ाया। 

घिनौनी राजनीति देश की हर छोटी बड़ी पार्टियों द्वारा की जाती है, लेकिन महामारी के इस नाज़ुक समय में भी बिहार की नीतीश सरकार जिस राजनीति के तहत कार्य कर रही है, वह काफी निंदनीय है। सवाल ये उठता है कि आखिर इतने वर्षों में नीतीश कुमार की सरकार ने किया क्या है ? न तो उन्होंने लोगों को रोज़गार दिया, न उन्होंने बच्चों को उच्च शिक्षा दी, न तो उन्होंने ग़रीबों उनका हक दिया, और न ही उन्होंने विभिन्न प्रांतों में रह रहे अपने राज्य के लोगों के हितों की रक्षा की? अगर ग़ौर करें तो ये समझ सकेंगे कि बिहार आज से 15 वर्ष पहले जहां था, आज भी वहीं है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सुशासन के नाम पर केवल बदहाली देने वाले नीतीश कुमार को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए और राजनीति दायित्वों का उचित दिशा में पालन न करने की स्थिति में राजनीति से सन्यास ले लेनी चाहिए।     

बिहार की बदहाली


आज बिहार का नाम भारत के इतिहास में भले ही गौरवशाली और स्वर्णिम अक्षरों में लिखा हो लेकिन आज बिहार की दुर्दशा देख ऐसा लगता है मानो इसके इतिहास की गाथा को लोगों ने यूं ही भूला दिया है। आज जहां भी देखो बिहार के ग़ौरवशाली इतिहास के चर्चे से ज्यादा बिहार की बदहाली के चर्चे किए जाते हैं। इसके लिए किसी एक व्यक्ति को ज़िम्मेदार ठहराना शायद अक्लमंदी का कार्य न भी हो लेकिन सच तो यह है कि बिहार की गौरव गाथा को जीवित रखने का प्रयास आज तक किसी भी सरकार ने नहीं किया। जिस भी सरकार ने बिहार में राज किया उन सभी ने राज्य के विकास की दिशा में काफी सीमित कार्य किया। हालांकि बिहार के इतिहास पर नज़र डालें तो हैरानी होगी कि कैसे यहां जन्म लेने वाले हर व्यक्ति ने बिहार को गौरवशाली बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास करते रहें, और आज के दृश्य की कल्पना करें तो स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। आज बिहार के लोग वहां रहना नहीं चाहते। 

क्यों करते हैं बिहार से लोग पलायन


बिहार राज्य से इतने लोगों का पलायन करने का मुख्य कारण बेरोजगारी, गरीबी, बेहतर सुख- सुविधाएं का अभाव है। भले ही कितनी सरकारें बदल जाये लेकिन बिहार के लोगों को रोज़गार, बिजली, अच्छी सड़कें, अच्छे अस्पताल, अच्छी परिवहन सुविधा, बेहतर कानून व्यवस्था, बेहतर न्याय व्यवस्था देने में नाकाम रही हैं। इसलिए पलायन बढ़ रहा है। रही बात पलायन करने की तो पूरे भारत में सिर्फ बिहारियों या उत्तर प्रदेश के लोग ही नहीं पलायन किये हैं। ऐसे बहुत से राज्य के बहुत से लोग हैं जिन्होंने दूसरे राज्य में पलायन किया है। हालांकि सच ये भी है कि लोग सिर्फ बिहारियों और उत्तर प्रदेश वालों को दोष देते हैं। हाँ माना कि वे संख्या में ज्यादा हैं पर यह उनकी गलती क्या है। वे भारत के दूसरे राज्य में ज्यादातर बेहतर रोजगार पाने के लिए जाते हैं। भारत के प्राचीन काल में बिहार के रिश्ते भारत के सभी राज्यों से काफी बेहतर थे। पाटलिपुत्र देश की राजधानी हुआ करती थी। धनानंद, चंदृगुप्त, सम्राट अशोक के दौर में यह राज्य फल फूल रहा था। प्राचीन तथा सबसे अमीर राज्य हुआ करता था। देश में कई शासक आए जिस वजह से देश की राजधानी में परिवर्तन हुए। कभी दिल्ली, कभी आगरा, कभी कलकत्ता, कभी उज्जैन, कभी ग्वालियर। इस तरह देश की राजधानी में परिवर्तन होना शुरू हुआ। 

