उद्योगपतियों का सरकार से सवाल, क्या हम नकदी के ढेर पर बैठे हैं?

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

आज के समय में जब पूरा विश्व लॉकडाउन की परिस्थिति से गुज़र रहा है। हम जिस तरह से गुजर बसर कर रहे हैं, यह काफी दयनीय स्थिति बनती जा रही है। लंबे समय तक चल रहे इस लॉकडाउन की वजह विभिन्न उद्योगों के सभी कारखाने पूरी तरह से बंद हैं। बीते 24 मार्च के बाद से विनिर्माण इकाइयों और कार्यालयों ने अपना काम बंद कर दिया और संक्रामक कोविड - 19 के प्रसार को रोकने के लिए सामाजिक दूरी बनाने की प्रतिज्ञा ले लिया। इस कठिन समय से गुजरने के बावजूद मुट्ठी भर उद्योगपतियों ने एक साथ स्थिति से लड़ने की कोशिश में पीएम केयर फंड को काफी राशि दान दी है और दे भी रहे हैं। लॉकडाउन के तहत जब व्यवसायों में गिरावट आई है और राजस्व आय का दायरा कम से कम या शून्य तक गिर गया है, तो उन्हें अपने कर्मचारियों को पूर्ण वेतन देने के लिए लगातार दबाव डाला जा रहा है। सरकार जबरदस्ती व्यापार मालिकों को अपने कर्मचारियों को बिना किसी संभावित रिटर्न के मुआवजा देने के लिए मजबूर कर रही है। क्या सरकार यह सोच रही है कि उद्योगपतियों के पास कोई खज़ाना है और वे अपने व्यवसाय के हित की परवाह किए बिना कोई भी फैसला लेंगे। इसके अलावा, उद्योगपति या व्यवसाय के मालिक इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी क्यों लेंगे, जब सरकार ने इन कोशिशों में उन्हें बचाने के लिए कोई पहल नहीं की? लॉकडाउन से हो रहे नुकसान का सबसे पहले सामना व्यवसायियों को करना पड़ रहा है लेकिन फिर भी सरकार की ओर से न तो आयकर छूट पर कोई घोषणा की गई है और न ही बैंक ऋणों पर ब्याज दरों में कोई गिरावट लाई गई। वास्तव में नुकसान के बावजूद व्यवसायी वर्ग आगामी दिनों में करों के नाम पर बड़ी मात्रा में भुगतान करने का अनुमान लगा रहे हैं। बड़े और मध्यम स्तरीय उद्योग को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ व्यवसायियों का कहना है कि सरकार के निर्देश के अनुसार श्रमिकों के वेतन को जारी रखने की मांग को मौजूदा आर्थिक स्थिति इजाज़ नहीं देती। देश में उद्योग जगत को स्थित रखने और जाती नौकरियों को बचाने के लिए व्यवसायियों को भी सरकार से सहायता की उम्मीद है। उद्योग मंत्रालय ने कहा कि श्रम मंत्रालय की बेरोजगारी के लाभ को बढ़ाने की योजना राज्य बीमा योजना को समस्या का पैमाना नहीं माना जा सकता है।

दूसरी ओर भारत सरकार ने अपने व्यय में कटौती के लिए कई उपाय किए हैं। केंद्र सरकार ने 1 जनवरी, 2020 से जुलाई 2021 तक केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को देय महंगाई भत्ते (डीए) की अतिरिक्त किस्त का भुगतान नहीं करने का फैसला लिया है। डीए पर पर्दा डालने के फैसले से 48 लाख केंद्र सरकार के कर्मचारी प्रभावित होंगे। रेलवे कर्मचारियों और पेंशनरों के साथ 65 लाख पेंशनभोगी पर सीधा असर होगा। हालाँकि, सरकार ने घोषणा की कि जब जुलाई 2021 से, डीए की भविष्य की किस्तों को जारी करने का निर्णय किया जाएगा, तो पेंशनभोगियों को 1 जनवरी, 2020 से जुलाई 2021 तक प्रभावी डीए और महंगाई राहत की दर को ध्यान में रखा जाएगा और 1 जुलाई, 2021 से प्रभावी संशोधित दर में शामिल किया जाएगा। इसका मतलब है कि 1 जनवरी, 2020 से 30 जून 2021 तक की अवधि के लिए कोई बकाया राशि केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों को नहीं दी जाएगी। यह उपाय केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए असंवेदनशील साबित हो रहा है जो कोविड - 19 योद्धाओं के रूप में काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारी अर्थव्यवस्था को चालू रखने और देशवासियों को बुनियादी सेवाएं प्रदान करने के लिए अपने जीवन को जोखिम में डाल रहे हैं, उन्हें उनकी प्राप्ति से वंचित क्यों किया जा रहा है? 

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