पुलिस से और क्या उम्मीद की जा सकती है?

Total Views : 500
Zoom In Zoom Out Read Later Print

बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

दिल्‍ली में हुई हिंसा को लेकर पुलिस की भूमिका पर कई सवाल उठ रहे हैं। पुलिस के 50 से अधिक जवान और अफसर घायल हैं। पुलिस को भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पुलिस भी हिंसा की शिकार हो रही है। पुलिस का एक जवान रतन लाल भी शहीद हुआ है। हालात की गंभीरता समझी जा सकती है लेकिन क्या पुलिस ने अपनी तरफ से पर्याप्त प्रयास किए। रविवार को डीसीपी खुद कपिल मिश्रा के सामने लाचार दिखें। पुलिस की भूमिका को लेकर कई वीडियो सामने आए हैं जिनमें दंगाई पुलिस के साथ हैं। पुलिस दंगाइयों को पत्थर मारने के लिए उकसा रही है। भीड़ की तैयारियों पर दाद देनी चाहिए। पुलिस वालों के साथ ही दंगाईयों ने हेल्मेट पहने हुए थे, ताकि उन्हें पहचाना न जा सके। उनके हाथों में पत्थर, बंदुक, लाठियां और भी हथियार दिखे। कोई पत्थर चला रहा हैं, तो कोई बुरी तरह से लोगों को पीट रहा है, और पुलिस वहीं तमाशबीन बन कर खड़ी है और कार्रवाई नहीं कर रही है। ऐसी पुलिस को देखकर किसका भरोसा खत्म नहीं हो जाएगा। क्या इस पुलिस से उम्मीद की जा सकती है, कि वे मासूम लोगों को पिटने से बचाए और दोषियों पर कार्रवाई करें?

सोमवार को हुई हिंसा और आगज़नी की तस्वीरों में दिखाई दे रहा है कि प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पिकेट के साथ में बनी मज़ार में आग लगाई। अन्य तस्वीरों में पेट्रोल पंप, कई गाड़ियां, दुकानें और यहां तक कि कुछ मकान भी जलते हुए नज़र आ रहे हैं। क्या दिल्ली पुलिस को अंदाज़ा नहीं था कि जाफ़राबाद इलाक़े में पहले से जारी विरोध प्रदर्शन इस अंजाम तक पहुंच सकते हैं? क्या दिल्ली पुलिस का अपना ख़ुफ़िया तंत्र इस हद तक सुस्त था कि उसे भनक नहीं लगी कि राष्ट्रपति ट्रंप के आने से पहले दिल्ली से हिंसा और आगज़नी से तनाव इतना अधिक बढ़ सकता है? विपक्ष, ख़ासतौर पर आम आदमी पार्टी का आरोप है कि पुलिस को हरकत में आने के आदेश नहीं मिले थे, वरना भीड़ में कोई दंगाई पिस्तौल लहराने की हिम्मत कैसे जुटा पाता? दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल इसलिए भी उठे हैं कि क्योंकि जामिया की तरह पुलिस इस बार बल प्रयोग करती नज़र नहीं आई। 

क्योंकि पुलिस, स्टेट सब्जेक्ट है। इसका मतलब ये है कि केंद्र सरकार इसमें दख़ल नहीं दे सकती। लेकिन दिल्ली पुलिस इसका अपवाद है। दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है। बाकी राज्यों में मुख्यमंत्री ही राज्य पुलिस के लिए सबकुछ होता है। लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं है। पुलिस को किसी भी सरकार का 'स्ट्रांग आर्म' माना जाता है। इसलिए पुलिस से उम्मीद की जाती है कि वो सही समय पर कार्रवाई करेगी और दंगे-फ़साद रोक देगी। वैसे तो देश का क़ानून ये कहता है कि कोई भी संज्ञेय-अपराध यदि पुलिस के सामने होता है तो उसे हरकत में आना चाहिए। लेकिन धीरे-धीरे ये प्रथा कम होती जा रही है। वहीं दूसरी ओर मेरा ये मानना है कि जो लोग राजनीतिक लाभ और हिंसा फैलाने  के लिए मजहबी बयानबाजी करते हैं, कोई भी सरकार उन पर कार्रवाई क्यों नहीं करती। चाहे वे किसी पार्टी विशेष के नेता हों या चाहे किसी उच्च पद पर बैठा कोई मंत्री, या चाहे वो देश का कोई आम नागरिक ही क्यों न हो उन पर सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। जब तक ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं होती, दंगा करने वाले असामाजिक तत्वों का ये हंगामा खत्म नहीं होगा।

See More

Latest Photos