ट्रैफिक सिग्नल पर भीख की कमाई लाखों में

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सरकार उठाये कोई ठोस कदम बेंगलूरु, (परिवर्तन)। छह साल की माधवी (बदला हुआ नाम) को रोज़ाना कमाई का एक लक्ष्य दिया गया है। उसे रोज़ाना करीब आठ घंटे का काम करना पड़ता है। रोज़ की कमाई का लक्ष्य तकरीबन 500 से 800 रुपये है। माधवी रोज़ सुबह 9 बजे से लेकर शाम के करीब 6 बजे तक इंदिरानगर केएफसी सिग्नल पर भीख मांगती है। जिस उम्र में उसकी नन्ही आँखों में पढ़ने और कुछ कर दिखाने का सपना होना चाहिए, आज उन्हीं नन्ही आँखों को ट्रैफिक सिग्नल के लाल होने का इंतज़ार रहता है।

शहर के तमाम इलाकों में ऐसी न जाने कितनी ही माधवी होंगी जिनके सपनों को रौंद कर उन्हें शहर के ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगने पर मजबूर किया जाता है। शहर में ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगती बच्ची, औरतें और बुजुर्ग आपको आसानी से नज़र आ जायेंगे। देश के अन्य शहरों की तुलना में बेंगलूरु में भीख मंगवाना इसलिए भी सहूलियत माना जाता है क्योंकि यहाँ के लोग अन्य शहरों की तुलना में भीख में अधिक पैसे देते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगे वाले बच्चे या कोई और अपना पेट पालने के लिए भीख नहीं मांगता बल्कि इनको भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है। इनकी कमाई का इस्तेमाल इनकी भलाई या देश के काम में नहीं बल्कि देश की बर्बादी या देश के बाहर चलाये जाने वाले गोरख धंधे के लिए किया जाता है। सोचने वाली बात यह है कि इन बच्चों, औरतों या बुजुर्गों को तस्करों की जाल से बाहर निकालने की दिशा में अब तक राज्य सरकार ने कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया? एक ओर जहां मेकिंग इंडिया और डिजिटल इंडिया की बात कह कर हम विकसित देश बनने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हैं तो वहीं दूसरी ओर मानव तस्करी और घोटालों की वजह से दो कदम पीछे चले जाते हैं।

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि शहर में कई बार ऐसे ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगते बच्चों को माफियाओं के चुंगुल से बहार निकाला गया है। लेकिन बात वहां आकर अटक जाती है जहां दूसरे ही दिन यह सिलसिला फिर नए रुप में शुरू हो जाता है। उन्होंने नाम न बताने के शर्त पर बताया कि इस धंधे को बंद करने के लिए राज्य सरकार को तत्परता दिखानी होगी। सरकार खुद ही अगर इस मामले में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगी तो इसका बंद होना नमुमकिन हैं। उन्होंने बताया कि जब एक बच्चे को ट्रैफिक सिग्नल में भीख मांगने के लिए खड़ा किया जाता है तो उसे कमाई के तरीके बताये जाते हैं। वे कहते है कि इस पर कोई ठोस आंकड़ा कभी तैयार नहीं किया जा सकता क्योंकि ये गोरख धंधा इस कदर पैर पसार चूका है कि अब इसको गिना जाना असंभव है। उन्होंने एक अनुमान के तौर पर बताया कि एक महीने में ट्रैफिक सिग्नलों में भीख की कमाई कम से कम 20 लाख रुपये के आस-पास होगी। इन रुपये का क्या होता होगा? किस काम में इस्तेमाल किया जाता होगा? यह अब भी एक प्रश्न है।  एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार देश भर में करीब 6 लाख से भी ज्यादा लोग रोज़ाना भीख मांगते हैं। वहीं अकेले बेंगलूरु शहर में भीख मांगने वालों की संख्या करीब 5 हज़ार से भी ज्यादा है। शहर में बच्चों की मनोचिकित्सा के लिए काम कर रही संस्था "प्रगति" की अध्यक्ष डॉ रूचि का कहना है कि हमारे यहाँ अक्सर ऐसे बच्चों को लाया जाता है जो किसी न किसी प्रकार से मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के शिकार हैं। उन्होंने बताया कि भीख मांगने वाले बच्चों को उनकी मानसिक स्थिति से निकालना बेहद मुश्किल होता है। क्योंकि बच्चों को अलग किस्म की नशीली दवाएं दी जाती है जिसकी वजह से वे सामान्य बोध की क्षमता खो देते हैं।

