कोलोंबिया एशिया यशवंतपुर ब्रांच की घटना - लापरवाही के भेंट चढ़ते मरीज़

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। शहर के शहकारानगर के रहने वाले मानस (बदला हुआ नाम) की पत्नी सुनीता (बदला हुआ नाम) को किडनी में स्टोन होने की आशंका पर बीते दिनों यशवंतपुर स्थित कोलोंबिया एशिया अस्पताल में इलाज के लिए ले जाया गया।

वहां विभिन्न प्रकार की जांच प्रक्रिया से गुजरने के बाद सुनीता के किडनी में स्टोन होने की पुष्टी हुई। वहां जिस डॉक्टर द्वारा सुनीता का इलाज किया जा रहा था उन्होंने सुझाया कि आपको इसके लिए ऑपरेशन करा लेना चाहिए। सुनीता को दो से तीन दिनों के अंदर अस्पताल में दाख़िला लेने के लिए कहा गया। अस्पताल में दाख़िला लेकर उसके ऑपरेशन होने के पहले तक उसे और उसके परिवार को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपने साथ हुए इस दुर्व्यवहार के बारे में कई ऐसी भी बातें बताई जिसके बाद अस्पताल प्रबंधन और अस्पताल स्टाफ की पोल खुल गई। 



कोलोंबिया एशिया जैसे इतने बड़े और निजी अस्पताल द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। शहर में न जाने हर रोज़ कितने ही ऐसे केसेस सामने आ रहे हैं। राज्य सरकार को निजी अस्पतालों द्वारा किए जा रहे इस प्रकार की मनमानी को रोका जाना चाहिए। एवं उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। मालूम हो कि कोलोंबिया एशिया देश के उन चुनिंदा निजी अस्पतालों में से एक है जहां इलाज न केवल महंगा होता है बल्कि यहां आसानी से भर्ती पाना भी संभव नहीं हो पाता है। आपको बता दें कि ये कोई पहली घटना नहीं है जब कोलोंबिया एशिया अस्पताल के खिलाफ किसी पीड़ित ने आवाज़ उठाई है। इससे पहले भी कई बार कोलोंबिया एशिया में मरीज़ों के साथ किए जा रहे अमानवीय व्यवहारों की घटनाएँ सामने आती रही है। लेकिन अक्सर ऐसे निजी अस्पताल अपने बल और धन का प्रयोग कर ऐसी घटनाओं को दबा देते हैं। हालांकि कई मामलों के बावजूद न तो राज्य सरकार ने और न ही केंद्र सरकार ने इन घटनाओं को महत्ता दी और न ही इन निजी अस्पतालों की खिलाफ कोई कार्रवाई की गई। केंद्र और राज्य सरकार को मानव सुरक्षा हेतु ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए और मानव सेवा के नाम पर व्यवसाय चलाने वाले एवं मनमानी कर रहे सभी निजी अस्पतालों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाने चाहिए। 


क्या है घटना


सुनीता को किडनी में स्टोन होने की पुष्टी होने के बाद उसे जितनी जल्दी हो सके ऑपरेशन करवा लेने की सलाह दी गई। इसके एक ही दिन बाद यानि अगले दिन ही सुनीता को 102 बुखार चढ़ गया। सुनीता का पति मानस अफरा तफरी में उसे अस्पताल ले गया। सुनीता को 102 डिग्री देख कर अस्पताल की नर्स ने उनके पति को पहले कोविड - 19 जांच के लिए करीब 2500 रुपए जमा करने के लिए कहा। अस्पताल की ओर से कहा गया कि जब तक पैसे जमा नहीं करते तब तक उन्हें दाख़िला नहीं दिया जा सकता। दर्द से परेशान, बेबस सुनीता करीब दो घंटे तक दर्द से तड़पती रही। उसके पति से प्राप्त जानकारी के अनुसार सुनीता को ऐसे एक जगह पर बैठने के लिए कहा गया जहां एक कुर्सी तक उपलब्ध नहीं थी। वो दर्द के मारे तड़पति रही। तेज़ बुखार और कमजोरी की वजह से सुनीता की हालत काफी खराब हो गई थी। अस्पताल में पैसे जमा कराने के बाद सुनीता के पति ने उसका अस्पताल में दाख़िला कराया। 