क्या सरकार की सड़ी-गली नीतियां है ज़िम्मेदार 


ये सच है कि बिहार से लोग पलायन कर अन्य राज्यों में रोज़गार के लिए जाते थे और इसके लिए कुछ बुद्धिजीवी लोग लालू यादव को ज़िम्मेदार मानते हैं। परंतु लालू को गए एक दशक से ज़्यादा बीत चुका है और पलायन अब भी जारी है। सरकारी आँकड़ें शायद ये कहे कि स्थिति में सुधार हुआ है तो ये मज़ाक़ होगा। वास्तविकता जानने के लिए आप बिहार से खुलने वाली और दिल्ली पंजाब हरियाणा या दक्षिण भारत को जाने वाली जेनरल डब्बों वाली ट्रेन को दूर से ही देख इसकी भयावहता का आकलन कर सकते हैं। सीधी बात है यहाँ रोज़गार के अवसर प्राप्त न होने की वजह से ऐसा हो रहा है जिसके लिए सरकार और उसकी सड़ी-गली नीति ज़िम्मेदार है। उद्योग लगाने में आने वाली अड़चनो की वजह से उद्यमी यहाँ उद्योग लगाने से कतराते है जबकि वही उद्यमी अन्य राज्यों में बड़ी सुगमता से अपना उद्योग स्थापित कर लेते हैं।


खेती के लिए न लोगों के पास उतनी ज़मीन है और न ही अनाज से होने वाला आय उनके लिए समुचित है। यहाँ हर सरकार का प्रमुख काम अपना सत्ता बचाना ही है। वे जनहित के बारे में न सोच सिर्फ़ स्वहित के बारे में सोचते हैं। पलायन करने वाले लोगों में एक बड़ा तबक़ा यहाँ के छात्रों का होता है जो अन्य राज्य जाकर ‘गुणवत्तापूर्ण’ शिक्षा प्राप्त करते है जिससे हमारी राज्य के सीमाओं के अंदर की अर्थव्यवस्था चौपट होती है। राज्य का बहुत सारा पैसा अन्य राज्यों की अर्थव्यवस्था को सुधारने में व्यय हो जाता है। इसको हम एक उदाहरण से समझ सकते है। मान लें बिहार से सिर्फ़ एक लाख विद्यार्थी अन्य राज्य में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए जाते है, जिनकी सालाना फ़ीस एक लाख हो (हालाँकि किसी राज्य में ये फ़ीस ज़्यादा भी होती है)। उनके रहने तथा अन्य व्यय पचास हज़ार मान ले तो साधारण गणित के हिसाब से ये आँकड़े आते हैं। कुल छात्र- 100000 (ये संख्या बेहद कम है, वास्तव में तीन से चार लाख छात्र अन्य राज्यों में पढ़ाई के लिए पलायन करते हैं।) प्रति छात्र व्यय - 150000। जिसका कुल ख़र्च =100000*150000=15000000000 होता है। अगर साफ कहें तो पंद्रह अरब रुपये हर साल बिहार से अन्य राज्यों में वहाँ के लोगों को रोज़गार देने में ख़र्च हो जाते है। जिनमें प्रोफ़ेसर से लेकर चपरासी, दर्ज़ी से लेकर सैलून वाले एवं दूध वाले से लेकर सब्ज़ी वाले तक शामिल हैं और हमारे राज्य के लोग दूसरे राज्यों में धक्के खाने को मजबूर हैं।

नीतीश ने बिहार को क्या दिया


अगर हम बिहार के विकास की बात करें तो पता चलेगा कि पिछले 15 वर्षों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार को विकास के नाम पर केवल ठेंगा दिखाया है। बिहार के कई गांवों और कस्बों का हाल जस का तस है। वहां विकास तो दूर बिजली की समस्या आज भी वैसी ही बनी हुई है। बिहार में न उद्योग है और न ही अच्छे शिक्षण संस्थान जिसकी वजह से वहां के करीब 19 लाख लोग और हर साल करीब दो लाख से ज्यादा विद्यार्थी अन्य राज्यों की ओर चल पड़ते हैं। नीतिश कुमार ने सुशासन और विकास के नाम पर बिहार के लोगों को मुर्ख बनाया है। एक हालिया अध्य्यन से पता चला है कि बिहार की आर्थिक स्थिति अन्य कई राज्यों की तुलना में बेहद कमजोर है। हर वर्ष केंद्र से जो बजट लिया जाता है उसका कितना प्रतिशत अंश बिहार के विकास में जाता है यह कह पाना थोड़ा मुश्किल होगा। इसका अंदाजा आप राज्य के लोगों के पलायन को देख कर समझ सकते हैं। बुद्धिजीवी बताते हैं कि बिहार में शराबबंदी के बाद से राज्य की आर्थिक स्थिति में काफी गिरावट आई है। उनका कहना है कि जनता नीतीश सरकार को अपनी जेब से खर्च करने को तो नहीं कहती लेकिन राज्य सरकार के लिए और राज्य के विकास के लिए जो धन राशि आवंटित की जाती है, कम से कम उसका इस्तेमाल तो सरकार ही सही दिशा में करना चाहिए।  