कमाई के लिए बेंगलूरु बेहतर शहर

बेंगलूरु शहर को देश के अन्य शहरों से कई कारणों की वजह से बेहतर माना जाता है लेकिन भीख मांगने और इसकी कमाई के लिए भी जब शहर को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है तो इससे बजाये शर्मिंदगी के कुछ और महसूस नहीं होता। शहर में ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगने वाले बच्चों को बचाने एवं उन्हें एक अच्छी ज़िन्दगी प्रदान करने वाली गैर- सरकारी संगठन, "जागृति" की अध्यक्ष रेणु का कहना है कि बेंगलूरु शहर में भीख मांगने वालों के लिए अच्छा शहर इसीलिए भी माना जाता है क्योंकि यहाँ जब ट्रैफिक सिग्नल पर बच्चें भीख मांगते हैं तो देने वाले मनचाही राशि देते हैं। उन्होंने बताया कि यहाँ जितनी तादात में ट्रैफिक सिग्नल है उतनी ही तादात में बच्चों से भीख मंगवाया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि समय-समय पर उनकी संस्था द्वारा ट्रैफिक सिग्नलों से बच्चों को पुनर्वास के लिए लाया जाता है। रेणु कहती हैं कि तस्करी करने वाले लोग बच्चों को इस प्रकार तैयार करते हैं कि उनके मुँह से कुछ भी बुलवाना मुश्किल हो जाता है। वे कहती हैं कई बार हमारे यहाँ बच्चे आते है जिन्हें उनकी हालिया मानसिक अवस्था से निकालने में कई महीनों लग जाते हैं। रेणु ने बताया बच्चों के जरिये कमाया गया पैसा देश के बाहर असामाजिक तत्वों एवं आंतक को बढ़ावा देने में लगाया जाता है। उन्होंने बताया बच्चों को देश के विभिन्न राज्यों और शहरों से यहाँ लाया जाता है। इनमें मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, आंध्र-प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और बांग्लादेश से लाते हैं।

सोच से परे है यह घोटाला

शहर में स्थित चाइल्ड वेलफेयर सोसाइटी, जहां भीख मांगे वाले बच्चों का पुनर्वास किया जाता है वहां के सदस्य कुमारन का कहना है कि वर्ष 2011 में स्थानीय पुलिस की मदद से शहर के करीब 282 जगहों पर छापेमारी की गई और करीब 300 से भी ज्यादा बच्चों को इन माफियाओं के कैद से आज़ाद किया गया। उस वक़्त धंधे से जुड़े सात लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था। उनसे पूछताछ के दौरान पता चला कि यह घोटाला सोच से भी परे है। भीख मांगने के लिए जिन बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है उनका शारीरिक रूप से शोषण भी किया जाता है। उन्होंने बताया कि इन्हें ज्यादा दिनों तक एक जगह पर नहीं रखा जाता। समय-समय पर देश के अन्य शहरों में इनका रोटेशन चलता है। बच्चों की मानसिक स्थिति को इस प्रकार बनाया जाता है कि वे सिर्फ पैसे मांगने के सिवाए कुछ बताते भी नहीं है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार से भीख मांगने के धंधे में खासतौर पर बच्चों को दोहरे रूप से इस्तेमाल किया जाता है। कईयों को देश के बहार जिस्मफ़रोशी के जाल में धकेल दिया जाता है।  

सरकार क्यों हैं मौन ?