घटना यहीं समाप्त नहीं हुई। अस्पताल में भर्ती के बाद डॉक्टरों ने उन्हें कुछ दिनों के लिए अंडर ऑबजर्वेशन रखा और इस बीच ऑपरेशन से पहले होने वाले सभी जांच भी किए गए। इस बीच बीते सोमवार जब सुनीता को अस्पताल की ओर तरबूज़ का जूस पीने को दिया तो अचानक उसे यह एहसास हुआ कि जूस में से अजीब से सड़न की बदबू आ रही है। उसने अपने पति से इसकी शिकायत की। उन्होंने समझा कि शायद इसमें किसी प्रकार की दवा मिलाई गई है जिसकी वजह से ऐसी स्मेल आ रही है। इस जूस को पीने के बाद सुनीता को करीब पांच बार उल्टियां हुई। जिसके बाद उसे उल्टियां बंद होने के लिए इंजेक्शन दिया गया। अस्पताल स्टाफ ने इस बात की जानकारी सुनीता की जांच कर रहे डॉक्टर को नहीं दी। 


इसके बाद उन्होंने अस्पताल की कैंटीन से वेज फ्राइड राइस ऑर्डर किया। करीब चार - पांच स्पून खाने के बाद सुनीता को उस फ्राइड राइस में से एक मरी हुई मक्खी मिली। उसने जब यह बात अपने पति को बताई तो उन्होंने अस्पताल स्टाफ से इस बात की शिकायत की। उन्होंने कहा कि हम प्लेट बदल देते हैं। मानस ने इसकी शिकायत सुनीता की जांच करने वाले डॉक्टर को भी बतानी चाही लेकिन स्टाफ ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। उन्होंने मानस से कहा कि अगर आपको अस्पताल के खाने से शिकायत है तो आप अपना खाना घर से लेकर आए। मानस ने सुनीता के लिए घर से खाना लाना ही बेहतर समझा। घर से खाना लेकर जब वे लौट रहे थे तो उन्हें अस्पताल के मुख्य द्वार पर ये कहते हुए रोक दिया गया कि अस्पताल में घर से लाया हुआ खाना अलाउड नहीं है। ये बात सुनकर मानस को काफी गुस्सा आया उसने तंग आकर अस्पताल प्रबंधन से इसकी शिकायत करनी चाही लेकिन उन्हें प्रबंधन से मिलने की इजाज़त नहीं दी गई। उन्होंने अस्पताल के स्टाफ द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार की कहानी अस्पताल के फ्लोर मैनेजर को बताई। उन्होंने मानस को बताया कि ड्यूटी कर रहे स्टाफ के शिफ्ट बदलने की वजह से उन्हें गेट पर रोका गया। हालांकि फ्लोर मैनेजर ने भी इस घटना को लेकर किसी प्रकार की लिखित शिकायत लेने से साफ इंकार कर दिया। इतना ही नहीं मानस ने जब इस पूरे घटना की जानकारी हमारे समाचार पत्र ‘परिवर्तन’ को दी तो अस्पताल स्टाफ ने उन्हें सुनीता के ऑपरेशन को क्रिटिकल बताते हुए उन्हें सीधे तौर पर धमकाना शुरु कर दिया। मानस को उन्होंने कहा कि सुनीता की हालत नाज़ुक है और ऑपरेशन के समय कुछ भी हो सकता है। 


उधर सुनीता इन सब घटना के दौरान करीब दो से तीन घंटों तक भुखी रही। दर्द से परेशान और तेज़ भूख से बिलखती रही। अस्पताल प्रबंधन, स्टाफ की इस लापरवाही की वजह से सुनीता और मानस को काफी मानसिक व शारीरिक तनाव का सामना करना पड़ा। इस घटना के वक्त तक अस्पताल स्टाफ ने सुनीता के इलाज में करीब 3 लाख का बिल बना रखा था। सुनीता और उसके परिवार के साथ हुए इस अमानवीय व्यवहार के लिए अस्पताल स्टाफ को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। 


इस घटना के संबंध में शिकायत मिलने पर कोलोंबिया एशिया अस्पताल द्वारा सुनीता और उसके परिवार के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार को लेकर जब हमारे समाचार पत्र ‘परिवर्तन’ के प्रतिनिधि ने अस्पताल प्रबंधन से बात करनी चाही तो उन्होंने सीधे तौर पर बात करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ये अस्पताल का निजी मामला है और इस पर कोई दख़लअंदाज़ी न किया जाए। उन्होंने बताया कि अस्पताल इसे अपने तरीके से संभालने की कोशिश करेगा। 


