पुलवामा पर शर्मनाक सियासत

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश में राजनीति करने के लिए मुद्दे ही नहीं बचे आज शायद इसीलिए शहीदों की शहादत को ताक पर रख कर उस पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही है।  पुलवामा हमले को एक साल का वक्त बीत चुका है लेकिन आज भी उस पर राजनीति करना नेताओं ने नहीं भूला है। दरअसल, बीते दिनों राहुल गांधी ने एक ट्वीट किया और इस मुद्दे पर सियासत परवान चढ़ गई। उन्होंने अपने ट्वीट के माध्यम से केंद्र सरकार से तीन सवाल पूछे, पहला - पुलवामा हमले से किसे सबसे ज्यादा फायदा हुआ? दूसरा - पुलवामा हमले की जांच से क्या सामने आया? तीसरा - सुरक्षा में हुई चूक के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए ? यूं तो इनमें से कुछ सवालों के जवाब पूरा देश मांग रहा है, लेकिन इसके राजनीतिकरण से उन सभी वीरों की आत्माओं को कितनी ठेस पहुंच रही होगी, इसका किसे अंदाज़ा। बड़ा सवाल ये है कि चुनाव के आते ही ऐसे गंभीर मुद्दों को कुछेक राजनीतिक पार्टियों द्वारा उछाला जाता है, और बड़ी - बड़ी बातें भी की जाती है, लेकिन हकीकत तो ये है कि जब जनता सरकार से जवानों के बलिदान का कारण पूछती हैं तो उन्हें आश्वासन के सिवाए कुछ नहीं मिलता। आश्वासन इस बात का कि जांच अभी चल रही है। आश्वासन इसका कि हम दुश्मनों और दोषियों से बदला लेकर रहेंगे। और ये आश्वासन भी चुनाव परिणामों के आते ही खो जाते हैं। पूरे एक साल का समय बीत गया, लेकिन आज भी न दोषियों को चिन्हित किया गया, न उनकी गिरफ्तारी हुई और न ही उन्हें इस घिनौने कार्य के लिए सज़ा मिली। मेरा मानना ये है कि राजनीतिक धरातल पर पार्टियां केवल फायदे और नुकसान का ही आंकलन करती है। उन्हें न तो किसी के भावनाओं की कद्र है और न ही देश की सुरक्षा में सेंधमारी की फिक्र। ऐसे ज्वलंत मुद्दों को राजनीतिकरण का एक भयावह रूप देने के लिए ही इन पर तेजी से कार्रवाई नहीं की जाती, ताकि समय आने पर इन मुद्दों का इस्तेमाल कर देश के नागरिकों के भावनाओं के साथ खेल खेला जा सके। ऐसा नहीं है कि पुलवामा हमला देश की सेना पर किया गया एकमात्र आतंकी हमला है। बल्कि इससे पहले भी देश के जवानों पर छत्तीसगढ़, आसाम, और जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों में हमले हुए हैं, जिसमें कई जवान शहीद हुए हैं, लेकिन फिर बड़ा सवाल यह उठता है कि पुलवामा पर ही राजनीति क्यों की जा रही है। फरवरी 14, 2019, देश के इतिहास का एक ऐसा काला दिन था, जिस दिन भारत मां ने अपने 40 बेटों को खो दिया और पूरे देश के नागरिकों का खून खौल उठा। लेकिन ये बात राजनीतिक दलों के समझ से परे हैं, उन्हें केवल राजनीतिक दावं - पेंच और उसके लाभ से मतलब है। इससे यही प्रतीत होता है कि देश में शहीदों की जान क्या है।

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