सिखों पर हमला कई वर्षों की साज़िश

Total Views : 551
Zoom In Zoom Out Read Later Print

काबुल, (परिवर्तन)। पिछले दिनों आफगानिस्तान के काबुल से एक दिल देहला देने वाली खबर आई। खबर ऐसी जिसने सुनने वालों को झकझोर कर रख दिया। एक ओर जहां पुरे विश्व में कोरोना वायरस वैश्विक महामारी बनकर फैल रहा है, लोग जहां पहले से ही परेशान हैं, ऐसे में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक सिख गुरुद्वारे पर चरमपंथी हमला होना काफी मार्मिक है। रिपोर्ट्स के अनुसार इस हमले में कम से कम 25 लोगों की मौत हुई है। लेकिन कई लोगों को वहाँ से सुरक्षित निकाला गया।

क्या है पुरा मामला ?

जानकारी के मुताबिक इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है। अधिकारियों के मुताबिक़, सुबह आठ बजे के आसपास आत्मघाती हमलावरों ने गुरुद्वारे पर हमला किया। ये गुरुद्वारा सेंट्रल काबुल के शोर बाज़ार इलाक़े में है। जब हमला हुआ उस समय वहाँ क़रीब 150 लोग मौजूद थे। दो साल पहले भी अफ़ग़ानिस्तान में सिखों पर इस्लामिक स्टेट ने हमला किया था, जिसमें 19 लोग मारे गए थे। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़ गुरुद्वारे से धमाकों और गोलीबारी की आवाज़ें आ रही हैं। अब पूरे इलाक़े को अफ़ग़ानिस्तान के स्पेशल फ़ोर्सेस ने घेर लिया है। अफ़ग़ानिस्तान के आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता तारिक़ एरियन ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया, ''लोग इमारत के अंदर फँसे हुए थे और सुरक्षाकर्मी उन्हें सुरक्षित निकालने की कोशिश कर रहे थे।'' घटनास्थल से जो तस्वीरें आ रही थी उसमें सुरक्षा कर्मियों को लोगों को स्ट्रेचर पर ले जाते देखा जा सकता था। ये तस्वीरें काफी दर्दनाक थी। अफ़ग़ानिस्तान इस समय राजनीतिक अस्थिरता के दौर में हैं। दो शीर्ष राजनेताओं अशरफ़ ग़नी और अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह ने राष्ट्रपति चुनाव में अपनी - अपनी जीत का दावा किया है। अमरीका इसका हल निकालने की कोशिश में है। हाल ही में अमरीका ने चरमपंथी गुट तालिबान से भी एक समझौता किया है ताकि वहाँ शांति स्थापित की जा सके।

विश्व समुदाय चुप क्यों है

विश्व भर में वैसे ही कोरोना के आतंक से लोगों में डर का माहौल बना हुआ है। इस बीच काबुल से आई खबरों ने लोगों को और परेशान कर दिया। लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि गुरुद्वारे के भीतर सिख समुदाय पर हुए इस हमले को लेकर विश्व समुदाय ने चुप्पी क्यों साध ली है। क्या इसे मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता। भारत के अलग अलग प्रांतों में बसे सिख समुदाय के लोगों ने इस हमले को काफी पीड़ादायक और गंभीर बताया है और इस पर तुरंत किसी प्रकार की कार्रवाई की मांग की है। आश्चर्य की बात यह भी है विश्व के किसी भी देश ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और सबने चुप्पी साध ली है। 

लोगों का कहना है कि क्योंकि भारत में सिख समुदाय के ज्यादातर लोग एक साथ मिलझुल कर रहते हैं, इसीलिए जब यह पता चला कि केरल के ही किसी व्यक्ति ने काबुल में इस घिनौने आतंकी घटना की साज़िश रची थी, तो उन्हें काफी दुखः हुआ। लेकिन यह बड़े अफसोस की बात है कि भारत सरकार भी इस मामले में कुछ कहने से बच रही है। भारत सरकार के व्यवहार से सिखों में खासी नाराज़गी है, और वे सरकार से इस मुद्दे पर जल्द से जल्द कोई सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सिख समुदाय वही है जो हमेशा किसी भी विकट परिस्थिति में सबसे आगे आकर खड़े होते हैं और नेतृत्व करते हैं। चाहे देश में बाढ़ आए, चाहे कोई प्राकृतिक आपदा, चाहे आतंकी हमला हो या चाहे कोरोना वायरस। सिख समुदाय के लोगों ने हमेशा समाजहित, देशहित और मानवजाति के हित में कार्य किया है। ऐसी परिस्थितियों में एक मात्र सिख समुदाय ही सेवा के लिए तत्पर होते हैं, जहां भूखों को खाना खिलाया जाता है, बेसहाराओं को आश्रय दिया जाता है। इसीलिए इस घटना के बाद भारत सरकार की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि इस मामले में पूर्ण संज्ञान लेकर वैश्विक तौर पर गुनहगारों के लिए सज़ा की मांग करे। 