मानवतता खोते अस्पताल के डॉक्टर्स


आज जिस समय कोरोना वायरस महामारी के समय केवल देश के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के डॉक्टर मानव सेवा को परम धर्म मानते हुए दिन रात लोगों की जान बचा रहे हैं और सेवा प्रदान कर रहे हैं। इन्हीं सबसे बीच कुछ प्राइवेट अस्पतालों के डॉक्टर इस समय भी काम को केवल पैसा कमाने का एक जरिया मानते हैं। यशवंतपुर स्थित कोलोंबिया एशिया भी उन्हीं निजी अस्पतालों में से एक हैं जहां के प्रबंधन, डॉक्टर्स, और अस्पताल के स्टाफ मानवता खो रहे हैं और व्यवसाय को ज्यादा तबज्जो दे रहे हैं। ऐसे में ज़रूरतमंद लोगों और मरीजों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। 


क्या कहते हैं गाइडलाइन्स ?


पिछले दिनों देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निजी अस्पतालों को दिए गए दिशा निर्देशों के अनुसार यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अगर कोई व्यक्ति किसी मेडिकल इमर्जेंसी की हालत में है तो उसके इलाज प्रक्रिया में देरी नहीं होनी चाहिए। अपने विस्तृत निर्देशों में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ तौर पर कहा था कि जरूरतमंद व्यक्ति पर अस्पताल किसी भी प्रकार का दबाव नहीं डाल सकते। आदेश में कहा गया कि उन्हें बिना किसी परेशानी के अस्पताल में भर्ती लिया जाना चाहिए। इन गाइडलाइन्स के अनुसार मनमानी करने वाले सभी निजी अस्पतालों के खिलाफ राज्य सरकारों को सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। 


अस्पताल में सेनिटाइज़र तक नहीं


यशवंतपुर स्थित कोलोंबिया एशिया अस्पताल में जब समाचार ‘परिवर्तन’ के प्रतिनिधि इस घटना की जानकारी लेने पहुंचे तो उन्होंने देखा कि अस्पताल के रिसेप्शन में सेनिटाइरज तक नहीं रखा गया है। मालूम हो कि कोरोना वायरस महामारी से लड़ने के लिए सरकार द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों में ये स्पष्ट रूप से कहा गया है कि समय समय पर अपने हाथों को सेनिटाइज करते रहना चाहिए। इससे कोरोना वायरस से लड़ा जा सकता है। कहा गया है कि अस्पताल जैसी जगहों में जहां रोज़ाना सैंकड़ों मरीज़ जांच के लिए आते हैं वहां सभी को सेनिटाइज़र का इस्तेमाल करना अनिवार्य हैं। लेकिन कोलोंबिया एशिया अस्पताल में सरकार द्वारा दिए गए इन नियमों की धजिया उड़ाई जा रही है। जब हमारे प्रतिनिधि ने स्टाफ से सेनिटाइजर की मांग की तो उन्होंने कहा कि ये केवल अस्पताल स्टाफ के लिए है और नर्स के पास उपलब्ध है। 


नोट - हमारे सभी पाठकों को ये सूचित किया जाता है कि शहर के किसी भी निजी अस्पताल द्वारा अगर आपके साथ कभी भी ऐसा कोई अमानवीय व्यवहार किया गया है, या फिर आपको भी अस्पताल के डॉक्टरों, प्रबंधन या स्टाफ के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा है तो आप हमारे अख़बार के माध्यम से अपनी कहानी लोगो तक पहुंचा सकते हैं। क्या पता आपकी इस छोटी सी कोशिश से आने वाले दिनों में अन्य लोगों को ऐसे अस्पतालों के गोरखधंधे की जानकारी मिले, जिसे वे अक्सर मनावसेवा की आड़ में चलते है। अपनी कहानी हमसे बेझिक साझा करे, और भरोसा रखें आपकी लड़ाई में समाचार परिवर्तन आपके साथ सदैव खड़ा रहेगा। आपकी पहचान को गोपनीय रखा जाएगा। हमसे संपर्क करें - cmdofficeblr@gmail.com

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