एक ओर कोरोना का कहर, दूसरी ओर प्री स्कूलों की मनमानी

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। कामनाहल्ली की रहने वाली प्रियंका बताती है कि उन्होंने अपने चार वर्षीय बेटे का नामांकन एक स्थानीय प्री-स्कूल में करवाया था। वे कहती है फरवरी - मार्च के समय मैंने स्कूल में दाखिले की पूरी फीस स्कूल में जमा करा दी थी, इस उम्मीद में कि अप्रैल से स्कूल के सेशन स्टार्ट हो जाएंगे और बेटा स्कूल जाने लगेगा।

लेकिन कोरोना वायरस महामारी ने सारी परिस्थितियां बदल कर रख दी। अब पूरी फीस की राशि स्कूल को दे देने के बाद कोरोना वायरस के तेजी से बढ़ते संक्रमण की वजह से सभी स्कूलों को अनिश्चित समय के लिए बंद कर दिया गया है। बीते 24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा की। प्रियंका बताती है कि ऐसी परिस्थिति को देखते हुए बच्चें को घर से बाहर तक ले जाने में एक डर सा महसूस हो रहा है, और फिर स्कूल तो दूर की बात है। प्रियंका कहती हैं कि लॉकडाउन खुलने के बाद भी शायद मैं अपने बच्चे को एक साल तक स्कूल नहीं भेज पाउंगी। उसके पीछे एक ही कारण है, और वह है कोरोना वायरस। उन्होंने बताया कि जब इस विषय पर स्कूल के प्रबंधन से बात की तो उन्होंने पूरी फीस का केवल 40 प्रतिशत लौटाने की बात कही। 

प्रियंका समेत अन्य कई महिलाएं एवं अभिभावक हैं जो स्कूलों की इस मनमानी से परेशान हैं। वे कहते हैं कि जब बच्चे को हम स्कूल भेजना ही नहीं चाहते तो फीस किस बात के लिए दें। प्री स्कूलों की इस मनमानी से लगभग शहर के सैंकड़ों अभिभावक परेशान हैं। उनका कहना है कि फीस की राशि काफी बड़ी है और अभी प्राइवेट नौकरी ज्यादा दिनों तक टिकना मुश्किल सा प्रतीत होता है। ऐसे में अगर प्री स्कूल वाले पैसे वापस कर देते है काफी मदद मिलती। सूत्रों के हवाले से यह पता चला है कि लॉकडाउन अभी लंबा चलेगा, लेकिन स्कूल प्रबंधन पैसे वापस करने को तैयार नहीं है। अगर कोरोना वायरस के मद्देनज़र अभिभावक बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहते तो ये स्कूल प्रबंधन की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे अभिभावकों के इस मांग को समझे और फीस की राशि उन्हें लौटा दें। इस घटना के दूसरे पहलू को भी हमने जानने की कोशिश की और शहर के तमाम प्री स्कूल प्रबंधन से बात करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने एक के बाद एक कारण बता कर इस मुद्दे पर बात करने से साफ इंकार कर दिया।

प्री स्कूलों की मनमानी

सिर्फ बेंगलूरु की ही बात क्यों करें। देश के सभी प्री स्कूलों द्वारा मनमानी का सिलसिला चलाया जा रहा है। सैंकड़ों की संख्या में अभिभावकों ने हमारे समाचार पत्र से बातचीत की और उन्होंने हमें बताया कि शहर के अलग अलग इलाकों में रहने वाले लोगों से स्कूल के लोकेशन के भी आधार पर पैसे लिए जाते हैं। उन्होंने बताया कि प्री स्कूल में दाखिले के समय किसी स्कूल ने 40 हजार फीस बताया तो किसी ने 60 हजार। यह साल भर की राशि होती है। अभिभावकों का यह भी कहना है कि प्री स्कूलों की लगाम कसने के लिए सरकार को इस दिशा में भी सख्त कदम उठाने की जरूरत है। शहर के क्षेत्र के हिसाब से फीस तय करना अभिभावकों के सिर पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ जैसा है। इसीलिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार के शिक्षा विभाग को इस विषय को गंभीरता से लेते हुए इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए।   

एक अन्य अभिभावक दीपक कहते हैं कि कोरोना की वजह से व्यवसाय में पिछले दो महीनों से वैसे ही काफी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में अगर बच्चा स्कूल भी नहीं जा रहा और पैसे भी देने पड़ रहे हैं तो इससे ज्यादा तकलीफ़ देय और कुछ भी नहीं हो सकता। पाइ-लेआउट के रहने वाले प्रकाश का कहना है कि इस कठिन समय में भी प्री स्कूल प्रबंधकों को थोड़ी समझदारी दिखानी चाहिए। और अगर वे खुद समझदारी दिखाने में असक्षम हैं तो सरकार को उनका खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

नोट : शहर के किसी भी क्षेत्र के जो अभिभावक इस समस्या से जूझ रहे हैं, वे हमारे अखबार समाचार ‘परिवर्तन’ से सीधे संपर्क कर सकते हैं। हम आशा करते हैं कि आपके समस्या के समाधान की दिशा में हमारा समाचार पत्र कार्य करेगा और इस विषय को राज्य सरकार एवं प्रशासन के ध्यान में लाकर यथासंभव अपनी ओर से आपको न्याय दिलाने की पूरी कोशिश करेगा।

हमसे संपर्क करें - cmdofficeblr@gmail.com 

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