ट्रैफिक सिंग्नल पर खड़े होने वाले हर व्यक्ति के मन में कई सवाल है। जैसे, इन भीख मांगने वालों की अपनी कोई पहचान है भी या नहीं? इनको दिए जाने वाले पैसों का कोई हिसाब है भी की नहीं? एक दिन में मिले भीख के पैसों से क्या इनका खुद का घर चलता है? रोज़ाना सिग्नल पर मांगे जाने वाले पैसे जाते कहाँ हैं? आखिर इन भीख मांगने वाले गिरोह को संरक्षण कौन दे रहा है? क्या यह पैसे राष्ट्र विरोधी कार्यों पर इस्तेमाल किया जा रहा है? भीख मांगने वाले लोगों को पैसों का लालच देकर क्या कोई भी आपराधिक कार्य करवाया जा सकता है? क्या इनका इस्तेमाल देश में भ्रष्टाचार और आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है? भीख में मिले पैसे कालेधन के सामान है जिनका सरकारी कागजों में कोई लेखा-जोखा नहीं है, तो क्या इस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था कमज़ोर हो रही है? सरकार के पास क्या इन माफियों से लड़ने का कोई उपाय है? इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इसमें राज्य सरकारों का ध्यान अब तक नहीं गया या सब जान कर भी राज्य सरकार और केंद्र की सरकार मौन है?

टैक्स देने वाले देश में भीख क्यों?

कोरमंगला फोर्थ ब्लॉक के रहने वाले संदीप का कहना है कि हर महीने हज़ारों और सालाना लाखों रुपये टैक्स देने के बाद नौबत यह आती है कि ट्रैफिक सिग्नल पर भी पैसे देने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य या केंद्र सरकार के पास इन बेनामी पैसों का कोई हिसाब तक नहीं है। जबकि देश के हर छोटे-बड़े शहरों में भीख मांगने वालों की तादात भरी हुई है। उनका कहना है सरकार को इसके खिलाफ न केवल ठोस कदम उठाना चाहिए बल्कि इसके रोकथाम के लिए सभी राज्य सरकारों को आदेश दिया जाना चाहिए।

कानून तो है पर कार्रवाई नहीं

बच्चों से भीख मंगवाना कानूनी अपराध है। यदि बच्चों के अभिभावक उनसे भीख मंगवाते हैं तो उन्हें भी जेल की हवा खानी पड़ सकती है। सड़कों पर भीख मांग रहे बच्चों का पुनर्वास करना जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का जिम्मा है। बोर्ड का चेयरमैन जिला आयुक्त होता है जबकि बोर्ड में सदस्य भी होते हैं। कई राज्य़ों में पिछले कई वर्षो से बोर्ड का गठन ही नहीं हुआ। इसके अलावा देश भर में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है। इसके तहत चौदह वर्ष तक के बच्चे यदि भीख मांगते हैं तो इलाके के एसएचओ का जिम्मा है वे उन्हें स्कूल तक पहुंचाए। ऐसा हो नहीं रहा।

शहर में कुल 250 ट्रैफिक सिग्नल

बेंगलूरु पुलिस ने हाल ही में शहर में 30 और स्थानों पर ट्रैफिक लाइट लगवाने का काम शुरू करवाया। ट्रैफिक पुलिस और प्रशासन के साथ मिलकर इस दिशा में काफी तेजी से काम जारी है। मैसर्ज डिम्ट्स शहर में यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंट लाइटिंग सिस्टम लगा रही है। लगभग सभी सिग्नल लग चुके हैं। कुछ का ट्रायल चल रहा है। 2019 मतक यहां लगभग 250 ट्रैफिक सिग्नल लगाए गए थे। उन्हें भी आधुनिक ट्रैफिक सिग्नल में बदलते हुए कुल 225 स्थानों पर सिग्नल काम करेंगे।

बिजनेस प्वाइंट बने

ट्रैफिक सिग्नल प्वाइंट अब सामान बेचने के स्थल बनकर रह गए हैं। यहां बहुत से लोग इन दिनों छोटी-मोटी चीजें लेकर खड़े रहते हैं। रेड सिग्नल होते ही सक्रिय हो जाते हैं। फिर सामान लेकर गाड़ियों के पास पहुंच जाते हैं। कोई कपड़े बेच रहा है तो कोई मिट्टी के बर्तन। किसी ने हाथ में लड़ियां ले रखी हैं तो कोई टिशूपेपर। यह काम जम्मू में सिग्नल पर अब बढ़ता दिख रहा है। हर बड़े चौराहे पर यह बिजनेस फलने-फूलने लगा है। पुलिस की मिलीभगत और सरकारी अनदेखी के चलते यहां लोगों की जान पर भी बन आती है।