बीते दिनों बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार कोटा के कोचिंग संस्थानों में पढ़ रहे विद्यार्थियों को लॉकडाउन की अवधि में वहां से वापस लाने के पक्ष में नहीं थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई बार यह कह चुके हैं कि इस तरह से सड़क मार्ग से लोगों के आने-जाने से लॉकडाउन की साथ खिलवाड़ होता है। यह कोरोना संक्रमण के लिहाज से काफी खतरनाक है। मालूम हो कि उत्‍तर प्रदेश की योगी आदित्‍यनाथ सरकार ने कोटा में रह रहे अपने राज्य के विद्यार्थियों को लाने के लिए वहां बसें भेजी हैं। मुख्यमंत्री का कहना है कि यह समय वाहनों के परिचालन का नहीं है। मालूम हो कि राजस्थान के कोटा में पूरे देश के विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लेकिन वहां कोरोना का संक्रमण फैलने के बाद उन विद्यार्थियों को वहां से बाहर निकाल घर पहुंचाने की मांग उठने लगी। मामले को तूल पकड़ता देख राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने ऐसे विद्यार्थियों को वहां से जाने को स्‍वीकृति देने काे तैयार हो गई। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री का रूख कुछ और ही देखने को मिला।

सवालों के कटघरे में नीतिश सरकार


लॉकडाउन के दौरान अन्य राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूरों की घर वापसी को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी और भाजपा में तनातनी नजर आ रही है। राज्य इकाई के अध्यक्ष सहित भाजपा के कई नेताओं ने राज्य सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। वहीं, भाजपा के सहयोगी दल जदयू ने लॉकडाउन से निपटने के नीतीश मॉडल को सबसे प्रभावी बताया है। दोनों पार्टियों में तकरार भाजपा के बिहार अध्यक्ष संजय जायसवाल द्वारा एक फेसबुक पोस्ट में प्रवासी मुद्दे से निपटने में राज्य सरकार के दृष्टिकोण पर सवाल उठाने के बाद आई। जायसवाल ने कहा कि बिहार सरकार के साथ समस्या यह है कि उनका कोई भी अधिकारी मीडिया के सामने यह स्पष्ट नहीं करता है कि किस जोन में किस तरह की दुकानें खुलेंगी या कौन सी ट्रेन बिहार आ रही है और कहां पंजीकरण करवाना है। 

पश्चिम चंपारण से सांसद जायसवाल ने कहा कि राज्य सरकार के रवैये के परिणामस्वरूप, लोग सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ पोस्ट कर रहे हैं। यूपी में योगी सरकार से बिहार सरकार को सबक लेना चाहिए। यूपी के मुख्य सचिव मीडिया को बहुत अच्छी तरह से बताते हैं। वहीं, एमएलसी नवल किशोर यादव के नेतृत्व में भाजपा नेताओं के एक वर्ग ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ की। उन्होंने कहा, नीतीश कुमार से बेहतर देश में कोई सीएम नहीं है। योगी सरकार से सीख लेने पर उन्होंने कहा कि मुझे योगी सरकार के काम के बारे में कुछ भी नहीं पता है। वह (नीतीश कुमार) एक बेहतर सीएम हैं, यही वजह है कि भाजपा उनका समर्थन कर रही है। जदयू ने नीतीश कुमार का बचाव करते हुए कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री लोकलुभावन उपायों में विश्वास नहीं करते हैं। पार्टी के महासचिव केसी त्यागी कहा कि बिहार ने उन गलतियों को नहीं किया है जो यूपी या पंजाब ने कीं। बिहार के सीएम के उपाय यूपी और पंजाब की तुलना में अधिक सुरक्षात्मक और अधिक जवाबदेह हैं। उन्होंने आगे कहा कि अगर उन्होंने केंद्र के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया होता, तो प्रदेश में पॉजिटिव मामलों की संख्या अधिक होती। नीतीश मॉडल ने बिहार को बचाया है। उन्होंने कहा कि हर पार्टी को अपना दृष्टिकोण रखने का अधिकार है।


राजद ने भी इस मामले पर नीतीश कुमार पर हमला किया है। राजद प्रवक्ता भाई बीरेंद्र ने कहा कि सरकार को भाजपा अध्यक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों पर जवाब देने की जरूरत है। जब हमने इस मुद्दे को उठाया तो जदयू नेता नाराज हो गए थे। हम छात्रों की निकासी की मांग कर रहे थे, लेकिन नीतीश कुमार सरकार ने लॉकडाउन के मानदंडों का हवाला देते हुए इसे ठुकरा दिया। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव ने कहा कि राज्य सरकार के पास विभिन्न राज्यों में फंसे लोगों को लाने के लिए कोई निश्चित कार्य योजना नहीं है। नोडल अधिकारियों ने अपने मोबाइल फोन को बंद कर दिए हैं या नंबर मिल नहीं रहे हैं। राज्य सरकार प्रवासियों से टिकट भी ले रही है।

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