बहुत पुरानी है वजुद की लड़ाई

हिंदू और सिख अफ़ग़ानिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यक हैं और ये दोनों समुदाय मिलकर अपना एक प्रतिनिधि अफ़ग़ानिस्तान के केंद्रीय संसद में भेज सकते हैं। वर्ष 2018 में 20 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव नरिंदर सिंह खालसा निर्विरोध निर्वाचित हो गए। नरिंदर सिंह पेशे से एक व्यापारी हैं और कोई राजनीतिक तजुर्बा नहीं रखते हैं, लेकिन अगले कुछ दिनों में अफ़ग़ानिस्तान की सर्वोच्च विधायिका (संसद) के सदस्य बने। पिता की मौत के बाद नरिंदर सिंह खासला ने हिंदू और सिख समुदाय के सहयोग से उनकी जगह पर संसदीय चुनाव के लिए नामांकन किया। समाचार वेबसाइट बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में नरिंदर सिंह ने बताया, "पिताजी के साथ हिंदू और सिख समुदाय के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए जलालाबाद गया था। वहीं पर एक आत्मघाती बम हमला हुआ था जिसमें 19 लोग मारे गए। मारे गए लोगों में मेरे पिता भी थे। इस हमले में नरिंदर सिंह ख़ुद भी बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए थे। अवतार सिंह खालसा की मौत के बाद नरिंदर को इलाज के लिए भारत ले जाया गया था। 

इलाज के बाद जब वे वापस अफ़ग़ानिस्तान लौटे तो हिंदू और सिख समुदाय के लोगों ने दिवंगत अवतार सिंह खालसा की जगह पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा। नरिंदर बताते हैं, "इसके अलावा मेरे पास और कोई उपाय भी नहीं था। क्योंकि नंगरहार के इस आत्मघाती हमले में दोनों समुदायों के अधिकांश बड़े-बूढ़े लोग मारे गए थे।" अफ़ग़ानिस्तान के दूसरे लाखों नौजवानों की तरह अल्पसंख्यक समुदाय के युवा भी पिछले 40 साल से चल रहे संघर्ष और हिंसा के कारण पिछड़ेपन का शिकार हैं। 38 साल के नरिंदर सिंह चार बेटों के पिता हैं। न तो उनके बच्चे और न ही अल्पसंख्यक समुदाय के दूसरे लोगों के बच्चों के लिए अफ़ग़ानिस्तान में हालात ऐसे हैं कि वे अच्छी तालीम हसिल कर सकें। 

नरिंदर कहते हैं कि उनके लोग तो अपने धार्मिक रस्मो रिवाज़ और पर्व त्योहार भी बड़ी कठिनाई से मना पाते हैं। इन अल्पसंख्यकों की केवल यही समस्या नहीं हैं बल्कि इन 40 सालों के दौरान हमारे लोगों की ज़मीन और दूसरी संपत्तियां हड़प ली गई हैं। अफ़ग़ानिस्तान के हिंदू और सिख समुदाय के लोगों का मुख्य पेशा व्यापार और पारंपरिक यूनानी दवाइयां का कारोबार है। नरिंदर सिंह खालसा भी कारोबार ही करते हैं। वे कहते हैं, राजनीति में मैं केवल हिंदुओं और सिखों के लिए नहीं बल्कि मुल्क के सभी लोगों के लिए काम करूंगा। हिंदू और सिख सदियों से अफ़ग़ानिस्तान में रहते आ रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तान की अंदरूनी लड़ाई में इन दोनों समुदायों की कोई भागीदारी नहीं है लेकिन इसके बावजूद हमारे बहुत से लोग मारे गए हैं। मेरे ही परिवार के नौ लोगों ने अब तक इस युद्ध में अपनी जान गंवाई है।

नरिंदर सिंह कहते हैं कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से इसी मुल्क में रहता आ रहा है और इसी वतन का हिस्सा है। वो कहते हैं, सरकार और विश्व बिरादरी को चाहिए कि हम लोगों को हमारा अधिकार दे और ये गर्व की बात है कि सिख और हिंदू समुदाय अपना प्रतिनिधि मजलिस (संसद) में भेज रहे हैं। नरिंदर सिंह के पिता अफ़ग़ानिस्तान के सीनेटर और संसद के सदस्य रह चुके थे।

See More

Latest Photos