भीख मांगने का है अपना कारपोरेट घराना

भीख मांगने वालों का अपना कारपोरेट घराना है। दुनिया तेजी से बदल रही है जनाब, तो भिखारियों के सालाना दो सौ करोड़ के टर्नओवर पर हैरत मत करिए! भारत के संविधान में भीख मांगना अपराध है लेकिन बिहार में भीख मांगने का लाइसेंस मिलता है। दिल्ली के चौराहे हर स्टेट के भिखारियों से घिरे पड़े हैं। देश में लगभग चार लाख भिखारियों में 45 हजार बच्चे हैं। पुलिस रिकार्ड में हर साल लगभग इतने ही बच्चे गायब हो रहे हैं। भिखारियों के पैसे में पुलिस और सफेदपोशों के भी हिस्से होते हैं।

मुंबई के स्लम क्षेत्र विरार का संभाजी प्रतिदिन कम से कम डेढ़ हजार कमा लेता है। इसके पास कुल चार मकान हैं। अच्छा-खासा कई बैंकों में बैलेंस है। मुंबई का ही हाज़ी रोज़ाना कम से कम दो हजार रुपए कमा लेता है। 

मास्साब ने पूछा- बच्चों, भारत के उस शहर का नाम बताओ, जहां भिखारी न रहते हों? बच्चे चुप! जिस बात का बड़ों तक को पता नहीं, बच्चे कैसे बता दें, जबकि जवाब बड़ा सीधा-सा है, एक भी शहर ऐसा नहीं, जहां भिखारी न रहते हों। जिस देश में गंगा बहती है, उस देश में मेहनत-मजदूरी करने की क्या जरूरत, बैठ जाओ घाट किनारे, हथेली पर सिक्के बरसने लगेंगे। बिना लागत के सबसे मस्त प्रॉफिटेबल सेक्टर। यह जानकर किसी को भी हैरत हो सकती है कि हमारे देश में एक दर्जन से अधिक भिखारी करोड़पति हैं। 

देश में 40 प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे किसी तरह जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं। हर बड़े शहर के चौराहे भिखारियों से आबाद हैं। जितनी बार रेड सिग्नल, उतनी बार वाहनों के थमते ही बील की चींटियों की तरह फुर्ती से निकल आता है भिखारियों का झुंड। उनमें बड़े कम, बच्चे ज्यादा। हाथ फैलाए रिरियाते हुए। एक दिन में एक हजार बार रेड सिग्नल तो प्रति ट्रिप भीख के एक-एक रुपए से देर शाम तक उनकी झोली में आ जाते हैं एक हजार रुपए। फिर रात के अंधेरे में वे ठाट से ऑटो कर पहले ठेके पर पहुंचते हैं। गला तर करते हैं और पहुंच जाते हैं अपने ठाट-बाट वाले ठिकानों पर। भीख मांगने वाला जर्जर ड्रेस खूंटी पर टांगा और हो लिया मोहल्ले का इज्जतदार, सभ्य-भला मानुस। कहीं घूमने-फिरने जाना हुआ तो दरवाजे पर चार पहिया गाड़ी खड़ी है। 

ये है हमारे देश के लखपति, करोड़पति भिखारियों का डेली रुटीन। उनके बैंक बैलेंस कोई जाने तो सही। उनमें कई तो फर्राटेदार अंग्रेजी में भी बात कर लेते हैं। उनके बच्चे ठाट से कॉन्वेन्ट स्कूलों में पढ़ रहे हैं। बिना लागत के भीख मांगने का अच्छा खासा बिजनेस चल रहा है। देश के इन करोड़पतियों में है परेल (मुंबई) का भिखारी भरत जैन, जो दस हजार रुपए हर महीने देकर खुद तो किराए के मकान में रहता है और उसके अस्सी-अस्सी लाख के दो फ्लैट किराए पर उठे हुए हैं। वह रोजाना साठ-सत्तर हजार रुपए कमा लेता है। भांडुप में उसकी दो दुकानें हैं। एक ऐसा ही भिखारी मासु फिल्म स्टूडियो में अच्छे कपड़े उतारकर भिखारी के वेश में पहुंच जाता है परेल, उसके पास अपने फ्लैट के अलावा तीस लाख से अधिक की सम्पत्ति है। 

