देश की इकॉनोमी और पेट्रोल की कीमत

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)

तेल की कीमतों के रसातल में जाने से इस साल पेट्रोल की कीमतों में तेजी से गिरावट होने का अंदाज़ा विशेषज्ञों ने लगाया था। लेकिन देश के अलग अलग हिस्सों में लगातार बढ़ते पेट्रोल और डीजल की कीमतों को देख ऐसा नहीं लगता। दिल्ली पेट्रोल की कीमत में 1 रुपए 67 पैसे और डीज़ल की कीमत में 7 रुपए 10 पैसे का इज़ाफा किया जा चुका है। हम सब ये जानते हैं कि कोरोना वायरस महामारी के कारण दुनियाभर में तेल की खपत निचले स्तर पर पहुंचने से कच्चे तेल की कीमतों का रसातल में जाने का सिलसिला बरकरार है। अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडियट क्रूड की कीमत माइनस में पहुंचने के बाद ब्रेंट क्रूड का भाव मंगलवार को कारोबार के दौरान 20 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे चला गया। ब्रेंट कच्चा तेल का यह 2001 के बाद सबसे निचला भाव है। यूरोपीय मानक ब्रेंट कच्चा तेल उतार-चढ़ाव वाले कारोबार के दौरान 18.10 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। बाद में इसमें सुधार देखा गया और यह 21.51 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर कोई राहत नहीं दी जा रही है। बल्कि इसके विपरीत अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम होने के बाद भी भारत में आए दिन पेट्रोल और डीजल के दामों में इजाफा किया जा रहा है। 

रिफाइनरी से पेट्रोल पंप तक के तेल के सफर के दौरान टैक्स, कमीशन और तेल कंपनियों का मुनाफा सामान्य होता है। भारत के संदर्भ में इसे देखें तो रिफाइनरी पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट निकालती हैं। यहां तेल कंपनियां अपना मुनाफा वसूलने के बाद तेल को पेट्रोल पंप तक पहुंचाती हैं। अब पेट्रल पंप मालिक प्रति लीटर तयशुदा कमीशन भी लेता है। रिटेल प्राइस में एक्साइज ड्यूटी और वैट और सेस भी जुड़ता है जिससे उपभोक्ता को अपनी काफी जेब ढीली करनी पड़ती है। यानि कि रिफाइन करने के बाद तेल कंपनियां चार्ज लेकर तेल को आगे बढ़ाती हैं। पिछले महीने तक भारत में तेल कंपनिया पेट्रोल पर प्रति लीटर करीब 14 रुपये और डीजल पर प्रति लीटर करीब 17 रुपये चार्ज ले रही थीं। अब इस पर एक्साइज ड्यूटी और रोड सेस लगता है। पिछले महीने पेट्रोल पर यह प्रति लीटर करीब 20 रुपये और डीजल पर करीब 16 रुपये था। इसके बाद नंबर आता है पेट्रोल पंप मालिक के कमीशन का। वे पेट्रोल पर प्रति लीटर 3.55 रुपये और डीजल पर 2.49 रुपये कमीशन लेती हैं। इन सबके ऊपर फिर वैट लगता है। देश की राजधानी दिल्ली में पेट्रोल-डीजल पर 27 प्रतिशत वैट है। इस तरह क्रूड ऑइल से रिटेल में आते-आते तेल की कीमत करीब 3 से 4 गुना बढ़ जाती हैं। दिल्ली में सरकार ने लॉकडाउन के दौरान शराब की बिक्री पर 70 प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स लगाया है। मामला यहां तो समझ में आता है कि शराब देश के कुछ प्रतिशत लोग ही पीते हैं, लेकिन जहां बात पैट्रोल और डीज़ल जैसे मूलभूत चीजों जैसी हो तो सरकार को थोड़ी रियायत देनी चाहिए। पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी से केवल आम नागरिकों को सिर पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा। 

केंद्र सरकार से हमारा सवाल यह है कि जहां पुरी दुनिया कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के आधार पर पेट्रोल और डीज़ल के दरों में गिरावट कर रही है, वहीं भारत में मांग कम होने के बावजूद तेल की कीमतों में कोई गिरावट क्यों नहीं की जा रही है। क्या ये केंद्र सरकार का दायित्व नहीं है कि वे देश की इकोनॉमी को बचाने के अन्य उपायों को अपनाने के साथ ही साथ तेल की कीमतों में कमी लाकर आम लोगों को राहत दें। 

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