गुमराह करने वाली सरकार

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया में केवल एक ही खबर का बोलबाला है। जी हां, वो है एनआरसी, सीएए, एनपीआर एवं शाहीन बाग पर हो रहा प्रदर्शन। ये सभी विषय एक दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित है। बिना मुद्दे की गंभीरता की समझते हुए पार्टियां, नेतागण, और देश के आम आदमी इस पर टीका टिप्पणी करने में लगे हुए हैं। आज शायद ही देश का कोई व्यक्ति हो जिसे सीएए, एनआरसी और एनपीआर के बारे जानकारी न हो। भले ही उनका ज्ञान केवल शब्दों तक ही सीमित हो। इसके मतलब और आम नागरिक पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है ये समझ उनसे कोसों दूर है। ऐसा इसीलिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि लोकतंत्र में सरकार के फैसले पर विरोध-प्रदर्शन करने की बात तो समझ में आती है लेकिन यहां तो सरकार के फैसले के पक्ष में भी लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। यह हास्यास्पद होने के अलावा और है ही क्या। दरअसल, देश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए हम ये कह सकते हैं कि सोशल मीडिया के माध्यम से देश ने आज एक काला चशमा पहन लिया है और इस चश्मे का नियंत्रण सरकार बखूबी कर रही है। स्पष्ट रूप से कहा जाए, तो आज सरकार जनता को जो दिखाना चाहती है, जनता केवल उसे ही देख रही है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल आज प्रोपागेंडा व झूठी खबर फैलाने, विरोध का भयावह रूप दिखाने जैसे घिनौने कार्यों के लिए किया जा रहा है। याद करें वो समय जब देश में बेरोजगारी का सवाल उठा, किसानों के आत्महत्या करने की बात सामने आई, तो मोदी सरकार ने इनसे कन्नी काटते हुए नोटबंदी और जीएसटी की घोषणा कर दी। सरकार को उसी भ्रष्टाचार और काले धन की परवाह थी, जिससे न तो युवाओं का और न ही किसानों का कोई भला हुआ। वर्ष २०१९ में जब देश में आर्थिक मंदी के बादल छाए और लोगों की नौकरियां जाने लगी, कारखाने और मिलें बंद होने लगी, उस समय भी गंभीर मुद्दों को दरकिनार करते हुए सरकार ने धार्मिक, सांप्रदायिक और राजनीतिक मुद्दों को शीर्ष पर रखा। यहां इन सभी बातों को कहने का मकसद है कि मोदी सरकार और भाजपा पार्टी के नेताओं ने आम लोगों का ध्यान अर्थव्यवस्था, जीडीपी और बजट जैसे गंभीर मुद्दों से हटाकर एनआरसी, सीएए और एनपीआर पर लगा रखा है। लोगों को भ्रमित करने के लिए जो रास्ता अपनाया गया है, उस पर वे एक हद तक कामयाब होते नजर आ रहे हैं। इस वक्त न देश की मीडिया और न ही देश की जनता को इन गंभीर मुद्दों की परवाह है। वित्तीय बजट पर इस बार हर तरफ शांति बनी हुई है, जिससे सरकार की राह और आसान हो गई है। न जनता को सरकार के बजट की आस है और न सरकार को जनता की जरूरतों की परवाह। कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि शायद इस बार के बजट से सरकार अपनी ही पीठ थपथपा ले।

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