बदहाली का एक और नज़ारा

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

यस बैंक के परेशानी में फंसने से इसके जमाकर्ताओं में हड़कंप मच गया है। ऐसी हालत में लोग बैंक के एटीएम पर पहुंच रहे हैं, लेकिन पैसे निकल नहीं रहें। शाखाओं में जोरदार खलबली मची है, वहां भी न पैसे दिए जा रहे हैं, न कोई दूसरी गतिविधि हो रही है। ग्राहकों को अपने पैसे डूबने की आशंका सता रही है। शेयर बाजार पर इस घटना का बहुत बुरा असर पड़ा है। लोगों के जेहन में कुछ ही समय पहले दिवालिया हुए पीएमसी बैंक की याद ताजा हो गई है। उसके ग्राहकों ने पैसे पाने के लिए प्रदर्शन किया था, जिसमें एक व्यक्ति की मौत तक हो गई थी। वैसे रिजर्व बैंक और सरकार इस बार सचेत हैं कि हालात उतने न बिगड़ें।

रिजर्व बैंक ने यस बैंक के बोर्ड का संचालन अपने हाथों में लेते हुए इससे महीने में 50 हजार रुपये तक की निकासी सीमा बांध दी है, जबकि सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों को यस बैंक को खरीद लेने की दिशा में आगे बढ़ने की मंजूरी दे दी है। इधर तीन-चार वर्षों से यस बैंक की वित्तीय सेहत लगातार बिगड़ रही थी। बैंक ने जिन कंपनियों को लोन दिया उनमें अधिकतर घाटे में हैं या दिवालिया हो चुकी हैं। पैसे वापस लौटने का सिलसिला टूटा तो बैंक का हाल बिगड़ने लगा।

नुकसान से बचने के लिए उसने पूंजी जुटाने की कोशिश की। इससे उसकी रेटिंग खराब हुई और निवेशकों, जमाकर्ताओं ने अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया। बैंक प्रबंधन अपना घाटा छिपाता रहा। वित्त वर्ष 2018-19 में यस बैंक ने करीब 3,277 करोड़ रुपये के एनपीए को अपने खाते में दिखाया ही नहीं। रिजर्व बैंक को उसने इस झांसे में रखा कि बैंक को जल्द ही बड़े पैमाने पर निवेश मिलने जा रहा है। लेकिन मैनेजमेंट के पास निवेश के लिए कोई ठोस प्रस्ताव नहीं था। हाल तो अभी भारत के समूचे बैंकिंग सेक्टर का ही बुरा है। ज्यादातर सरकारी बैंक खस्ताहाल हैं। कुछ बड़े नॉन बैंकिंग फिनांशल इंस्टीट्यूशन एक झटके में डूब गए। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भारी चिंता का विषय है। समस्या की जड़ कुछ हद तक उद्योग और व्यापार की सुस्ती से जुड़ी है, लेकिन कर्ज लेकर न लौटाने की बीमारी हमारे यहां बहुत पुरानी है। इस पर रोक तभी लगेगी जब बैंकों के कर्ज को घर की खेती समझने वालों में खौफ पैदा हो।

पिछले कुछ सालों में विकास को गति देने के नाम पर कई उद्यमियों को आंख मूंदकर कर्ज बांटे गए, जिनमें कई भगोड़े हो चुके हैं। इसके अलावा बैंकों ने कई योजनाओं के तहत भी अंधाधुंध ऋण बांटे हैं, जिनकी वापसी की कोई गारंटी नहीं है। अभी यस बैंक के ग्राहकों की जमापूंजी लौटाना सरकार का पहला फर्ज होना चाहिए ताकि उनका विश्वास सिस्टम में बना रहे। अगर आम आदमी का भरोसा अर्थतंत्र से उठ गया तो इसे बहाल करने में लंबा वक्त लगेगा।

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