मुंबई के स्लम क्षेत्र विरार का संभाजी प्रतिदिन कम से कम डेढ़ हजार कमा लेता है। इसके पास कुल चार मकान हैं। अच्छा-खासा कई बैंकों में बैलेंस है। मुंबई का ही हाज़ी रोज़ाना कम से कम दो हजार रुपए कमा लेता है। उसके पास एक कारखाना, खुद का मकान, लाखों के कई प्लॉट्स हैं। छारनी रोड के कृष्ण कुमार गईथी का अपना लाखों का बहुमंजिला मकान है। मुम्बई के ये भिखारी सालाना 180 करोड़ की भीख के कारोबारी हैं। थाणे इलाके में एक भिखारी के यहां से बोरियों में नोट होने का उस समय पता चला, जब उसके घर में आग लगी।

एक नज़र में

  • ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगने वाले बच्चों की उम्र 6 से 15 वर्ष।

  • शहर में ट्रैफिक सिग्नलों की संख्या लगभग 200 से ज्यादा।

  • तस्कर बच्चों को बिहार, झारखण्ड, आंध्र-प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और बांग्लादेश से लाते हैं।

  • अन्य शहरों की तुलना में यहाँ भीख में कम से कम मिलते है 10 रुपये।

  • एक बच्चे को दिन में 8 से 10 घंटे भीख मांगने पर किया जाता है मजबूर।

  • एक बच्चे की प्रतिदिन की कमाई करीब 500 से 800 रुपये।

  • ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगने वालों में शामिल हैं बच्चें, महिलाएं और बुजुर्ग।  

  • शहर में 5000 लोग रोज़ाना सिग्नल पर भीख मांगने पर मजबूर।

  • हैरान करते हैं आंकड़े 

  • देश के औसतन हर घंटे में एक बच्चा गायब होता है। 

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 44,000 बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं। 

  • लापता बच्चों में करीब 11,000 का ही पता लग पाता है 

  • यूएन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत मानव तस्करी का बड़ा बाजार बन चुका है।

  • देश की राजधानी दिल्ली मानव तस्करों की पसंदीदा जगह बनती जा रही है।

  • देश भर से बच्चों और महिलाओं को लाकर ना केवल आसपास के इलाकों बल्कि विदेशों में भी भेजा जा रहा है। 

बचपन पर तस्करों की नजर 

मासूस बचपन पर, जिस पर राष्‍ट्र का भविष्‍य निर्भर करता हो, अपहरणकर्ताओं और तस्‍करों की नजर लग जाए, तो मानना चाहिए कि राष्‍ट्र की सुरक्षा खतरे में है। अपना देश वर्तमान में इसी खतरे से दो-चार हो रहा है। यहां के बचपन को सुरक्षा की दरकार है। सरकार भले ही लाख दावा करे कि वह बच्‍चों की सुरक्षा के लिए भरसक प्रयास कर रही है, लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के आकड़ें इन दावों की पोल खोल रहे हैं। एनसीआरबी के मुताबिक, बीते तीन वर्षों में 1.84 लाख बच्‍चे लापता हो गए। इनमें से 28,595 बच्‍चे अपहरणकर्ताओं का शिकार बने। एनसीआरबी की रिपोर्ट यह भी कहती है कि देश में लगभग 96 हजार बच्‍चे हर साल लापता हो रहे हैं, यानी हर घंटे, लगभग 11 बच्‍चे। इन बच्‍चों में 70 फीसदी की उम्र होती है, 12 से 18 साल। आखिर इतने बच्‍चे जाते कहां हैं? जवाब मुश्किल नहीं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ‘ट्रैफिकिंग इन वूमेन ऐंड चिल्ड्रन इन इंडिया' नामक रिपोर्ट को मानें, तो बच्चों की तस्करी को रोकने के प्रयास नाकाफी हैं और इनमें मौजूद खामियों का फायदा उठाकर तस्‍कर बच्‍चों को उठाने में कामयाब हो जाते हैं।

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